कहानी विचार का पानी भी है

जयप्रकाश मानस

हर शुक्रवार, किस्त 17

23 अक्टूबर 2015

मेरे घर आईं 3 नन्हीं परी

शीला, अम्बिका और अहल्या !किसी और से मिलूँ न मिलूँ, इन तीन निश्छल परियों से ज़रूर मिलता हूँ। जब कभी गाँव जाता हूँ, मोहल्ले की ये तीनों बच्चियाँ ज़रूर चली आती हैं मुझसे मिलने। ये नहीं आती तो खुद इनकी ख़बर लेता हूँ !मेरी भतीजी इन्हें पकड़ लाती है। क्यों मिलना चाहता हूँ इनसे? शायद इनकी सरल, सरल लोक बोली के लिए! शायद इनकी आँखों में एक पवित्र रोशनी को तलाशने !! शायद माँ को इनके आस-पास ढूँढने !!!

शीला दूसरी में पढ़ती है, अम्बिका तीसरी में और अहल्या चौंथी में ।इन तीनों सहेलियों के माता-पिता मजदूरी करके जीवन-यापन करते हैं ।कल दशहरा के दिन इनसे मिलकर लगा अपनी माँ से ही मिल रहा हूँ !माँ को अपने अंतिम सालों में ये तीनों बहुत पसंद थीं – बिलकुल अपनी बेटियों जैसी।

कहानी : विचार का पानी

योग्य कहानीकार अपनी कहानियों के बीच गद्य का कुछ ऐसा अंश रच जाता है, जो लम्बे समय तक जेहन में उमड़ता-घुमड़ता रहता है । ऐसे वाक्य सूक्तियाँ बन जाते हैं। दरअसल एक कथाकार इस तरह भी गद्य की समृद्धि बुनता है । कहानी, केवल कहानी नहीं, विचार का पानी भी है। पिछले दिनों कथा की श्रेष्ठ पत्रिका ‘लमही’ की कुछ कहानियों के पाठ के बाद ऐसे तीन गद्यांश मिले जो मुझे लम्बे समय तक मथते रहेंगे। 1. भगवान – तेरी लीला भी अजब है – मुझे ये लोग अछूत कहते हैं – मुझसे दूरी बनाकर रखते हैं – और तू इनके हाथ मेरे सामने ही फैलवा देता है ( धूप निकलेगी – जाफ़र मेंहदी जाफ़री)  2. प्यार कोई गणित या विज्ञान तो है नहीं जिसे किसी तयशुदा फ़ार्मूले से सुलझाया जा सके (फ़्रेमबद्ध छवियाँ – रजनी गुप्त)  3. संतुष्टि तो तब भी मिलती है जब दुश्मन को मारता हूँ, मगर यह काम खुशी नहीं देता है, जीत का उत्साहहीन अहसास ज़रूर होता है।सुधि पाठक चाहें तो सहमत हों । चाहें तो विजय राय जी बात आगे बढ़ायें ।

आचार्यों-प्राचार्यों से एक प्रश्न

कभी सुना है आपने :हमारे ज्ञान केन्द्र विश्वविद्यालयों / महाविद्यालयों के हिन्दी विभाग अपने छात्रों को लेकर कभी तुलसी, सूर, मीरा, प्रेमचन्द, प्रसाद, पंत, निराला, नागार्जुन, मुक्तिबोध या किसी अन्य किसी महान् रचनाकार के गाँव गये हों ? जबकि वे अपने भविष्य को लेकर कुल्लू मनाली, दार्जिलिंग, ऊटी, कोणार्क, खजुराहो ज़रूर जाते रहे हैं ।फ़ेसबुक पर मौजूद अपूर्व/पूर्व आचार्य-प्राचार्य चाहें तो बता सकते हैं !

चिड़ियों की खेप भी

भैया बता रहे थे आज – गाँव वाली बाड़ी में इस बार पपीते की अच्छी खेप आ रही है और उसके पकने की प्रतीक्षा में रोज़-रोज़ मंडराती चिड़ियों की भी ।

कहीं आप भी तो नहीं ?

मुनव्वर राणा ने कहा है वे ‘बड़े भाई’ (प्रधानमंत्री) के जूते उठाने को भी तैयार हैं ! सुना है उनके अलावा बहुत सारे क़तार में तैयार बैठे हैं ? नये वीरगाथा काल के ऐसे ‘धीर पुरुष’ और राणा साब के छोटे भाई बनने मैं तो कतई तैयार नहीं? कहीं आप भी तो नहीं ?

