दिलीप कुमार की 6 ग़ज़लें

दिलीप कुमार

जन्म तिथि : 28 अक्टूबर 1974।मूल निवास : बलिया,  रूपौली, पूर्णिया, बिहार संप्रति- शाखा प्रबंधक, भारतीय स्टेट बैंक               वास्को दा गामा मुख्य शाखा, गोवा।संपर्क : 8806660113

एक
   
मुझे खुद की नहीं है  फिकर अब तो ।
कोई करता नहीं मेरा जिकर अब तो।।

सिर्फ रस्ता ही है कहीं मंजिल नहीं है,
खत्म होता नहीं  मेरा  सफर अब तो ।

फसल खुशबू की मेरी है सूखी जबसे ,
हवा भी  आती  नहीं है  इधर अब तो।

टीस रह रहके फट जाती बुलबुलों-सी 
दिल में  उठती नहीं है  लहर अब तो।

इतनी रोशनी की आदत नहीं मुझको ,
इसे कहीं जाकर डालो उधर अब तो।

बड़ी चादर रिश्तों की हो ,रफूगर भी 
चलो, ढूंढें  कोई  ऐसा  शहर अब तो ।
                
दो


क्यों नहीं आता कोई अब उसकी  छांव में,
सोचके ये मर रहा बरगद अकेला  गांव में ।।

बैठ छत पे फिर सुनाए रोज अंदेशा  कोई
ढूंढता हूं आज कौए इस शहर की कांव में।

ठंड रातों को अंगीठी खाट के नीचे लगाए
था पकाता ख्वाब को गरम – मीठी ताव में।

फिर लगी थी होड़ इक आगे निकलने की 
या  दिखे थे दौड़ में या तो फंसे थे दांव में ।

दूर कर देगी तेरी रफ्तार  मुझसे एक  दिन 
चाहता जी बांध दूं  पत्थर तुम्हारे  पांव में।

एक पुल- सा जी रहा हूं, सोचता  हूँ, नदी 
का थोड़ा-बहुत  एहसास  तो था  नाव में ।

समय तो था साफ -सपाट गंजा सिर जैसे
उसपे उगाए बाल, मैं खो गया उलझाव में ।

तीन


तू  है  कातिल , तेरी अदा कातिल ।
जैसे हो खुद ही मेरा खुदा कातिल ।।

जान उनसे  बची तो  ले  लेना तुम 
पहले तो उनसे मुझे  बचा कातिल ।

रोज मरने की इक लत -सी लगी है 
तेरी तलवार में भी है नशा कातिल ।

वो  भी  मरने  की  तैयारी  कर लें, 
पूछता उनका भी है पता कातिल ।

किसकी बारी है जो आगाह कर दूं, 
शिकार अगला जरा बता कातिल । 

मेरे  मिटने का सबूत  मिटता नहीं

चाहे  जितना उसे  मिटा  कातिल ।

मौज हो  जब तेरी  गिरा  देना इसे
मैंने तो सर दिया  झुका  कातिल ।

खुदी मेरी भी उड़ी है खाक बनके
अब  तो परदा जरा उठा कातिल ।


 चार
कल वो फिर मुझसे जब जुदा होगा ।
मेरे   ही  पास  नहीं मेरा खुदा होगा ।।

मुझे  मालूम  कि  है  तू अवारा हवा,
आज ये घर है, तो कल दूसरा होगा।

जब कभी आओगे तो मैं हूंगा नहीं 
नाम मेरा मगर दीवार पे खुदा होगा।

वक्त जिद्दी था पैदाइशी , बच्चों सा , 
रोकने  से  भी , क्या वो रुका होगा?

मेरे हिस्से का अंधेरा सब मुझे दे दो
अब तो कंधा  तेरा भी  दुखा होगा ।

रोशनी कम थी धुआं ही ज्यादा था,
खुद में घुट- घुटके दीया बुझा होगा ।

वक्त! बरसा नहीं  और पानी मुझपे,
वरना जख्म फिर से मेरा हरा होगा ।
सर झुकाकर तूने  बहुत सिज्दे किये 
सर झुकाने से क्या सर गिरा होगा?

पांच

बात से भी है बात नहीं बनी देखी।
जंग फिर सरहदों पे है ठनी देखी ।।

बात की मेज पे चाय चली जबतक
चुस्कियों में पिघलती दुश्मनी देखी।

चाय थी  या सुलह की कोशिश थी
खत्म होते ही  मेज थी  तनी देखी।

बादलों में भी थी  कोई जंग छिड़ी
बिजलियाँ  थीं खून में सनी, देखी ।

मातमी सन्नाटा जो दोनों तरफ था,
न ही दीवाली न ही ईद मनी, देखी।

सन्नाटा रात का था गहरा लेकिन 
सुबह अखबार में  सनसनी देखी।

फिर उठा संवाद ठंडी राख से अब
संभावना फिर अम्न की घनी देखी।

छह


आज फिर बादलों ने जमी की बात की।
गर्म  हवा ने दी खबर, जब हालात की।।

जख्म पे  तो   चर्चा चली थी देर तक 
मरहम की किसी ने, न कोई बात की।

हर घर में उजाले का जिम्मा लिया तूने 
कहां दी रोशनी?सिर्फ उसकी बात की।

खेत में फसलों से पहले पूछ लो जाकर
क्यूं किसानों ने खुदकुशी की बात की ।

उठा जब भी सवाल, आम आदमी का
बात बनके रह गई वो भी जज्बात की।

कल उजाला आएगा ये खबर सुनके,
कोई भी नहीं लेता खबर इस रात की।

खड़े थे हांफते सब बोझ सीने में लिए
मेरा हल्का हुआ जब मैंने बात की।

खुल गया भेद तेरे बरसने का, बादल!
जमी से ही लेके जमी पे बरसात की ।

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