दिनेश शर्मा की तीन कविताएं

बीड़ी

तुम्हारी पैदाइश निम्नवर्गीय है
जंगली पत्तों की तुम्हारी खाल
गन्दे हाथों में आकर ही
शक्ल लेती है।

तुम्हारा जीवन एक चिंगारी से
शुरू होता है
आजीवन तुम
शड़ड़-शड़ड़ साँस लेती हुई
बुझती हो।

तुम्हारे कुनबे का
टी. बी. से क्या गहरा नाता है
जिसके होंठ चूमती हो
उसके फेफड़ों में
कालिख क्यों पोतती हो।

हर कोई तुम्हें
हर किसी से
हर कहीं
क्यों मांग लेता है
और तुम भी उँगलियों के बीच
ऊँगली की तरह
हँसती हुई
क्यों सज जाती हो।

झुग्गियों से उठ क्या तुम ने
पॉश कॉलोनियों के ड्रॉइंग रूमों में
सजने के सपने नहीं देखे
अमीर दीवारें क्या तुम्हें घूरती हैं
झूमर तुम्हें देख कर
आँख मीचते हैं।

मज़दूर के पसीने और
किसान की हाँक के बीच
बगल की जेब या पगड़ी की सिलवटों से
बिन बुलाए क्यों आती हो
अँधेरी रातों की बेचैनियों में सुलगती
आत्महत्याओं के राज उगलने से पहले
मंजे के पाये से मुँह लगा कर
आधे जीवन ही क्यों
दम तोड़ती हो।

तुम्हारी अनबुझी इच्छाएँ
बस्तियों में आग लगाती हैं
तुमने सुना नही
दुनिया भर की बीड़ियां
मिलकर
गैर बराबरी को
फूँक सकती हैं।

नदी न्याय करेगी

नदी जल्दी में थी
पाँव पर पड़ा ग्लेशियर
रोता-पिघलता रोकता रहा
तलवों के नीचे से
उँगलियों के बीच से
निकल गयी।

आवाज़ लगा कर पूछा
कान लगा कर सुना
जाओगी कहाँ
बैठो दो घड़ी
लश्कर समेटो
जरा दम लो
सुना न सुनाया, न बहाना
जल्दी में है, बस लगा।

जल्दी में थी वह
कि रास्ते के पत्थर भी न देखे
मुड़े हुए किनारे भी तोड़े
पुलों को कन्धों पर उठाए
पगडंडियों को मरोड़ती
सांप की आँखों को मुँह पर लगाए
सरपट दौड़ती गयी।

मटमैली थी उसकी चादर
देह ठण्डी
चाँद का टुकड़ा कहीं भीतर अटका हुआ
धूप सेंकने की फुर्सत न थी।

खेतों की टोकरी सिर पर उठाए
भूखी थी शायद
चबा रही थी अपने समय को।

सहमा हुआ आँगन
रसोई में आ गया था
चूल्हे की ओट में दुबके सारे खेल
शरारतें बैठी थी शराफत से
धुंध में छिपा था गाँव
नदी से नज़रें मिलाने की
हिम्मत कहाँ थी।

सब रुका हुआ
बादल पीछे-पीछे
हवाएं साथ-साथ
कहीं पहुँचने की जल्दी में थी नदी
नदी न्याय करेगी।

झूला

गुस्से के सब रंग पिये
खाइयों में डूबी
बर्फ की सील पर फिसलती
पत्थरों पर पीटती अपनी छाती
हाँपती पहाड़ उतरती
नदी पर है यह झूला।

बाँट लिए है लोग
पहाड़ों की, नदी ने की है किलेबन्दी
संस्कृतियों में उपजाए भेद
जुबानों में डाल खाई
बह रही वह
अपने कानूनों के किनारों को तोड़ती हुई।

नदी की खुली आँखों से बचते
सहमे हुए लोगों ने
लोहे की तार पर चुपचाप
डाला है झूला
मोहब्बत की मिट्टी में
श्रम की सिंचाई से
उगाई हुई साग-सब्जी
जरूरत के किलटों में
भर लाते हैं इस आर
हालात के तंग जेबों में
ले जाते हैं हर शाम
रात भर की खुशियाँ।

व्यवस्था की ऊँची नाक पर
लोकतन्त्र की जगी हुई
उम्मीद और सपनों की आँखों के बीच
झूलता जनता की मजबूरियों का झूला
देश के नेतृत्व के दिलों में
जमी है नदी
वादों में चिने जा रहे विकास के पुल
गा रहे जैसे झूले की गाथाएं
संघर्ष की परम्पराओं का है चिह्न
आदम के साहस का झण्डा।

—-

दिनेश शर्मा
शिमला
हिमाचल प्रदेश

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1 Response

  1. Gopal says:

    मथने वाली।
    छाप छोरती।
    अमर पंक्तियाँ

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