28 अक्टूबर 2015

हिन्दी की विशेषता

हिन्दी दुनिया की एकमात्र ऐसी भाषा है, जिसके साहित्य में केवल ‘वरिष्ठ’, ‘प्रतिष्ठित’, ‘सम्मानित’, ‘पुरस्कृत’, ‘अप्रतिम’, ‘कालजयी’ लेखक ही पाये जाते है। ‘कनिष्ठ’, अपरिचित, ‘अपमानित’, ‘तिरस्कृत, ‘साधारण, ‘अल्पजीवी’ लेखक यहाँ कोई कभी होता ही नहीं ।

सिन्धी और हिन्दी के बीच

प्रवासी होकर भी जिन महिला रचनाकारों ने हिन्दी और साहित्य की उल्लेखनीय सेवा से सबका ध्यान आकृष्ट किया है, उनमें देवी नागरानी का नाम ऊपरी पंक्तियों में आता है ।ग़ज़लों और कविता पर उनकी 10 से अधिक मौलिक किताबें आ चुकी हैं ।हिन्दी और सिन्धी के बीच उन्होंने लगातार सेतु की तरह सबका ध्यान आकर्षित किया है । हाल ही में उन्होंने हिन्दी की चर्चित 87 लघुकथाओं का अनुवाद किया है : बर्फ़ जी गरमाइश। खुशी की थोड़ी-सी बात तो है ही कि उन्होंने मेरी 2 लघुकथाओं ‘श्रद्धालु जन’ और ‘खोट’ को इस संग्रह में शामिल किया है ।

5500 करोड़ की सुंदरता

कह गये हैं चाणक्य – ”दुनिया की सबसे बड़ी ताक़त पुरुष का विवेक और महिला की सुन्दरता है ।” तो इसका एक अर्थ अब यही नहीं रहा कि सुंदर होने का कर्म और धर्म सिर्फ़ महिला का है । यानी सजने-सँवरने में पुरुष भी पीछे क्यों रहें भई ।

हाल ही में एक फ़ैशन पत्रिका का सर्वेक्षण इसकी गवाही देता है कि जितना समय और पैसा महिलाएँ अपने को सजने-सँवारने में लगाती हैं उतना ही पुरुष भी लगाते हैं। साबुन, शैम्पू, परफ्यूम, बॉडी वॉश, बॉडी जैल, डियो, एंटी स्वेट डियोडरेंट, हेयर जैल, हेयर मूज, फ़ेयरनेस क्रीम जैसे ढ़ेरों उत्पाद पुरुषों के जीवन का ज़रूरी हिस्सा बन चुके हैं ।

यूरोमॉनिटर इंटरनेशनल के अध्ययन पर विश्वास करें तो भारत जैसे देश में मेल ग्रूमिंग का बाज़ार 2016 तक क़रीब 5500 करोड़ का होने जा रहा है जो प्रतिवर्ष 11 प्रतिशत की दर से लगातार बढ़ रहा है ।

मतलब तो अब क्या यही नहीं निकलता है कि पुरुष का विवेक महिला की सुंदरता से हार मान चुका है !

तू बैठी ढोल बजाय

उस समय अमीर खुसरो को ज़ोर से प्यास लगी थी । कुएँ के पास जा पहुँचे । वहाँ चार औरतें पानी भर रही थीं। खुसरो के पानी माँगने पर उन्होंने कविता सुनाने की शर्त रख दी । एक ने खीर पर, दूसरी ने चर्खे पर, तीसरी ने कुत्ते पर और चौंथी ने ढोल पर। वे आज के हमारे जैसे कवि नहीं, अमीर खुसरो ही थे – सार्थक और मौलिक रचने वाले । उन्होंने एक ही पद्य सुनाया और चारों महिलाओं से पानी पाने की शर्त जीत गये :

खीर पकाई जतन से, चर्खा दिया चलाय

आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजाय ।

मित्रता

सुनार जैसा मन लेकर लुहार के घर कभी नहीं जाना चाहिए ।

माँ सदैव कहती थीं

 “आत्मनिर्भरता से कहीं अधिक बड़ी योग्यता है परस्पर निर्भरता ।”

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *