भरत प्रसाद की कहानी ‘देख तमाशा पानी का’

यह पानी भी न, कमाल का मायावी है भाई। पूछो तो कहाँ नहीं घुसा हुआ है ? जीव में, जानवर में, मिट्टी और पत्थर पेड़-पालों, बंजर-धरती, आकाश यहाँ तक कि हवा का भी पीछा नहीं छोड़ता। होगी हवा उड़नछू, पानी उसका भी बाप है। वैसे पानी है बेरंगा, मगर इसके बगैर किसी रंग का अर्थ नहीं। लाल, हरा, नीला, पीला यहाँ तक कि काला रंग भी पानी का बेतरह प्यासा है। पानी को न जाने किस गोबर बुद्धि ने कहा बेस्वाद, उसके आगे तो सारे स्वाद बौने हैं, नगण्य, बेअर्थ।

पानी पानी में जमीन-आसमान का फर्क है। एक पानी है तो आदमी आदमी है। एक और पानी किसी को चढ़ गया तो सब किया धरा मिट्टी में मिला। एक पानी नजरों में उठा देता है, मगर दूसरा पानी सबकी नजर से गिरा देता है। एक पानी जीवन, तो दूसरा पानी मौत। एक की प्यास जगा देती है तो दूसरे की प्यास बेदम कर देती है।

जहाँ देखो वहीं जोर है पानी का। कोई पानी पीकर मरा जा रहा है कोई पानी के बिना। कोई उसे पी-पीकर रो रहा है, कोई उसके बगैर। एक पानी मिल जाए तो रोम-रोम जाग उठता है, दूसरा पानी चढ़ जाय तो शरीर में अन्धकार छा जाता है।

तो भइया पानी की विचित्र कहानी उसी की जुबानी सुनिए-

‘‘वैसे तो मुझे लाल पानी, ठर्रा, पाउच, वाइन जैसी अनेक उपाधियों से विभूषित किया गया है- मगर इनमें जो मुझे सबसे कर्णप्रिय, सुमधुर लगता है – वह है – दारू। यही शब्द मेरी प्रकृति के अनुसार फिट्ट बैठता है। मैं पृथ्वी के कोने-कोने में ईश्वर, माया, छाया की तरह व्याप्त हूँ। ऐसा कोई महापुरुष शायद ही मिले जिसकी जीभ पर कम से कम एक बार मैंने नृत्य न किया हो, ऐसी आँखें शायद ही मिलें जिनको हमने अपने जादू से लाल न किया हो। जो मेरे आशिक हैं उनको और जो विशुद्ध दुश्मन हैं उनको भी मैं बेतरह याद आती हूँ। आदमी के दिलो-दिमाग पर मेरा सिक्का चलता है। बड़ा गजब असर है मेरा-दूर से ही बदबू मारती हूँ, मगर मेरे करोड़ों भक्त आँखें मूंद कर गटक जाते हैं। स्वाद के मामले में मेरी चाल परले दर्जे की टेढ़ी, मगर मेरे चेले-चपाटे मेरे आगे अमृत भी ठुकरा देते हैं। इतना ही नहीं, मेरा रूप-रंग देखने में भी कुछ खास नहीं, मगर मेरी सूरत का जादू मेरे पिछलग्गुओं के सिर चढ़कर बोलता है।

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यह मैं ही हूँ  जिसकी चाहता  का नशा  उतना ही  अद्वितीय है, जितना वेदों-पुराणों-उपनिषदों के समय था। दुर्योधन और रावण जैसों के सिर हमारे लिए नृत्य का रंगमंच होते हैं। अहंकारियों, आत्ममुग्धों, मियां मिट्ठुओं का सिर मेरे लिए सबसे आरामदायक जगह होती है, क्योंकि यहाँ पर्याप्त खाली जगह है। ज्यादा सोचने वाले, करुणा में डूबे हुए, सीधे-साधे लोग मुझे रत्ती भर पसन्द नहीं आते। जब देखो तब मेरी खाल खींचते हैं जहाँ देखो तहाँ मेरी निन्दा फैलाने लगते हैं। इसीलिए मैंने भी ऐसे ठोस महाशयों को ‘आउटडेटेड’ सिद्ध करनेे की अचूक चाल चली है। इन्हें पोंगापंथी या कूपमण्डूक में से कुछ न कुछ घोषित करवाकर ही दम लेती हूँ। कई तो इन उपाधियों से डर कर मेरे आगे सरेंडर कर देते हैं। कुछ ज्ञानी-महात्मा मुझसे बचने का नाटक खेलते हैं, मगर मैं भी कुछ कम कहाँ ? स्वार्थ के व्यापारेां का ऐसा मायाजाल रचती हूँ कि इनको भी धूल चटाने की तर्ज पर पानी चटा देती हूँ। अरे तो बूझ ही लीजिए कि मैं विचित्र बला हूँ। मनमोहिनी कुछ ऐसी कि बिना बुलाए सब नाचीज की तरह खिंचे चले आते हैं। अपनी सही जगह से मियाँ एक कदम फिसले नीचे आए, डगमगाए कि तुरन्त उनके समीप मैं पहुँच जाती हूँ। मेरा असली पता ठिकाना आदमी के नस-नस में बैठी भेाग-वासना है, कामातुरता है, मक्कारी, झूठ, फरेब, चालबाजी, दो मुँहेपन और भ्रष्टाचार है। जिस तरह गटर के कीड़े का प्राण कीचड़ में बसता है, ठीक वैसे ही मेरी आत्मा आदमी के समस्त अवगुणों में। ईमानदार और खुद्दार टाइप के लोग मुझे फूटी आँखों नहीं सुहाते। मंत्री, अफसर, शिक्षक, विद्वान, मठाधीश, साधक, आराधक, नर्तक, गीतकार, नेता, अभिनेता, मालिक, नौकर, युवा, बुर्जुग, औरत, मर्द बताइए तो ऐसा कौन है जो मुझसे बच गया हो ? मंत्री होगा किसी क्रांतिकारी, शान्तिकारी, भ्रान्तिधारी पार्टी-शार्टी का, मेरे बगैर अगली सुबह उठने की कल्पना नहीं कर पाता। यकीन न आए तो लीजिए न नमूना। एक लम्बोदर काया वाले मंत्री बड़े ही संस्कारों वाली पार्टी के थे। दिन भर मंचों पर कटहा कुत्तों की तरह विरोधी पार्टी के नेताओं, उनकी नीतियों, प्रीतियों पर भौं-भौं करते और रात चढ़ते ही मुझे तीन-चार सील पैक बोतलों में मांगा लेते। मुझे किसी बात की शरम नहीं, हलक में उतरते ही तन-बदन में मीठे जहर की तरह फैलती हूँ। मंत्रियों का अंग-अंग तो कुम्भकर्णी काया का प्रतिरूप होता है, मुझे अपना जलवा बिखेरने में कुछ वक्त तो लगता है, मगर पेट में अपनी जड़ें जमा लेने के बाद मैं सीधे दिमाग पर धावा बोलती हूँ। उनकी दिमाग की बत्ती पहले से ही धुकधुकायी रहती है- मुझे पाते ही परम गुल्ल हो जाती है। फिर कब्जे में लेती हूँ आँखें- मेरे असर के मारे उलट जाती हैं दिनों बत्तियां। फिर तो  मंत्री छूटहर सांड  बन जाता  है, नोंचने-खाने वाला पक्का जानवर।

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जिसे औरत की तलब पागल कर देती है। जो दूसरे तो क्या, खुद को भी गाली देने से नहीं चूकता। उसकी जुबान का व्याकरण बिगाड़ कर रख देना केवल मेरे बूते है- केवल मेरे।

