दिनेश शर्मा की दो कविताएं

अशुद्धियों का विधान

बच्चा लेता है जन्म
किलकारियों के पालने में
सूतक घर
हो जाता अशुद्ध।

एक अर्थी उठती है
शोक में डूबा
चीखों, आंसूओं व रुंदन का
पातक घर अशुद्ध।

यौवना
सृजन की सम्भावनाओं में
खिली हुई
मास-दर-मास चढ़ा दी जाती
अशुद्धता की सूली।

शरीर के
अपने ही अंगों को
कहते हो आजन्म अशुद्ध
बताओ
कौन ले रहा जन्म निरन्तर
मरा कौन तुम्हारा
मरे जा रहा जो अविरल
बताओ
आर्यावर्त बताओ
अशुद्धियों का ये विधान
बताओ।

चींटियों के कदमों से

चींटियों के चेहरों पर
नही देखा कभी शिकन
अवसाद की गहरी झुर्रियां
थकान में झूली हुई आँखें भी नहीं।

वैयक्तिक्ता के टापू पर
स्वतन्त्रता की चाह में
किसी चींटी ने
बसाया नहीं जुदा संसार
अन्न के दानों पर खुदवाए नहीं
स्वामित्व के नाम
ज़मीन के टुकड़े पर
नहीं गाड़ी कब्ज़े की कील।

टेक्नोलॉजी के पंखों से
भर अहं की उड़ान
लहराई नहीं चींटियों ने
बुद्धिवाद की पताकाएं
माथे पर पोत बारूद
खेले नही दहशत के खेल
गरीब के पेट पर
न ही कभी
जमाए शोषण के लोलुप उपनिवेश।

चींटियों ने नापे हैं
ज़मीन की गहराई में डूबे रहस्य
जाने हैं आसमान में फैले
जीवन के संकेत
मिट्टी के ताप में समाई ममता
नम हवाओं में बहते सृजन के गीत
बिन हथियार बिन औज़ार
उठाया है कुनबे की जिम्मेदारियों का पहाड़।

चींटियों की गन्ध से
चुराना चाहता हूँ
रिश्तों का जुड़ाव
सामाजिकता के अदृश्य धागे
इच्छाओं के भार से दबी दुनिया में
चींटियों की आँखों से
देखना चाहता हूँ अपनी ज़रूरतें
रॉकेट पर जब बैठा है वक्त
चींटियों के कदमों से
धीमी सांसों के संगीत के साथ
नापना चाहता हूँ
अपनी उम्र की देह।

—-

दिनेश शर्मा
शिमला हिमाचल प्रदेश

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