चन्द्रप्रकाश श्रीवास्तव की छह कविताएं

गतिमान हने दो समय को

भागता है समय तो भागने दो
समय को कुलाचें भरने दो
समय चीखता-चिल्लाता है
तो चीखने चिल्लाने दो
समय अकुलाता है
तो अकुलाने दो
समय विलाप करता है
तो सुनो समय का विलाप
अच्छा है समय का गतिमान रहना
कुलाचें भरना
चीखना-चिल्लाना
हांफना
और विलाप करना
बजाय इसके कि
समय रूक जाए
बजाए इसके कि
समय गूंगा-बहरा
और पंगु हो जाए
बजाए इसके कि
समय कोमा में चला जाए।

मुझे छोड़कर

सब बेईमान हैं
मुझे छोड़कर
सब लालची हैं
मुझे छोड़कर
सब कामचोर हैं
मुझे छोड़कर
सब आलसी हैं
मुझे छोड़कर
सब स्वार्थी हैं
मुझे छोड़कर
सबझूठे-मक्कार हैं
मुझे छोड़कर
सबको सुधरना चाहिए
मुझे छोड़कर
सभी को सच बोलना चाहिए
मुझे छोड़कर
सभी को ईमान से रहना चाहिए
बस मुझे छोड़कर
सबको काम करना चाहिए
बस मुझे छोड़कर

प्रतिरोध
हम चुप कब थे
हम तो लगातार बोल रहे थे
हम बोलते रहे
लिखते रहे
चीखते-चिल्लाते रहे
हम जताते रहे
प्रतिरोध
लगातार
खिलाफ हवाओं के विरूद्ध
वक्त के आंवे में
एक-एक शब्द पका कर
हमने तैयार की
पुख्ता बुनियाद पर
प्रतिरोध की ठोस इमारत
जो नहीं हिली तनिक भी
किसी तूफान में
भूकम्प का कोई भी झटका
हिला नहीं सका जिसे
इसी इमारत की छत के नीचे बैठकर
लाख मनाही के बावजूद
हमने लिखी कविताएं
विलोम हवाओं की लाख कोशिश के बावजूद
हमारे शब्द अभी तक थके नहीं
शब्द जो
परवाज भरते हैं
विलोम हवाओं के खिलाफ
हमें धमकाया गया
हमें डराया गया
हमें फुसलाया गया
हमें बहकाया गया
पर हम डरे नहीं
हम बहक नहीं पाए
हममें जिंदा है अब भी
वही आक्रोश
वही अवसाद
जो रूकने नहीं देता हमें
जो हौसला देता है
निरंतर
प्रतिगामी हवाओं के खिलाफ चलने का।

तमाशबीन

जो तमाशबीन हैं
कल वे भी
बन जाएंगे तमाशे का हिस्सा
क्रूर समय के इशारे पर
उछलेंगे, कूदेंगे, नाचेंगे
हंसेगे, रोएंगे, गाएंगे जमूरे की तरह
यह सब देख
लोग तालियां बजाएंगे
ठहाके लगाएंगे
इस बात से बेखबर
कि कल समय
उन्हें भी नचाएगा जमूरा बनाकर
समय किसी को नहीं बख्शेगा
मदारी समय की आंख के कैमरे में
कैद हो चुकी है
मजमे में शामिल हर तमाशबीन की तस्वीर
इसलिए मेहरबान कदरदान
होशियार हो जाओ
कल तुम्हारी बारी है।

हवा के नाम खत

आज फिर लिख रहा हूं
पछुआ हवा के नाम खुली चिट्ठी
पछुआ हवा!
अब तुम मत आना मेरे गांव
तुम्हारे आने से मुरझाने लगती हैं
देशी गुलाब की कोमल पंखुरिया
पछुआ हवा, बड़ी भयावह है-
तुम्हारी सांय-सांय की आवाज
तुम्हारे आने पर
बच्चे गुल्ली डंडा खेलना छोड़
बन्द कमरे में
कम्प्यूटर से चिपक जाते हैं
पछुआ हवा मत आना लेकर
अब बन्द पैकेट और ठण्डी बोतलें
तुम्हारे आने से
हमारी गायों के थन सूख जाते हैं
पछुआ हवा
अब मत बुझाना कोई पहेली
हम तुम्हारा सच जान चुके हैं
पछुआ हवा मत आना
अब दोबारा कोई तिलस्म लेकर
मेरे गांव
अब हम तुम्हारी नीयत भांप चुके हैं

न जाने कल कैसा हो

आज जी भर कर चांद को निहार लो
सुबह की धूप में आंगन बुहार लो
न जाने कल कैसा हो
आज बारिश में भीग लो
जमना में नहा लो
आज कुछ गीत गुनगुना लो
जी भरकर नाच गा लो
न जाने कल कैसा हो
रात रानी की गन्ध आज सासों में भर लो
किसी पे जी लो किसी पर मर लो
आज कुछ मनचाहा कर लो
न जाने कल कैसा हो
जी भर कर हंस लो
आंखे भर आए तो जी भर रो लो
कुछ अपनों की-कुछ अपनी सुन लो
न जाने कल कैसा हो।

——

नाम –चन्द्र प्रकाश श्रीवास्तव
जन्म 1966 ई, आजमगढ़, उ0 प्र0
शिक्षा बी.एस.सी. के पष्चात सिविल अभियांत्रिकी मे डिप्लोमा
जीविका सरकारी नौकरी

विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित। आकाशवाणी तथा दूरदर्शन से कविताएं प्रसारित
संकलन नौ कवियों के संकलन ‘दिशाविद’ में नौ कविताएॅं संकलित ।
अन्य- अमर उजाला के संपादकीय डेस्क पर कुछ दिन काम किया। फिर स्वेच्छा से छोड़ दिया ।
पता 208 गंगोत्री, हवेलिया, झूंसी,
इलाहाबाद
फोन 09451372281

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