साहित्य को नई आधार शक्ति देती है ‘दोआबा’

‘दोआबा’ (पत्रिका) / संपादक : जाबिर हुसेन / प्रकाशक : दोआबा प्रकाशन / 247 एम आई जी, लोहियानगर, पटना-800020 / मूल्य : 75 रुपए / संपादकीय संपर्क : doabapatna@gmail.com, 09431602575

शहंशाह  आलम

ख्यात साहित्यकार जाबिर हुसेन के संपादन में निकल रही पत्रिका ‘दोआबा’ का इकतीसवाँ अंक साहित्य के समकालीन प्रसंग के विविध रंगों को जिस शब्द-कूची से भरकर मंज़रे आम पर आया है, हमें चौंकाता है। चौंकाना इस अर्थ में कि हिंदी की कितनी पत्रिकाएँ इस तैयारी से आज निकल रही हैं, न के बराबर। ‘दोआबा’ की इस साहित्यिक यात्रा ने हिंदी-साहित्य को जो नई आधार-शक्ति दी है, वह दस्तावेज़ी है। सच कहें तो पत्रिका के संपादक जाबिर हुसेन ने जिन जीवन-मूल्यों को बचाए रखने की ख़ातिर इस पत्रिका का आरंभ किया था, वे उसमें पूरी तरह सफल हुए हैं। ‘दोआबा’ के माध्यम से जाबिर हुसेन की जीवन-मूल्यों को बचाए रखने की चिंता वैश्विक रही है। उनकी यह चिंता वाजिब भी है। आज जीवन-मूल्यों को बचाए रखना विश्वव्यापी संकट साबित हो रहा है। आदमी जहाँ कहीं भी है, उसको सताया जा रहा है। उसका जीवन पीड़ा से भरा हुआ है। समकालीन संदर्भ में देखें तो बस साहित्य ही है, जो सच्चे मन से आदमी के जीवन-मूल्यों के बचाव में खड़ा दिखाई देता है। तभी जाबिर हुसेन की क़लम यह लिखती है, ‘एक दिन, मैंने स्वयं भी दीवारों को परखने की कोशिश की। कहीं वो सो तो नहीं रहीं। तभी ईंटों के बीच दबी एक अजनबी आवाज़ ने सिसकियों के साथ कहा- मुझे इन दीवारों से मुक्ति दिलाओ।’ जाबिर हुसेन का संपादक-मन आदमी को उसके शत्रुओं से मुक्ति दिलाता रहा है।‘दोआबा’ के प्रकाशन का असली यथार्थ और मूल भावना यही है।
‘दोआबा’ ने इस अंक के आत्मगत-खंड में राइनेर मारिया रिल्के की डायरी के अंश को छापा है। इस अंश का अनुवाद सुशोभित सक्तावत ने किया है। राइनर मारिया रिल्के की डायरी के इन पन्नों को पढ़ते हुए आप कोई दीर्घ कविता के पढ़ने का स्वाद महसूस करते हैं। मनमोहन सरल का संस्मरण ‘मन लौटना चाहता है उन दिनों को ओर’ लेखक के अपने अतीत के परिदृश्य को कुछ इस तरह से खोलता है कि लेखक का अतीत पाठक का अपना अतीत लगता दिखाई देता है। कथा-खंड में निधि अग्रवाल, अर्चना सिन्हा, प्रज्ञा सिंह, इरफ़ान अहमद, ज्योत्सना मिश्रा की कहानियाँ छापी गई हैं। ये कहानियाँ हमारे आसपास गहराते अँधेरे से हमको सचेत करती हैं। इन कहानियों के पात्र वर्तमान के दुःख को जीते हैं और दुखों से निकलने का रास्ता तलाशते हैं। कविता-खंड की बात करें तो यह खंड राजेन्द्र नागदेव, अदनान कफ़ील दरवेश, राजकिशोर राजन, केशव शरण, राजगोपाल सिंह वर्मा, मणि मोहन, मुस्तफ़ा ख़ान, किरण अग्रवाल, अनुराधा अनन्या, अनिता रश्मि, वन्दना गुप्ता, अंतरा श्रीवास्तव, सुधा तिवारी, रूपम मिश्र, नूतन गैरोला, मीनू अग्रवाल और ज़रीन की कविताओं से सजाया गया है। इस अंक की कविताएँ अप्रतिम हैं। कविताएँ पूरी बेबाकी से इस कठिन समय के विरुद्ध अपनी उपस्थिति दर्ज करती हैं।
‘दोआबा’ का संवाद-खंड एक नया संसार रचता आया है। इस खंड की समीक्षाएँ महत्वपूर्ण होती हैं। इस अंक में अवध बिहारी पाठक, शहंशाह आलम, मनोज मोहन, सुबूही नज़ीर, राजेन्द्र राजन, भारत भारद्वाज, हरिराम मीणा आदि समीक्षक समीक्षा के बहाने बहस के नए मुद्दे तैयार करते दिखाई देते हैं। अनुप्रिया का आवरण-चित्र अपना नया और व्यापक अर्थ छोड़ता है। इस अंक में सुपरिचित कवयित्री रश्मिरेखा के अवसान को विनम्रतापूर्वक नमन किया गया है।
संपूर्णता में ‘दोआबा’ के अंक के बारे में यही कहा जा सकता है कि यह पत्रिका समकालीन साहित्य की एक ऐसी शृंखला है, जो आदमी की पीड़ा से भरे समय की छटपटाहट को बारीकी से रेखांकित करती है।
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शहंशाह  आलम के फेसबुक वॉल से साभार

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