भारतवर्ष तो क्या समूचे भूमंडल के आला, मझोले, जूनियर, असिस्टेंट या लघु अधिकारी मेरे अखण्ड मायाजाल के दास हैं। दास न कहिए-भक्त, नहीं‘नहीं भक्त मत कहिए आशिक। स्पंजी कुर्सी में धंसने और आइने की नांई चमचमाती मेज के सामने बैठते ही प्रत्येक अफसर में ईश्वर होने का आत्मज्ञान सिर उठाने लगता है। फिर तो हुई न मेरी जगह पक्की। जमीन से पाँव उठे, सच्चाई से नजरें फिरीं, खुद को न पहचानने का अन्धापन छाया कि मेरा जादू सिर चढ़ा। आधा जिन्दा, आधा मुर्दा, आधा आदमी, आधा बेआदमी, आधा प्रकट आधा छिपी, आधा उठी और आधा गिरी हुई महान विभूतियाँ को भारतीय अफसर कहा जाता है। मेरी मौजूदगी के लिए एक चैथाई पशुता या मुट्ठीभर अंधकार काफी है – ये तो भरपूर बेआदमी और अंधकारी जीव होते हैं। तो जब कोई चाकलेटी माॅडल वाली अटैची या प्रेमपत्र जैसेे रंगीन लिफाफे में लक्ष्मी जी भकर महाशय की आत्मा तृप्त करता है तो मैं शर्तिया आसन जमा लेती हूँ अफसर में। पद के स्तरानुसार जैसे मेरी ब्रांड ऊपर उठती है, वैसे ही मेरे धावा बोलने का ग्राफ। एक नहीं, दो नहीं सौ-सौ बार अपने इशारे पर नचाती हूँ- इन बच्चों को। चार घूंट मारी कि शरीर बहकने लगी, आँखें आला दर्जे के हसीन सपने देखने लगीं। हूबहू मंत्रियों की तरह इन्हें भी स्त्री की बेहिसाब भूख लगती है। मेरा जादू कुछ ऐसा छाता है कि इनकी आँखें उम्र का फासला भूल जाती हैं- फिर तो चाहे बीस साल की महिला कर्मचारी हो, माई के चेहरे-मोहरे जैसी संस्थान की चपरासिन या सज्जना की प्रतिमूर्ति बेटीनुमा सीक्रेटरी, सबको हासिल करने की सनक तूफान बन जाती है। लाखों-करोड़ों रकम वाली योजनाओं के सौदागर, ईश्वर यही अफसर मेरे कारण बिक जाते हैं। सुपर ब्रांडेड बोतल में पैक करके कोई मुझे सौंप दे और अपने काले-रक्तिम, अन्धकारी कारनामों की सरकारी सर्टिफिकेट इन महापुरुषों से हासिल कर ले। मेरे असली असर की दशा में ये अपनी बेटियों और बहुओं को कितनी हसीन निगाहों से देखते होंगे, यह मेरे सिवाय कोई नहीं बता सकता।

अब एक राज की बात बताऊँ ? कहिए कि हाँ। तो सुनिए- साहित्य का नाम सुना है न ? मसलन उर्दू साहित्य, फारसी साहित्य, अंग्रेजी साहित्य। इसी तरह भारत देश में सदियों से नदी की तरह बहता चला आ रहा है हिन्दी साहित्य, आज वह किसी और नदी में बह रहा है। मतलब समझ गये न……! इस रंगीन नदी का न कोई ओर है न अंत, न किनारा है, न  डुबकी लगाने की सीमा। यूँ समझो कि बहती गंगा बन गयी

