डॉ छवि निगम की पांच कविताएं

स्वतंत्रता

एक भेड़ के पीछे पीछे

खड्ढे में गिरती जाती अंधाधुंध पूरी कतार को

भाईचारे को मिमियाती पूरी इस कौम

इतनी सारी ‘मैं’

हम न हो पायीं जिनकी अब तक, उनको…

चंहु ओर होते परिवर्तन से बेखबर

चाबुक खाते

आधी आँखों पे पड़े  परदे से सच आंकते

झिर्री भर साम्यवाद को पूरा सच समझते

दुलत्ती भूल जो

चाबुक खाने की अफीम चख ,बस एक सीध में दौड़ लगाते,उन्हें भी तो…

और बाहर निकलने की कोशिश में

टोकरी के खुले

मुहँ तक बस पहुँचने ही वाले

अपने जुझारू साथी केकड़े को खींच घसीट कर

वापस पेंदे में पटककर

समानता का जश्न मनाते वो सब,जी उनको भी…

जुगाली करते

किसी बिसरे सुनहरे युग की

आँखें मूंदे , ऊबते,जम्हाई लेते

फिर इसी संतुष्टि को उगल देते इर्द गिर्द

भ्रमित इसी पीढ़ी पे जो,उन्ही ठेकेदार सम्प्रभुओं को…

हर इन्कलाब की आहट पर

उदासीनता की रेत में सर घुसेड़े

निश्चिन्त झपकते

व्यक्तिवादी शुतुरमुर्ग को भी तो…

मठाध्यक्ष कछुए

उस लपलपाते सेक्युलर गिरगिट

और विकासशील  घोंघे को भी…

जिबह हो जाने की तयशुदा बदकिस्मती को नकारती

बाज़ार का मांसल आकर्षण बनती

इतराती, मुस्कान के मुलम्मे तले  एक चुप मौत को जीती जाती

आधी आबादी की इसी मासूमियत को…

और खुले पिंजरे को  दिल से कस कर भींचे

अपने लोकतन्त्र के मिट्ठू को….

समाजवादी तालाब की मछलियों और बगुले जी को भी…

जी हाँ!

हम सभी को

आज़ादी मुबारक!

   

यह कविता है

यह क्या एक कागज़ रंगा?

नहीं बेटा!

यह कविता है।

यह कविता है?

पर इसपर तो नदी  नहीं, न ही झरना

तितली, फूल,महल न सुंदर झुनझुना

मेरी लुभावनी नाव सी, कविता बने।

 

उफ़!फिर से समय की बर्बादी?

नहीं मित्र!

यह कविता है।

यह कविता है?

पर न इसमें है दर्द, न  मरती आबादी

न कोई विद्रोह, न सुलगती आज़ादी

मेरे लहू का रंग भरे, कविता बने।

 

इस उम्र में ,निराशा यों घनघोर?

नही बाबा!

यह कविता है।

यह कविता है?

न टूटते सपने इसमें, न झुर्रियों के छोर

न झुकते लाचार कंधे, आँखों के नम कोर

सुखद सिहरन के स्पर्श सी, कविता बने।

 

प्रिय प्रतिबिम्ब मेरे, खत्म तेरी अभिलाषा?

नहीं दर्पण!

यह कविता है।

यह कविता है?

सबकी इच्छाएं सम्मिलित, पर न तेरी भाषा

न सबके अनुरूप ये,न ही सबकी आशा

बस तुम कहो और मैं सुनूँ, कविता बने।

 

शब्द

तो बकौल आइन्स्टीन

पदार्थ न मरता है, न बनता

ऊर्जा तक बन सकता है इक निरा पत्थर..

अच्छा!

शब्दों को क्यों नही बूझा किसी ने?

वो भी तो नहीं बनते,मिटते भी नहीं

कहीं कुछ नया नहीं होता कभी कहने सुनने को।

सदियों पहले की कहा सुनी

कान के पर्दे से टकराते रहती है देखो आज भी ..

हीर सोहनी लैला जूलियट.. हाँ,सुनती हूँ तुम्हें सच

समा कर तुम में, मीरा -सी जी लेती हूँ

उफ्फ़!

देह को जिंदा कर जाते हैं, फिर मुर्दा भी

सुकरात के प्याले में घुले आह ये शब्द…

कहाँ बंधेंगे!

पारे की बूँद से ढुलक  जाते

कभी पहाड़ हो जाते,किसी मांझी के घन का इंतज़ार करते करते

प्यार के प्यास की भाप कभी उड़ जाती

कभी बारिश की नमी सी जम जाती इन्हीं शब्दों मे

सुनो!

बदल दो न प्यार को भी आइंस्टीन के ‘मैटर ‘में।

शब्दों से उसे जमा लूँ

पिघला भी लूँ कभी मैं

ठंडे लावे से तर कर लूं रूह अपनी।

बस ये बावरा दिल अब बुद्ध हो ले

बेलौस निकल पड़े ,बंजारे शब्दों की राह खोजे..

 

“देखना”

देखो न

बहुत कुछ बचा रह  गया है

बाकी अभी भी

मेरी पिटारी में..

एक अंकुर

लुका छिपा है अरे

रेगिस्तानो  के बंजर अंक में कहीं,

इक किलकारी है

सहमी सी

दहशतों के कातिल गर्भ में धंसी हुई।

हाँ,है एक

थरथराती रेखा

उजास की

खामोश-कालिखों की गोद में खेलती,

लड़खड़ाती छत भी है

अंधड़ों पर सधी अब तक

एक किरन भर उजास सही

दरकती दीवारों में हौसला अभी है बाकी।

ये चटखी सी चौखट ही

नयी सृष्टि की होगी बानगी देखना तुम

बागबान हूँ मैँ!

आखों में धूप संजोये

उगा ही लूँगा घोंसले नये

कोंपल सरीखे

खिलन्दड़े बदरा सीन्चेगे जिसे..

बगिया इक सुंदर सपने सी

खिला लूँगा

पिटारी रख अपनी  क्षितिज पर

नींव में मिल जाऊँगा

उर्वरता उपजा लूँगा

सूरज चंदा चमका लूँगा

तुम देखना…

 

प्यार

हाँ भूल चुकी हूँ तुम्हें

पूरी तरह से

वैसे ही

जैसे भूल जाया करते हैं बारहखड़ी

तेरह का पहाड़ा

जैसे पहली गुल्लक फूटने पर रोना

फिर मुस्काना

घुटनों पर आई पहली रगड़

गालों पे पहली लाली का आना

तितली के पंखों की हथेली पर छुअन

टिफिन के पराठों का अचार रसा स्वाद

वो पहली पहल शर्माना..

पर जाने क्यों

बेख़याली में कभी

दुआओं में मेरी

एक नाम चोरी से चला आता है चुपचाप

घुसपैठिया कहीं का!

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