मज़दूरों की पीड़ा को आवाज़ देने वाला उपन्यास ‘धर्मपुर लॉज’

चर्चित किताब

उपन्यास : धर्मपुर लॉज

लेखिका : प्रज्ञा

प्रकाशक :  लोकभारती प्रकाशन

मूल्य : 200 रुपए

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव

मज़दूरों की

अंधेरी गंदी बस्ती में

अब कोई कुछ नहीं बोलता

एक अजीब सन्नाटे ने

कफन की तरह

ढांप लिया है पूरी बस्ती को

जहां हर चीज भयावह लगती है।

पहले खामोश हुआ था

कारखाने का सायरन

फिर उम्मीद जगाते नारे

अब तो बिल्कुल सन्नाटा है।

कुत्ते भी नहीं भौंकते

और बच्चे?

वे तो अब किसी बात के लिए

जिद तक नहीं करते।

अभाव और सन्नाटे में

बच्चे जल्दी बड़े हो जाते हैं।

प्रज्ञा का सद्यप्रकाशित उपन्यास ‘धर्मपुर लॉज’ पढ़ते हुए मुझे अपनी ही यह कविता बार-बार याद आती रही। जिस अभाव और सन्नाटे को जीते हुए बरसों पहले यह कविता लिखी थी, ‘धर्मपुर लॉज’ पढ़ते हुए कई-कई बार मैंने उसी अभाव और सन्नाटे को फिर से महसूस किया। कारखाने की चिमनी जब धुआं उगलना भूल जाती है, तब मज़दूरों की बस्ती में कैसा मातम होता है, यह हर कोई नहीं  समझ सकता। प्रज्ञा ने इस उपन्यास में दिल्ली की बिरला कपड़ा मिल के मज़दूरों की कहानी लिखी है लेकिन मैं बार-बार पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना के नैहाटी में स्थित नदिया जूट मिल वाले इलाके में पहुंच जाता। लग रहा था, यह तो वहां के मज़दूरों की कहानी है। शोषण और वंचना के शिकार मेहनतकश वर्ग का दर्द एक ही होता है, चाहें वह दिल्ली हो या बंगाल।

उपन्यास सच्ची घटना पर आधारित है। मज़दूर नेता गुरु राधाकृष्ण की यादों को बड़ी ही संवेदनशीलता के साथ इस उपन्यास में सहेजा गया। दिल्ली में मास्टर प्लान और प्रदूषण के नाम पर किस तरह दिल्ली की 8338 फैक्ट्रियां बंद कर हजारों मज़दूरों को भाग्य भरोसे छोड़ दिया गया, इसका विशद वर्णन इस उपन्यास में है। बिरला मिल और दूसरी मिलों के मज़दूरों के संघर्ष को प्रस्तुत करता यह उपन्यास इसलिए एक ऐतिहासिक दस्तावेज भी बन जाता है। उपन्यास में गुरुजी का किरदार तो वास्तविक है ही, दूसरे ज्यादातर किरदार भी असली ही प्रतीत होते हैं। ‘ज़िन्दगी के भीतर, ज़िन्दगी के बाहर’  शीर्षक से लेखिका ने अपने पूर्वकथन में जिन  लोगों के प्रति आभार जताया है, उनमें भी कई अपने असली नाम के साथ ही उपन्यास में मौजूद हैं। किसी भी सच्चाई को बिना कल्पना उपन्यास के रूप में नहीं ढाला जा सकता, इसलिए कुछ पात्र और घटनाएं काल्पनिक भी होंगी ही। लेखिका के पूर्वकथन से यह आभास भी होता है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी के जिन छात्र-छात्राओं का धर्मपुर लॉज आना जाना था, उनमें वह भी शामिल रही होंगी। यही वजह है कि मज़दूरों की पीड़ा बिल्कुल सटीक और वास्तविक रूप में उपन्यास में उभर कर आई है। कहीं भी कुछ भी बनावटी नहीं लगता। इसलिए उपन्यास पढ़ते हुए मुझे बार-बार मज़दूरों की उस बस्ती की याद आती रही, जहां मैं खुद पला-बढ़ा।

उपन्यास की कहानी मिल के साथ शुरू होती है और मिल के साथ ही खत्म हो जाती है। मिल के इस सफ़र में जो जो लोग साथ चलते हैं, कहानी उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती हुई आगे बढ़ती है। गुरुजी के अलावा तीन युवा संजय सोनकर, नंदन मण्डोरिया और द्विजेंद्रनाथ त्रिपाठी उपन्यास के केंद्र बिन्दु हैं। ये कहानी जितनी मिल की है, उतनी ही इन किरदारों की भी है क्योंकि जिस मुकीमपुरा में ये रहते हैं, वहां की पूरी अर्थव्यवस्था मिल केंद्रित है। मिल चलेगी को मुकीमपुरा में खुशियां लहलहाएगी, बंद होगी तो हर दरवाजे पर भूख और अभाव का  दस्तक होगा। मिल प्रबंधन की शातिराना चालाकियां, मज़दूरों का शोषण और इसके खिलाफ गुरुजी के नेतृत्व में उनकी लड़ाई का प्रभावी चित्रण इस उपन्यास में हुआ है।

‘धर्मपुर लॉज’ को इसलिए भी रेखांकित किए जाने की जरूरत है  क्योंकि आज मज़दूरों की आवाज़ घोंटने की कोशिशें कामयाब  नज़र आती है। पहले की बनिस्बत मज़दूरों का शोषण बढ़ा है, उनके अधिकारों में कटौती पहले की तुलना में ज़्यादा है, कहीं भी किसी मज़दूर की नौकरी सुरक्षित नहीं लेकिन उनके लिए आवाज़ उठाने वाला कोई नहीं। मज़दूर आज हाशिए पर हैं। ट्रेड यूनियनें या तो अब चुप हैं या मालिकों के साथ खड़ी हैं। वरिष्ठ कथाकार जयनन्दन ने एक बातचीत में मुझसे बिल्कुल सही कहा था, ‘आज ट्रेड यूनियन की जरूरत मज़दूरों से ज़्यादा मालिकों को है।’ ट्रेड यूनियन अब मजदूरों के शोषण के खिलाफ लड़ने वाली इकाई नहीं बल्कि उनके शोषण में इस्तेमाल होने वाला मोहरा बन गई हैं। ये मेरा खुद का भी अनुभव है। ऐसे में मज़दूरों का सुधि कौन लेगा। उन पर लिखने वाले भी गिने चुने हैं और जो लिख रहे हैं, उन्हें समझने वाले (चाहें वो लेखक हों या आलोचक) भी कम ही हैं क्योंकि जिनका पाला ही कभी मज़दूरों के संघर्ष और उनके दर्द से नहीं हुआ, वह उस पर केंद्रित लेखन को क्या समझेगा। ऐसे में प्रज्ञा का यह उपन्यास आश्वस्त करता है। मज़दूर की आवाज़ को बुलन्द करने वाली सारी जीभें स्वाद को समर्पित नहीं हुई हैं। उनके लिए कुछ कलम आज भी बेखौफ़ चल रही हैं।

इस उपन्यास में केवल मज़दूरों का संघर्ष नहीं है बल्कि उनका पूरा जीवन है। छात्र जीवन की शरारतें है, प्रेम है, ईर्ष्या है, वेदना है, विरह है, लक्ष्य है, हताशा है। स्लम की ज़िन्दगी का इतना भावपूर्ण चित्रण हाल के दिनों में किसी उपन्यास में नहीं दिखा। निम्न मध्यवर्गीय बस्ती में भी कितने वर्ग, कितनी जातियां, कितने विभाजन। बेहतर जीवन के सपने के पीछे भागते हर एक का अपना संघर्ष। चन्द्रभान भाईजी, टिल्लू, प्रेमी, पंडित जी और न जाने कितने किरदार। 1984 के सिख विरोधी दंगा है, दंगे कि पॉलिटिक्स है और तमाम नीचता के बीच वह इंसानियत भी है, जो एकता के धागे में पिरोए रखती है।

अपने नारी  किरदारों के दर्द को प्रज्ञा ने बखूबी आवाज़ दी है। चाहें वह नन्दन की मां हो या त्रिपाठी की। एक संतान के लिए तरसती प्रेमा हो या जीवन भर एक कतरा सुख के लिए तरसती कान्ता। भाई परीक्षा पास करता है तो कान्ता उसमें अपनी खुशी ढूंढ लेती है। उसे पढ़ाई से इसलिए वंचित कर दिया गया क्योंकि वह लड़की थी। इसका खामियाजा आखिरकार उसे ही भोगना पड़ा। अगर वह पढ़ी लिखी होती, अपने पैरों पर खड़ा होती तो क्या उसका पति उसपर इतनी यातनाएँ ढा पाता?  कान्ता के दर्द को चरम अभिव्यक्ति तब मिलती है, जब उसकी शादी के उसका भाई नन्दन उससे फोन पर पूछता है कि क्या उसे अब भी संजय की याद आती है। मूक और नाकाम प्रेम की विफलता के इस प्रसंग में आप भी नन्दन के साथ रोने के लिए मजबूर हो जाएंगे।

इस उपन्यास में प्रेम जहां भी आया है पूरे परवान के साथ आया है। प्रेम को शब्द देना आसान नहीं है लेकिन प्रज्ञा की कलम में वह जादू है। जब नन्दन का दिल टूटता है तो उसके वर्णन की एक बानगी देखिए, ‘एक ही क्षण में उसकी दुनिया से दिन का उजाला गायब हो गया। रात के तारे न जाने कहां ओझल हो गए। सारी नदियों से पानी सूख चले। कानों से सुनना और आंखों से देख पाना मुश्किल हो गया। कदम थे कि आगे उठ ही नहीं रहे थे पर न जाने कैसे सांस अभी तक चल रही थी।’ (पृष्ठ 154)

