वो जहां जाते हैं, दक्खिन टोला साथ चलता है

पुस्तक समीक्षा

कहानी संग्रह : दक्खिन टोला

कहानीकार : कमलेश

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन

मूल्य : 300 रुपए

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव

बाहर से जो साबूत गांव दिखता है, अन्दर से वह उतना साबूत भी नहीं होता। होश संभालने से पहले ही जाति का वायरस खून को ऐसा संक्रमित करता है कि एक गांव में ही कई-कई गांव बसते हैं। अलग टोले, अलग लोग, अलग भूमिका, अलग दुख, अलग सुख। गांव के ऐसे ही टोलों में एक है दक्खिन टोला। दलितों का टोला। मुसहरों का टोला। यहां वे लोग रहते हैं, जिन्हें खुद को सभ्य कहने वाला समाज अछूत मानता है, छोटी जाति कहता है। गांव के हाशिए पर बसे ये टोले सदियों से वंचित और शोषित हैं। कथाकार कमलेश ने अपने कहानी संग्रह ‘दक्खिन टोला’ में इसी टोले की कहानी कहते हैं। इन कहानियों में न कोई बनावटीपन है, न ही नाटकीयता। इसलिए इन कहानियों के किरदार जाने पहचाने लगेंगे और जाने-पहचाने लोगों की कहानियां हमेशा बांध लेती हैं।

वाणी प्रकाशन से आए इस संग्रह में ‘दक्खिन टोला’ नाम से भी एक कहानी है लेकिन रेखांकित करने वाली बात यह है कि संग्रह की बाकी 9 अन्य कहानियां भी इस टोले की ही हैं। जो लोग दक्खिन टोला से वाकिफ़ नहीं हैं, उन्हें पहले इस टोला के बारे में बता दें। संग्रह के शीर्षक कहानी ‘दक्खिन टोला’ में किरदारों के संवाद के जरिए इस पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है। पूरी बातचीत पढ़िए और समझिए दक्खिन टोले का कॉन्सेप्ट :

***

“बिहार में कहीं भी चले जाओ मुसहरों का घर दक्खिन टोला में ही होता है बाबू। यहां भी दक्खिन टोला में है।” नवादा वाले लड़के ने अपने पांव फैलाते हुए कहा।

“लेकिन ऐसा क्यों है? आखिर मुसहर लोग उतरवारी टोला या पूरवारी टोला में क्यों नहीं रहते हैं?”शंकर ने पलक झपकाते हुए पूछा।

“एकदम पगला है का? अरे उ सब टोला में उ लोग रहते हैं, जिनके यहां मुसहर और दूसरे लोग  काम करते हैं।” उस लड़के ने ऐसे समझाया, जैसे छोटे बच्चे को समझाया जाता है।

तभी सुदर्शन पासी ने दीवार की ओट लेते हुए कहा,  “एक और कारण है। तुम लोगों ने देखा है कि मरे आदमी को जब चिता पर रखा जाता है तो उसका सिर किस तरफ होता है? हमेशा दक्खिन की तरफ। मतलब दक्खिन के तरफ यम का घर होता है। बड़का लोग अभी भी मानता है कि यम हमेशा दक्खिन की तरफ से आता है। इसलिए बहुत पहले से यह कहा जाता है कि मुसहरों को दक्खिन टोला में रखो। यम उनका खाकर लौट जाएगा।”

“एक कारण और है साथी।” इस बार मुजफ्फरपुर वाले लड़के ने मुंह खोला था, “हवा अधिकतर पूरब या पच्छीम से बहती है—पूरवा या पछिया। अब हमलोग पुरवारी टोला या उतरवारी टोला में रहेंगे तो हवा पहले हमलोगों के घर में आएगी और तब बड़का लोगों के घर में पहुंचेगी। अब जो पहले हमलोगों के देह को छू चुकी है, वही हवा बड़का लोग के देह में लगेगी तो वे लोग अपवित्तर हो जाएंगे न?”

***

अंधविश्वास ही सही लेकिन मुसहरों को अस्पृश्य घोषित करने वालों ने उन्हें ही यम के खिलाफ अपना ढाल बनाया। मौत आए तो पहले मुसहर मरे, ताजी हवा की बात हो तो वह उन्हें सबसे बाद में मिले। वंचना की ऐसी साज़िश आपको शायद ही किसी और समाज़ में मिले। कमलेश की इन कहानियों में मुसहरों की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक  स्थिति और अवस्थान का यथार्थ चित्रण हुआ है।

इन ‘बड़े लोगों’ को मुसहरों के श्रम से गुरेज नहीं, उनकी जमीन पर कब्जा करने में भी कोई हिचक नहीं, उनकी औरतों पर भी बुरी नज़र। ये अस्पृश्य नहीं हैं लेकिन पूरा का पूरा दक्खिन टोला अछूत और नरक है। उन्हें पेट पर खाना भी मिल जाए तो ‘बड़े लोगों’ को अखरने लगता है। तभी तो उन्होंने कहना शुरू किया होगा ‘भुइया केतना दूर देखता है तो थाली जेतना’ (कहानी-दक्खिन टोला) या फिर ‘पेट भर खा लिया बस मता गया है। लबनी भर धान में भुइया बउराइल’ (कहानी-दक्खिन टोला)। मुसहरों के लिए प्रचलित ये कहावतें अपमानजनक तो हैं ही, उनकी चरम गरीबी की कहानी भी कहती हैं। पेट भर खाना मिलना भी कितना दूभर। उनकी मेहनत से ऊंची जाति के किसानों की डेहरियां अनाज से भरतीं रहें लेकिन वो मूस (चूहा) खाने को मजबूर होते रहे।

उनकी सामाजिक हैसियत ऐसी कि “जब पुलिस हरिजन टोला में घुसती थी तो सन्नाटा छा जाता था। पुलिस की वर्दी देखते ही सब मर्द लोग टोले से भाग खड़े होते थे। फिर तो मुर्गी से लेकर औरत तक, जिस पर भी हाथ रख लो वह तुम्हारी। बबुआन टोले के लड़के तो ससुरे उधरे घूमते रहते थे।” (कहानी-हत्यारा)। अगर शक्ल सूरत अच्छी हो गई तो इसके लिए भी जिल्लत झेलनी पड़ती है।  ‘अच्छा तो मुसहर है लेकिन देखने में तो मुसहर नहीं लगता। लगता है बाबू साहेब लोगन की किरपा हुआ है।’ कहकर वह आदमी जोर से हंसा। (कहानी : डफ बज रहा है)। ‘ए शिवपूजन बाबू, जब आपके गांव का मुसहर लड़का सब एतना चिकन चुनमुन है तो औरत सब तो जान ले लेती होगी।’ (कहानी : डफ बज रहा है)

इस टोला के युवकों का भविष्य भी कैसा, यह भी जान लीजिए  “देख रे बाबू, मुसहर के लिए केवल तीन ही रास्ते हैं पहला तो यह कि वह खेत पर काम करे, ढोर-डांगर चराए और चराते-चराते मर जाए। दूसरा रास्ता है नसलाइट हो जाए और किसी दिन पुलिस की गोली उसे ठंडा कर दे। तीसरा रास्ता है कि चोर बने और जब तक जीए मौज में जीए। और कोई रास्ता नहीं।”( कहानी : ज़मीन)

पहले से तय कर दी गई इस भविष्य को ठेंगा दिखाते हुए इस टोले का कोई बच्चा जब मैट्रिक पास करता है ‘बाबू लोगों’ के मन में पहला सवाल यही उठता है कि अब वह मजदूरी नहीं करेगा क्या? ऐसे संभावनाशील युवक को बंदूक उठाने के लिए मजबूर करने में वो कोई कसर नहीं छोड़ते। ‘डफ बज रहा है’ कहानी में केसो तो ऐसी साजिश का तो शिकार हो जाता है। टोले का पहला मैट्रिक पास लड़का बंदूक उठाने को मजबूर होता है और आखिरकार उसका एनकाउंटर कर दिया जाता है।      

दरअसल दक्खिन टोला में जन्म होने के साथ ही ज़िन्दगी अभिशप्त हो जाती है। शापमोचन की कोई राह नहीं। ताकतवर के जुर्म के खिलाफ लड़ाई के लिए ताकत चाहिए। यह ताकत उस पार्टी ने दी, जिससे जुड़ने वाले युवकों को नक्सल कहा गया। कड़वी सच्चाई यह है कि जाति के क्रम में सबसे निचले पायदान पर होने के चलते कानून-संविधान सब इनकी पहुंच से बाहर। इसकी वजह से समस्या लगातार विकराल होती गई और इससे कई सामाजिक, राजनीतिक, आपराधिक पहलू जुड़ते चले गए। कमलेश की कहानियों में ये सभी पहलू प्रभावी ढंग से आए हैं।