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हूँ मैं, जो भी साहित्य में श्रीगणेशाय नमः करता है वह मुझमें हाथ धो ही लेता है। मजा यह कि मेरे बगैर साहित्य बेमजा है। यह मैं ही हूँ जो अपने लहराते, मचलते, उद्दाम आगोश में हजारेां हिन्दी साहित्यकारों को लिए-दिए मुद्दतों से बह रही हूँ। नंगे होकर कूदने वाले नये-नये बच्चे मुझमें कुछ ज्यादा ही छपकोइया मारते हैं, बल्लियों उछलते हैं, शोरगुल मचाते हैं। जैसी नियत वैसी बरक्कत, जैसी शरीर वैसी छाया, जैसी जुबान वैसा आदर। हिन्दी साहित्य में कोहराम मचाने वाले ऐसे जलजीवी बच्चों की आमद रोज-जोर बढ़ रही है। अरे छोड़ो इन बच्चों को, जो बुजुर्ग हैं, महान हैं, परम विद्वान, प्रसिद्ध, मूर्धन्य हैं, युगान्तकारी हैं वे तो मुझमें कूदते ही बच्चों से अधिक बच्चा बन जाते हैं। उमिर कुछ अधिक अस्सी साल की, मगर कसम है जो साल भर में 364 दिन 11 घण्टा, 56 मिनट और 04 सेकेण्ड मेरे बगैर जी पाए हों। मंत्री, अफसर और साहित्यकार तीनों में एक ही विलक्षण समानता है- तीनों अक्सर चामदास होते हैं। अब तो मेरी ताकत को कालजयी बनाने के लिए इन चामदासों ने अपने गिरोह बना लिए हैं। कोई समारोह होगा तो मेरी आरती, कोई कोर बैठक होगी तो मेरी पूजा, कोई क्रांतिकारी साहित्यिक योजना बनेगी तो मेरे नाम की जय-जयकार। कई बार तो दम पर दम के आयोजनों के पीछे मुझे ही छक कर पीने की तमन्ना लहलहाती है। अब हिन्दी साहित्य में प्रसिद्धि, पुरस्कार, प्रशंसा, स्थापना, अमरता मेरा अमृतपान किए बगैर नहीं मिलती। बड़े-बड़े कलमेश्वरों को अपनी चर्चा के लिए पटाने में सबसे कारगर हथियार मैं ही हूँ।

पानी-पानी युद्ध:

यहाँ हमने जिन-जिन रसजीवों के उदाहरण दिए हैं वो तो बस सैम्पल समझो, एक झलकी। वरना तो मेरी घुसपैठ कोने-कोने में है। मेरा एक बड़ा भाई है, जिसकी इस मृत्युलोक में हैसियत ईश्वर से बाल बराबर भी कम नहीं, बल्कि उससे भी बेसी। आदमी उसे जीवन कहते हैं, क्योंकि उसके बगैर जीवन कोरी  कल्पना है। मैं हूँ तो उसकी सगी बहन मगर जानी दुश्मन की तरह अटस है उससे। रहस्य का पर्दा उठा ही दूं- यह है पानी, जिसे जल, नीर, वाटर इत्यादि नामों से बुलाया जाता है। इसमें न मेरे जैसी रंगीनियत, न नशीलापन, न आकर्षण- फिर भी पृथ्वी पर इसकी इज्जत मेरे से कई गुना अधिक है और यही मेरी ईष्या का सबसे बड़ा कारण है। फसलों की जड़ें इसका स्पर्श पाते ही प्राणमय हो जाती हैं। जानवरों की हलक में उतर कर यह उनका रोवां-रोवां हरियर कर देती है। कीमत इस कदर कि यह मान-सम्मान से लेकर प्राण के प्राण का प्रतीक बन चुकी है। कौन कहे कि मैं नहीं घुसी हूँ इसमें, मगर इसको मेरी कोई जरूरत नहीं। उल्टे मुझे ही इसकी बार-बार जरूरत पड़ती है। उफ्फ् ! यह शीतल इतना कि जैसे ताजा नरम मिट्टी, पारदर्शी इतना जैसे करुणामय हृदय। जिसके घर में यह है वहाँ मैं नहीं, जहाँ मैं हूँ वहाँ इसका मूल्य घट जाना तय।

