डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी की 2 लघुकथाएं

  1. मुखौटे

साथ-साथ खड़े दो लोगों ने आसपास किसी को न पाकर सालों बाद अपने मुखौटे उतारे। दोनों एक-दूसरे के ‘दोस्त’ थे। उन्होंने एक दूसरे को गले लगाया और सुख दुःख की बातें की।

फिर एक ने पूछा, “तुम्हारे मुखौटे का क्या हाल है?”

दूसरे ने मुस्कुरा कर उत्तर दिया, “उसका तो मुझे नहीं पता, लेकिन तुम्हारे मुखौटे के हर रग और हर रंग को मैं बखूबी जानता हूँ।”

पहले ने चकित होते हुए कहा,”अच्छा! मैं भी खुदके मुखौटे से ज़्यादा तुम्हारे मुखौटे के हावभावों को अच्छी तरह समझता हूँ।”

दोनों हाथ मिला कर हंसने लगे।

इतने में उन्होंने देखा कि दूर से भीड़ आ रही है, दोनों ने अपने-अपने मुखौटे पहन लिये।

अब दोनों एक दूसरे के प्रबल विरोधी और शत्रु थे, अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेता।

  • मेरी याद

रोज़ की तरह ही वह बूढा व्यक्ति किताबों की दुकान पर आया, आज के सारे समाचार पत्र खरीदे और वहीँ बाहर बैठ कर उन्हें एक-एक कर पढ़ने लगा, हर समाचार पत्र को पांच-छः मिनट देखता फिर निराशा से रख देता। 

आज दुकानदार के बेटे से रहा नहीं गया, उसने जिज्ञासावश उनसे पूछ लिया, “आप ये रोज़ क्या देखते हैं?”

“दो साल हो गए… अख़बार में अपनी फोटो ढूंढ रहा हूँ….” बूढ़े व्यक्ति ने निराशा भरे स्वर में उत्तर दिया।

यह सुनकर दुकानदार के बेटे को हंसी आ गयी, उसने किसी तरह अपनी हंसी को रोका और व्यंग्यात्मक स्वर में पूछा, “आपकी फोटो अख़बार में कहाँ छपेगी?”

“गुमशुदा की तलाश में…” कहते हुए उस बूढ़े ने अगला समाचार-पत्र उठा लिया।

डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी

सहायक आचार्य (कंप्यूटर विज्ञान)
जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय, उदयपुर (राजस्थान) 
पता – 3 प 46, प्रभात नगर, सेक्टर – 5, हिरण मगरी, उदयपुर (राजस्थान) – 313002
फोन – 99285 44749ई-मेल –chandresh.chhatlani@gmail.comयू आर एल – http://chandreshkumar.wikifoundry.com
लेखन – लघुकथा, कहानी,  कविता, ग़ज़ल, गीत, लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।

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