इस अंतहीन लड़ाई में हर कदम पर मौत का खतरा था लेकिन इसमें भी कोई शक नहीं कि इस लड़ाई से बहुत कुछ बदला भी। शूद्रों की बस्ती में पहले जिन औरतों पर हाथ डालते ही पुलिस या बबुआन लोगों को लगता था कि यह उनकी हो गई, उन औरतों में उनकी आंखों में आंखें डाल कर बात करने की हिम्मत आई। ‘हत्यारा’ कहानी में जब औरतें पुलिसवालों के सवालों के जवाब उनकी आंखों में आंखें डालकर देती हैं तो उनके पसीने छूट जाते हैं। ‘गड़हा’ कहानी में भी इस बदलाव को दर्ज किया गया है। यह कहानी गांव की गंदी राजनीति को परत दर परत उजागर करती है। स्वार्थ साधने के लिए गरीबों और पिछड़ों को मोहरा बनाने की गंदी राजनीति का खुलासा करती है। इस पूरी राजनीति में उन मुसहर महिलाओं के बारे में कोई नहीं सोचता, जो सिर्फ शौचालय की मांग कर रही हैं। जिस गड़हे का इस्तेमाल फिलहाल सुबह फारिग होने के लिए किया जाता है, उस गड़हे पर कब्जे की लड़ाई ठन गई है लेकिन जब महिलाओं उठ खड़ी होती हैं तो पूरा समीकरण ही बदल जाता है

इस हिंसक लड़ाई का अन्त कहां? दक्खिन टोला कहानी में शंकर जब अपने कमांडर से यह सवाल पूछता है तो वह कहता है कि लड़ाई वह भी नहीं चाहते लेकिन लड़ाई उन पर थोपी गई है। शंकर के पिता जातीय नरसंहार के शिकार हुए थे। इसलिए उसके चाचा चाहते हैं कि वह हथियार उठाए और बदला ले लेकिन शंकर हथियार नहीं उठाना चाहता। लड़ना नहीं चाहता। वह गाना चाहता है। वह जब गाता है तो लोग मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। गाने के लिए वह पार्टी छोड़ कर नाच पार्टी में शामिल होता है लेकिन वहां भी उसे उसकी जगह बताई जाती है। ऐसे में शंकर जैसे युवक क्या करेंगे?  किस राह जाएंगे? एक ऐसा वक्त भी आता है जब कोई राह बचती ही नहीं है। जिस पार्टी का गठन दलितों, मुसहरों का हक छीनने के लिए हुआ था, वही पार्टी जब चुनावी समर में कूद पड़ी तो सबकुछ बदल गया। सामने जब कुर्सी दिखने लगे तो फिर सारे उद्देश्य, आदर्श धरे के धरे रह जाते हैं। फिर तो कुर्सी के लिए पार्टी को उनकी गोदी में बैठते भी देर नहीं लगी, जिनके साथ उनकी लडाई थी। ‘दुश्मन’ कहानी में इस मुसहरों-दलितों के इस दुश्मन के चेहरे को बेनकाब करने में कमलेश की कलम जरा भी नहीं झिझकती। ‘दुश्मन’ कहानी सृंजय की बहुचर्चित कहानी ‘कामरेड का कोट’ से आगे की कहानी कहती है और बहुत बेखौफ होकर कहती है। दरअसल दक्खिन टोला मुसहरों की नियति बन गई है। चाहें समाज हो या राजनीति, वो जहां जाते हैं, उनके साथ यह टोला चलता है। इन्हीं के भरोसे कुर्सी का सपना देखने वाले नेता इन्हें राजनीति में भी दक्खिन की राह ही दिखाने की कोशिश करते हैं। आप दलित राजनीति का इतिहास और वर्तमान देख लीजिए। आपको तमाम उदाहरण बिखरे मिल जाएंगे।

इसलिए ‘दक्खिन टोला’ अब केवल गांव नहीं हैं। जहां मुसहर हैं, वहां दक्खिन टोला हैं। जहां दलित हैं, वहां दक्खिन टोला है। ये जो शहरों में तमाम झुग्गियां उग आई हैं, उनकी स्थिति दक्खिन टोला से इतर है क्या?  पटना के कचहरिया मैदान में सुमेसर को दक्खिन टोला ही नज़र आया था।

