टॉयलेट में घर : दिनेश शर्मा की तीन कविताएं

टॉयलेट में घर
(1)

जब हम
घर की दर्प की दीवारों को
कर रहे थे ऊँचा
देख रहे थे फर्श के शीशे में
अपनी उपलब्धियों का चेहरा
खुशियों के आँगन में लगा रहे थे
स्वामित्व की बाड़
कपड़ों गाड़ियों मशीनों को सहेजते
आत्म मुग्धा में बौराई जब
हमारी दुनिया
सुलभ शौचालय के एक कोने में
पर्दा डाल बसा ली उन्होंने
मजबूरी की अपनी गृहस्थी।

उस समाज की
संकीर्णता के अँधेरे में
दुबक गए वो
जहाँ टॉयलेट और उन्हें
दोनों को
माना जाता है हेय
घर के भीतर
नही दिया जाता
कोई स्थान।

कोई नहीं बैठा है वहाँ
टॉयलेट में घर बसा कर
बैठा हूँ मैं ही
हम ही बैठे हैं
आँखें हैं तो देखो
झांक कर अपने भीतर।

         (2)

वो आते हैं वहाँ
अहं के साथ
बड़प्पन का भार लिए
मल त्यागने
पांच रूपये का सिक्का उछालते
रखते नहीं कोई अहसान।

पानी फेंकते
पोंछते
निष्काम रमे हैं ये।

मैने वहाँ
कोई सम्बन्ध
बनते नहीं देखा।

    (3)

क्या कोई पूछता नहीं
उनसे प्रश्न
इच्छाओं की आकाश गंगाओं के बीच
निरन्तर फैलती दुनिया में
क्यों उनका यह
पहला रोजगार
आखिरी घर।

क्या वहाँ
अपने नादान प्रश्नों को
खूँटी पर टांग
खेलते हैं अबोध बच्चे
यौवन की ख्वाइशों का झूला
कहाँ खो आई ये औरतें
कोई बताता क्यों नहीं।

कोई देखे
किस करवटे सोते हैं ये लोग
सपनों को छोड़ आए
कौन सी नींद
किस युग के तकिये पर
सूख गई इनकी सरस्वती
रेत के इस तन में
कहाँ दबा है
आत्म का जीवाश्म।

——

दिनेश शर्मा
शिमला हिमाचल प्रदेश

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *