देवेंद्र कुमार की पांच कविताएं

आंखों में पानी 

डॉक्टर ने कहा आंखों में

ड्रायनेस है

आंसू नहीं बनते अब

कुछ दिनों में दिखना भी बंद हो जाएगा

दिखना बंद होने से पहले ही

बंद हो गए आंसू

देखकर भी नहीं बहता आंखों से आंसू

चाहे कुछ भी देख लो

डॉक्टर ने कहा

प्रदूषण बढ़ गया है

धीरे-धीरे सभी की आंखों में

आ रही ड्रायनेस

नहीं निकलेगा किसी की आंखों से आंसू

नहीं बचेगा आंखों में पानी

फिर कुछ दिखेगा भी नहीं

न देखने के दिखावे की

जरूरत भी नहीं पड़ेगी।

 

कलाल की बीवी

वह कलाल की बीवी थी

महुए को सुखाकर

शराब बनाती थी

बहुत नशा था

महुए के सुखे फल में

इसी के लिए शाम होते ही

लगता था जमावड़ा

उसके आंगन में

हर उम्र के लोग आते थे

शराब पीने और कलाल की बीवी

को देखने

नशे में उसके हाथों

को पकड़ लेते थे लोग

झिटककर घूरती थी

फटकार कर नहीं लेना

चाहती थी जोखिम

अपना मर्द तो

महुए के साथ गल गया था

उठने की हिम्मत भी नहीं थी

इस कदर डूब गया था

सहारे के लिए पत्नी ने दिया साथ

तो उसे भी गिरा दिया

खुद की नजरों से

अब वह भी पीने लगी थी

अपमान की घूंट के साथ

महुए का रस

भुलाना था उसे दर्द को

पेट भरने के संघर्ष को

घूरती निगाहों का

आंखों से देना था जवाब

पति द्वारा छोड़े गए हर उधार का

देना था हिसाब

वह कलाल की बीवी थी

शराब बनाती थी

संघर्ष में बाधक बनी पीढ़ी को

कर देना चाहती थी खत्म

जो पहले खेत में मजदूरी नहीं देते थे

शाम को पड़े रहते हैं उसकी चौखट पर

शान नहीं यह तो बदला था

अपमान का

संघर्ष से नहीं डरती थी

रोज मर्यादा वाले इस समाज से

लड़ती थी

खत्म कर देगी एक दिन

जो नशे में रहते हैं

वह कलाल की बीवी थी

शराब को जहर की तरह

परोसती थी।

 

खर्राटे 

पिता के खर्राटे से नींद

नहीं आती थी

फिर भी पता नहीं कब सो जाता था

कुछ देर में पिताजी मेरे खर्राटे से

जाग जाते थे

तसल्ली थी उन्हें

मैं चैन से सो रहा हूं

मेरी नींद के लिए

अभी भी जागने को थे तैयार

इस सुकून में

उन्हें भी नींद आ जाती थी

मैं जाग कर देखता था

घर के मुखिया को

कुछ पल आराम करते हुए

इस तरह एक-दूसरे के

खर्राटे का ध्यान रख

सोते हैं हम पूरी रात।

न होकर भी होना

घर पर न रहकर भी

हर पल होता हूं वहां

सुबह से लेकर घर के सोने तक

कई बार आता है मेरा नाम

मेरी पसंद की सब्जी बनने पर

तो कभी दुकान से सामान मंगवाने पर

रिश्तेदारों या पड़ोसियों के आने पर

या फिर बात करने के लिए कोई वजह न होने पर

मां-बाबा की जुबान पर

सेतु की तरह रहता हूं घर पर

बिना मेरे शुरू नहीं होता कोई काम

पुण्य का भागी मुझे बनाने

होते हैं कई अनुष्ठान

अकेले में रोने के लिए

मां भी मुझे ही करती है याद

बैंक जाने से पहले

बाबा करते हैं याद

मेरे वहां नहीं रहने पर

याद करने के लिए ढूंढते हैं बहाना

मेरे वहां होने के एहसास भर से

नियमित रहती है उनकी दिनचर्या

मेरी सहुलियत के अनुसार

करते हैं वे अपना सारा काम

पर कैसा मैं जीव हूं

जो रहकर भी नहीं रहता अपने साथ

अकेले रहने पर भी याद नहीं कर पाता घर

झूठी व्यस्तताओं का रहता है बहाना

तसल्ली देता हूं खुद को

लौटकर तो घर ही जाना है।

सवाल और जवाब

 पति पूछता है

कहां गई थी

उसके काम पर जाने के बाद

जिज्ञासा से ज्यादा

शक है सवाल में

सवाल तो शक में ही पूछते हैं

सवाल नहीं पूछ सकती पत्नी

उसे जवाब देना है

सवाल पूछना ज्यादा कठिन है

जवाब देने की अपेक्षा

यूं ही नहीं पूछ सकते सवाल

इसी शर्त पर तो रह रही थी

पति के साथ

कभी भी कोई भी

सवाल पूछ सकता था पति

जवाब देना था उसे

चुप रहने पर शक होता

होता आया है शक

चुप रहने वालों पर

अग्निपरीक्षा तक देनी होती है

चुप रहने वालों को

पता है उसे

जवाब देने पर भी

नहीं किया जाएगा विश्वास

वह जाती है

रोज जाती है

अपने अतीत में

अकेले में जाना ही पड़ता है

बीते दिनों में

तब भी देती थी जवाब

तब पूछे जाते थे ज्यादा सवाल

हर कदम पर पद चिन्ह की जगह

पड़ता है प्रश्न चिन्ह

चलने की कोशिश में

रुकने पर उठता है सवाल

किसका कर रही थी इंतजार

पति की संतुष्टि के लिए

हर सवाल का बनती है जवाब

पत्नी धर्म निभाने

हर जवाब का रखना होता है हिसाब।

 


नाम- देवेंद्र गोस्वामी (देवेंद्र कुमार)

जन्म- 11 मई 1981 को झारखंड के बोकारो जिले में।

शिक्षा- प्रारंभिक शिक्षा बोकारो से ही। कॉमर्स से स्नातक की पढ़ाई करने के बाद माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय से स्नातकोतर की उपाधि।

प्रकाशन- वागर्थ में पहली कविता का प्रकाशन (वर्ष 2006 में), इसके बाद वागर्थ, दस्तावेज, परिकथा, संवदिया, जनसत्ता वर्षिकांक, छत्तीसगढ़ मित्र, अमर उजाला आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता का प्रकाशन। इसके अलावा आकाशवाणी कोलकाता से कविताओं का प्रसारण। भारतीय भाषा परिषद् द्वारा संचालित युवा गोष्ठी में समन्वयक की भी भूमिका निभा चुके हैं।

पेशा- पत्रकारिता की शुरुआत हरिभूमि रायपुर से। इसके बाद अमर उजाला, नोएडा में एक साल तक रहे। लखनऊ में एक साप्ताहिक पत्रिका बाईलाइन में छह महीने तक रहा। दैनिक भास्कर के साथ लगभग सात साल से हैं। डीबी स्टार रायपुर में संपादक रह चुके हैं। फिलहाल दैनिक भास्कर रायपुर में समाचार संपादक हैं।

पुस्तक- मैं और शब्द कविता संग्रह का प्रकाशन।

पत्राचार का पता- देवेंद्र गोस्वामी, समाचार संपादक, दैनिक भास्कर, मकान नं.-292, सुंदर नगर, रायपुर, छत्तीसगढ़, पिन- 492013

फोन- 9575978390
ई-मेल- goswami.deven@gmail.com

 

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