प्रेम बड़े ही स्वाभाविक रूप से कमलेश की कहानियों में आया है। प्रेम कोई वर्जना नहीं मानता। इसलिए ऊंची जाति की लड़की को मुसहर लड़के से भी स्वाभाविक रूप से प्रेम हो जाता है। वर्जित प्रेम का खौफ़ दिमाग में जरूर रहता है लेकिन बावजूद इसके प्रेम में पड़े कमलेश के किरदार अचानक चौंका देते हैं। चाहें वह ‘कठकरेजी’ की मीना हो या ‘बांध’ की उर्मिला। ‘मउगा’ की पुष्पा हो या ‘अंचरा पर लौंडा’ की बहुरिया। या फिर ‘ज़मीन’ की विधवा ब्राह्मणी।

बाढ़ की विभीषका झेल रहा पूरा गांव जब गंडक से प्रार्थना कर रहा होता है कि, ‘लहर सिकोड़िए गंडक माई। शांत हो जाइए। गांव-जवार से कोई गलती हुई तो माफ कीजिए।‘ ठीक उसी वक्त उर्मिला गंडक मां से अनुरोध करती है कि ‘अभी मत जाना मइया। चार दिन और रुक जाओ मइया। बस चार दिन और। जब इतने दिन कष्ट सहा है तो चार दिन और सह लूंगी। अभी अपना लहर पसारो मइया। एक बार फिर से अपना पुराना वाला क्रोध दिखाओ। नहीं दिखा सकती तो इसी रूप में चार दिन रुक जाओ मइया। अभी तो मैंने रामप्रीत को ठीक से देखा भी नहीं है।’ (कहानी : बांध) ऐसी उल्टी प्रार्थना का दुस्साहस कोई प्रेमी ही कर सकता है। ‘ज़मीन’ और कहानी को छोड़ दें तो इन प्रेम कहानियों की खासियत यह है कि यहां न तो देह है, न ही प्रेम को लेकर सार्वजनिक दीवानगी। भीषण बाढ़ से बांध पर विस्थापित ज़िन्दगी की तमाम तकलीफों के बीच प्यार हवा में इस तरह तैर रहा होता है कि उसे उर्मिला, रामप्रीत और पाठक तीनों महसूस करते हैं। रामप्रीम मुसहर है और उसका गांव में प्रवेश वर्जित है। जिसका गांव में ही प्रवेश वर्जित है, उसका एक ऊंची जाति की लड़की से प्रेम!  जाति का दंश झेल रहा रामप्रीत जब कहता है कि, ‘गांव में तो हम तुम्हारे टोला में नहीं आ पाएंगे। तुमको देखते हैं तो बहुते अच्छा लगता है। बाकिर अभी ठीक से देखे कहां हैं’ तो लगता है कि किसी ने मुठ्ठी खोल दी है और पूरे फिजां में प्यार की खुशबू बिखर गई हो। ऐसे में उर्मिला प्रेम के लिए उस कष्टपूर्ण जिंदगी की दुआ मांगती है, जिससे सिर्फ वही नहीं बल्कि सभी मुक्ति चाहते हैं।

‘मउगा’ और ‘अंचरा पर लौंडा’ कहानियां कमलेश को बड़े फलक का कहानीकार बनाती हैं। समाज के ऐसे किरदारों पर कहानी लिखना, जो समाज के लिए सिर्फ मजाक हैं, हर कथाकार के बूते की बात नहीं। इन दोनों कहानियों के नायक नौटंकी में नाचते हैं। इन्हें लौंडा कहा जाता है। मउगा बुलाया जाता है। ये संबोधन उनकी पहचान भी हैं और उन्हें प्रताड़ित करने के हथियार भी। सच तो यह है कि इनकी जिन्दगी तो औरतों से भी बदतर है। इन कहानियों में न केवल इनकी ज़िन्दगी का नरक सामने आता है, बल्कि उनके अंदर का इंसान भी। उनके पास भी दिल है। वो प्रेम भी कर सकते हैं और कुर्बानी भी दे सकते हैं।

‘दक्खिन टोला’ की कहानियां आरा-बक्सर के आसपास के इलाकों की हैं। कहानी में ये स्थान अपनी उपस्थिति हर तरह से दर्ज कराते हैं। भाषा से लेकर रहन सहन तक का वर्णन वैसा ही। भोजपुरी लोकगीतों और फिल्मी गीतों का समावेश उसी स्वाभाविक ढंग से हुआ है। इससे कहानियों का प्रभाव और तगड़ा हुआ है। अगर आप आरा-बक्सर कभी गए होंगे तो इन कहानियों से गुजरते हुए आपको महसूस होगा कि आप वहीं  का सफर कर रहे हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *