देवेंद्र कुमार पाठक के 4 गीत

देवेंद्र कुमार पाठक

म.प्र. के कटनी जिले के गांव भुड़सा में 27 अगस्त 1956 को एक किसान परिवार में जन्म.

शिक्षा-M.A.B.T.C. हिंदी शिक्षक पद से 2017 में सेवानिवृत्त. नाट्य लेखन को छोड़ कमोबेश सभी विधाओं में लिखा ……’महरूम’ तखल्लुस से गज़लें भी कहते हैं

2 उपन्यास, ( विधर्मी,अदना सा आदमी ) 4 कहानी संग्रह,( मुहिम, मरी खाल : आखिरी ताल,धरम धरे को दण्ड,चनसुरिया का सुख ) 1-1 व्यंग्य,ग़ज़ल और गीत-नवगीत संग्रह,( दिल का मामला है, दुनिया नहीं अँधेरी होगी, ओढ़ने को आस्मां है ) एक संग्रह ‘केंद्र में नवगीत’ का संपादन. ……  ‘ वागर्थ’, ‘नया ज्ञानोदय’, ‘अक्षरपर्व’, ‘ ‘अन्यथा’, ,’वीणा’, ‘कथन’, ‘नवनीत’, ‘अवकाश’ ‘, ‘शिखर वार्ता’, ‘हंस’, ‘भास्कर’ आदि पत्र-पत्रिकाओं में रचनायें प्रकाशित.आकाशवाणी,दूरदर्शन से प्रसारित. ‘दुष्यंतकुमार पुरस्कार’,’पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी पुरस्कार’ आदि कई पुरस्कारों से सम्मानित……. कमोबेश समूचा लेखन गांव-कस्बे के मजूर-किसानों  के जीवन की विसंगतियों,संघर्षों और सामाजिक,आर्थिक समस्याओं पर केंद्रित……                          ~~~~~~|||||~~~~~~
सम्पर्क-1315,साईंपुरम् कॉलोनी,रोशननगर,साइंस कॉलेज डाकघर,कटनी,कटनी,483501,म.प्र. मोबाईल-8120910105; ईमेल-devendrakpathak.dp@gmail.com1. राजा लबरा अउ ढोंगी है राजकाज अब लहपोंगी है.राजा लबरा अउ ढोंगी है.छीन रहे भुखहेन कै रोटी,भरपेटन कै नीयत खोटी; हल्कानी है हड़बोंगी है. राजा लबरा अउ ढोंगी है. नागनाथ कोउ साँपनाथ है,चोर-सिपाही साथ-साथ हैं; सब सत्ता के सुखभोगी हैं.राजा लबरा अउ ढोंगी है. गांव,शहर कस्बा, रजधानी;सब दर लूट,दगा,बेईमानी,हर ओहदा रिश्वतरोगी है.राजा लबरा अउ ढोंगी है.  थोथे दावे लचर दलीलें; जिन्दा माछी चातुर लीलें.लोकतंत्र फुटही डोंगी है.सांपन कै उतरी केंचुली है;बड़ बोलेन कै पोल खुली है.रावण आया बन जोगी है. 2.  कुहरा छाओ घनेरा कुहरा छाओ घनेरा अबहुँ भाई, देख  न पावैं सुबेरा अबहुँ भाई. हाँक रहे जबरी मुँहझौंसी; अगुआई कै धामड़-धौंसी;शासन सांप- गुहेरा अबहुँ भाई.कुहरा छाओ घनेरा अबहुँ भाई. दइजा बिना कस बिटिया बिआही, करज लेइ  खुद नेवती तबाही; रिश्तेदार लुटेरा अबहुँ भाई. काटेन पेट पढ़ायेन लरिका,रह गओ वोहू घाट न घर का;डिगरी लगाय रही फेरा अबहुँ भाई. घाटे का धंदा है खेती-किसानी; मँहगे खाद-बीज  अउ पानी.सब तर विपदा का डेरा अबहुँ भाई. देर-सबेर मदद सरकारी;खर्चा मांगें नायब-पटवारी;सब हैं चाम-उधेड़ा अबहुँ भाई.  ऊंट के मुँह  भई जीरा कमाई,मूंड़ पड़ी ससुरी मँहगाई; घर में बीमारी का डेरा.
3.   श्रमजीवी-श्रमसाधक हूँ

मैं अपने घर,गांव,देश और धरती का आराधक हूँ;
     श्रमजीवी-श्रम साधक हूँ.

जेठ तपे,सावन बरसे या पूष-माघ हिमवात चले;
हर ऋतु,हर मौसम में ये दो पाँव मेरे,दो हाथ चले;
मैं क्या जानूँ रुख बाजारू, हानि-लाभ की दशा-दिशा;
मैं श्रम,सेवा,त्याग, प्रेम,मानवता का प्रतिपादक हूँ. हाँ, मैं ही इस जग-जीवन का वर्तमान,आगत,गत हूँ; पर अपने कृतित्व के मूल्यांकन से विरत कर्मरत हूँ.
प्रभुता के पर्वत-शिखरों पर चढ़ना मेरा ध्येय नहीं,
मैं जन-जन की भूख-प्यास के प्रश्नों का हलकारक हूँ.

पलटे कई सिंहासन,कितने मुकुट गिरे-मैंने देखा;
गुजरे कितने दुर्दिन,कितने सुदिन फिरे-मैंने देखा;
पदमर्दित हो गई ध्वजाएँ और कई यश-गगन चढ़ीं;
मैं भूसुत हर बार, हर कहीं सृजन-धर्म अवधारक हूँ. 4. सुन जरा ये आहटें

सुन जरा ये आहटें संभावनाओं की.

पथ बहुत दुर्गम तेरा पर सतत् गतिमय पाँव भी,
है प्रखर दुपहर मगर मिलती है शीतल छाँव भी;
राह तेरी  देखती आँखें दिशाओं की.

माथ अपना ठोंकता क्यों इस तरह थक-हार कर तू,
है अभी यात्रा अधूरी बैठ मत मन मारकर तू;
थाम कर तू बाँह बढ़ प्रतिकूलताओं की.

रौशनी के बीज मुट्ठी में अँधेरा है छुपाये,
‘हार’ को भी जीत कर गलहार सीने पर सजाये-
सीढ़ियाँ चढ़ती सफलता विफलताओं की.

है हवा बदली हुई, मौसम हुआ अनुकूल है;
शीर्ष-शिखरों पर सुशोभित रास्तों की धूल है.
ध्वस्त दीवारें पड़ी हैं वर्जनाओं की.

कर रहा स्वागत तेरा आगत, विगत पर सोच मत तू;
शुभ-अशुभ परिणाम की चिंता न कर,हो कर्म रत तू;
अब फल-फूलेगी धरती साधनाओं की.

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