द्विजेंद्र नाथ त्रिपाठी इस उपन्यास का एक अहम किरदार है। उसका बगावती तेवर न केवल उसके ब्राह्मवादी पिता  की जाति और वर्ण व्यवस्था की धज्जियां उड़ाता है बल्कि वह हमेशा सच के साथ खड़ा नजर आता है। उसका पिता पार्षद का चुनाव लड़ता है लेकिन वह पिता के खिलाफ गुरुजी के चुनाव प्रचार में जुटा रहता है। जिस जातिवादी व्यवस्था में त्रिपाठी पला बढ़ा और जिस स्लम बस्ती में उसका निवास है, वहां इस तरह की बगावत के लिए बहुत बड़ा कलेजा चाहिए। यह सबके बूते की बात नहीं है। हम भले बहुत आधुनिक हो गए हैं लेकिन ऐसी बस्तियों में तो सजातीय प्रेम विवाह भी किसी जंग से कम नहीं, ऐसे में वह विजातीय मीरा से शादी करता है।  मीरा के चरित्र को लेखिका ने बहुत मन से गढ़ा है लेकिन उसकी मौत अखरती है। मुझे ऐसा महसूस होता है कि मीरा के प्रति लेखिका थोड़ी निष्ठुर बन गईं। उसका इस तरह चले जाना केवल त्रिपाठी के जीवन में ही शून्य पैदा नहीं करता, पाठक भी सन्न रह जाता है। लगता है, उसे बचाने की और कोशिश दिखनी चाहिए थी।

इस बात की एक और खास  बात है। हर अध्याय (उपशीर्षक के साथ हर अध्याय शुरू होता है) के आखिरी में प्रज्ञा ने जीवन के सूत्र वाक्य लिख दिए हैं। ये सूत्र वाक्य केवल उस अध्याय का ही निचोड़ भर नहीं है बल्कि यह हर आदमी की ज़िन्दगी पर लागू होता है। कुछ सूत्र वाक्य देखिए-ऊंची छलांगों का रास्ता अदृश्य चट्टानें रोक देती हैं, औलादें कुंठित महत्वाकांक्षाओं की सूली पर बेधड़क चढ़ा दी जाती हैं, नेक नीयत मंजिल आसन, कुछ लड़कियों के जीवन में सुख किसी दूसरी दुनिया का शब्द होता है, साहस मन की धरोहर है वह हर बेहोश ताकत को जरूर झकझोरती है। ऐसे कई सूत्र वाक्य आपको  उपन्यास में मिल जाएंगे।

और अन्त में बात गुरुजी की। गुरुजी जैसा व्यक्ति सचमुच इस समाज में था, यह जानकर नई पीढ़ी को तो हैरानी होनी ही चाहिए। आज हम सियासत के जिस दलदल में जी रहे हैं, वहां कुर्सी ही नेताओं के लिए सबकुछ है, वहां ऐसे नेता का होना कितना मायने रखता है, यह मुकीमपुरा के वे लोग बेहतर समझ सकते हैं, जिन्होंने गुरुजी को देखा। उनके काम को देखा। तिकड़मबाज और स्वार्थी नेता तब भी थे लेकिन गुरुजी जैसे एक नेता के सामने सबकी चमक फीकी थी लेकिन दुखद ये रहा कि हम आज राजनीति के जिस दौर में जी रहे हैं, उसे गुरुजी ने भी देखा और झेला। उनका चुनाव हारना इसी सियासत का नतीजा था। गुरुजी जैसे नेताओं को याद रखा जाना चाहिए, उनकी कहानी ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचानी चाहिए ताकि लाखों में एक ही सही, उनके जैसा कोई तो नेता आए। उपन्यास का आखिरी लाइन है, ‘साले ! जित्ता मर्जी हथौड़ा  चला ले, इत्ती आसानी से ने टूटने वाली। गुरु जी की बनवाई सड़क है, ईमानदारी की।’  आज हमारे पास ऐसी ही सड़क तो नहीं है। भाईचारा, धर्मनिरपेक्षता, ईमानदारी, मुहब्बत की सड़कें ध्वस्त हैं। हर ओर नफ़रत के हथौड़े चल रहे हैं। लहूलुहान इंसानियत पुकार रही है—गुरुजी आप कहां हो? कहीं से कोई जवाब नहीं मिलता।

ऐसे गुरुजी को दुनिया के सामने लाने के लिए प्रज्ञा बहुत बहुत बधाई की पात्र है। हिन्दी उपन्यास में ‘धर्मपुर लॉज’ अपना अलग मुकाम बनाएगा, इसमें मुझे कोई शक नहीं।

उपन्यास : धर्मपुर लॉज

लेखिका : प्रज्ञा

प्रकाशक :  लोकभारती प्रकाशन

मूल्य : 200 रुपए

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