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अपने शिकार की तलाश में घूमते-घामते मैं एक बुढ़िया के पास गयी तो देखती क्या हूँ  कि उसकी  आँखों में यह समुद्र  बनी हुई है । खटिया के नीचे सिरहाने यूं लोटे में लबालब बैठी है जैसे गंगाजल। बुढ़िया खाना खाती है तो पहले पानी से शुद्ध होकर। हवा की पीठ पर सवारी करके पहुँची उजाड़ बस्तियों के मंजर में। इन दिनों बुंदेलखण्ड, विदर्भ की चर्चा बड़ी जोरों पर है- वहाँ देखती क्या हूँ कि पानी कुंओं के पेट में चिपक गया है। चांदी जैसी उसकी झलक पाने को गरीब गुरबा गंवई लोग झुक गये हैं। कई गाँवों में हजारों गायें पानी की कल्पना करते-करते थक गई हैं, और अपने आंसुओं को जीभ से चाट चाट कर विदा रही हैं। कई घरों में तो पानी की टंकियों पर ताला जड़ दिया गया है, मानो उसमें सोना सुरक्षित हो। कई दिनों से पानी को तरसता एक किसान रात में चोरी करते पकड़ा गया। अब क्या बताऊँ कि घर-घर में पानी की यह ईश्वरनुमा इज्जत देखकर मेरे अंग-अंग में आग लग जाती है। काश, मुझे भी यह इज्जत मिलती। काश, मुझे भी पानी की तरह सबको जीवन देने का स्वभाव मिला होता। मगर मैं यह कैसे भूल जाऊँ कि मेरी आदत ही है छीनना। मैं किसी को कुछ दे भी सकती हूँ यह मेरी कल्पना से परे है। किसी नौजवान के पास गई तो उससे उसकी जवानी छीन कर ही दम लेती हूँ। न्यायाधीश के पास गई तो उससे उसकी सारी ईमानदारी। औरत के करीब पहुँची तो उसे डायन बना देती हूँ। यदि पुरुष के पास पहुँची तो उसे अंधकार में सड़ता हुआ मुर्दा।

इसीलिए आदतन मेरी उस पानी से जन्मजात दुश्मनी है और रहेगी। मैं उसकी अस्तित्व मिटाने का खेल खेलती हूँ। मेरे आसपास वह जहाँ भी दिखा उसे अपने में समा लेना चाहती हूँ। लगेगा बड़ा अजीब, मगर सच है कि युगों-युगों से मेरे ही परम शिष्यों ने पानी वालों पर जुल्म ढाए हैं। जो पानी वाला है वह मेरा शत्रुु है और जो मेरा वाला है वह पानी वालों का। मैं जिस किसी के सिर चढ़ी उसके अन्दर-बाहर का सारा सिस्टम बिगाड़ कर ही दम लिया। मेरी तमन्ना है कि पानी को दुनिया से बेदखल कर दूं और उसकी जगह मैं राज करूँ। चाहती तो यह भी हूँ कि छोटा हो या बड़ा, अच्छा हो या बुरा, अमीर हो या गरीब, सरनाम हो या बेनाम, दुखी हो या सुखी, पराजित हो या विजेता सबके सब मेरे आगे नतमस्तक हो जायँ, मेरी माया का लोहा मान लें, लोट जायँ मेरे चरणों में। आश्चर्यजनक रूप से मैं अपने मकसद में परम कामयाब भी हूँ। मगर पानी, पानी, पानी……… मुझे पानी की जगह पानी है। मुझे उसका हक छीनना है, मुझे उसको बेदखल करना है। इसीलिए हजारों सालों से अपनी माया के सौ-सौ रूप धारण कर  खतरनाक से खतरनाक खेला खेल रही हूँ, खेलती रहूंगी। जब तक पतन में नृत्य करने वाला यह मानव जीवित रहेगा तब तक मेरा कोई बाल  भी बांका नहीं कर सकता । इसीलिए पृथ्वी के इस ईश्वर से उसकी गद्दी छीनने की मेरी लड़ाई जारी है, दिन रात जारी है। मेरी जय हो…………, जय हो।’’

 

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भरत प्रसाद

एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग

पूर्वोत्तर पर्वतीय विश्वविद्यालय

शिलांग – 793022 (मेघालय)

मो. 9863076138

 

 

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2 Responses

  1. शहंशाह आलम says:

    भरत दा, कहानी प्रभावित करती है

  2. राजा सिंह says:

    बहुत खूब।

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