दरबारी रचनाकार जीता कम, मरता ज्यादा है

जयप्रकाश मानस

हर शुक्रवार

एक कवि की डायरी

किस्त : 12

 

11 सितंबर 2015

अँधेरा : अदृश्य मदारी

कथाकार उद्भ्रांत जी की एक चर्चित कहानी है - 'डुगडुगी', जिसमें अँधेरा अदृश्य मदारी का रूप धारण कर लेता है और तरह-तरह के खेल रचाता है । अब यह सच होते दिखाई देने लगा है । देश का बड़ा मदारी कह रहा है - साहित्यकारों, ख़बरदार, 'साहित्य' अलग है, 'भाषा' अलग है ।अर्थात् उद्भ्रांत जी हिंदी की 100 उल्लेखनीय किताब लिखकर भी अब हिंदी की सेवा नहीं, केवल साहित्य की सेवा कर रहे हैं।

 

वे कहते भी हैं - ''कौन पढ़ाये मूर्खों को कि भाषा से साहित्य बनता है किन्तु साहित्य से ही भाषा समृद्ध होती है, और उन्हें तो कतई नहीं कि जो भाषा, साहित्य, संस्कृति और विचार के प्रति कहीं से भी गंभीर न हों ।

 

बड़ी खुशी

इससे बड़ी खुशी और क्या होगी कि मेरे मित्रों की संख्या रोज़ घट रही है, यानी शत्रुओं की पहचान का सबसे सरल तरीक़ा सीखने लगा हूँ मैं ।

 

भाषा : ज्ञान : मौन

ज्ञान भाषा में होती है । भाषा का अपना ज्ञान भी होता है । संक्षेप में भाषा यानी ज्ञान भी । न भाषा मौन है न ज्ञान ।भाषा एक पहचान है जो अपने साथ संपूर्ण तक पहुँच है । पहुँच है तो एक मार्ग के साथ । मार्ग की एक ही भाषा नहीं होती । कई मौन होते हैं, कई बोलियाँ होती है । यहीं होता है ज्ञान ।

ज्ञान एक घराने की अनुशंसा नहीं : फलां ने कहा और फलां अमर हो गया ।कालजयी बन गया । इतना भी नहीं तो वर्ष का सर्वश्रेष्ठ हो गया । बाज़ार इसी तरह मूर्खों की मतिभ्रष्ट करता है ।बाज़ार को जो पीकदान न समझे वह ज्ञानी नहीं । और ऐसे अज्ञानी सर्वत्र हैं । कहीं नहीं पर केन्द्रीय हिन्दी में प्रमाणित तौर पर । बहरहाल.....ज्ञान और भाषा दोनों भले ही किसी स्तर पर मौन हों, पर तब मौन ही भाषा और ज्ञान की रंगत का प्रतिनिधित्व करता है ।

 

भाषा सब की होती है । सब की अपनी भाषा होती है । सब भाषा में ही होते हैं ।पर सभी भाषा के मर्मज्ञ नहीं होते। हम सब केवल एकाध भाषा में होते हैं ।हमारा होना एक भाषा में होना मात्र है । एक भाषा में होना यानी एक सीमा के भीतर का निवासी होने की बाध्यता ही है ।एक भाषा का निवासी सारे ज्ञान-विज्ञान का दर्शक हो कैसे सकता है । हिन्दी के लोग भले ही हों !हमारे एक ही भाषा-ज्ञान के अहंकार पर सबके भूत, भविष्य और वर्तमान का निर्धारण हो तो कैसे हो ?

 

सारांश यही कि हम अल्पज्ञ हैं : भाषा और ज्ञान उतने परिसीमित नहीं, जितना हम इतराते फिर रहे। हम उतने ही सीमित हैं, जितना हमें शर्म आती ही नहीं ।चाहिए की बात कर-करके केवल मूर्ख बनाते हैं हम एकभाषी, एकालापी !हिन्दी पर आयोजित 10 वें वैश्विक सम्मेलन पर फ़िलहाल इतना कहे बिना नींद न आयेंगी । नींद मौन भी है और भाषा भी, कइयों के लिए अप्रतिम ज्ञान भी ।मेरे हिस्से में जो है वह कल तक मुझे मिलने से भला रोक कौन सकता है !

 

13 सितंबर 2015

 

बापूजी के लिए 16 आने

पिछले दिनों मेरे रायगढ़ जिले के दौरे की ख़बर पढ़कर मिलने आ पहुँचे थे -कृतार्थ रथ । आज़ादी से पहले के अध्यापक । हम जैसे सैकड़ों अधिकारियों, डॉक्टरों, वैज्ञानिकों, अध्यापकों, कलावंतो, कृषकों के योग्य गुरु ।पूरे 92 वर्ष के । आज भी 10-20 किलोमीटर की साइकलिंग कर लेते हैं । पैदल तो आप जितना कहें, चल लेंगे । आवाज़ शेर की दहाड़ जैसी । खेती-किसानी के लिए अब भी उनके हाथ थरथराते नहीं ।

 

मैंने पूछा - ''सर, कैसी चल रही है देश-दुनिया ?''

''मत पूछ बेटा, तब मुझे पाँच रूपये वेतन में मिलते थे । चाँदी वाले सिक्के ही मिलते थे तब । सब कुछ निपट जाता था उसमें - घर-घाट, शादी-वादी, नाती-छंती........ जब महात्मा गाँधी जी ने टाऊन हॉल में मीटिंग ली थी तब उन्हें 16 आने यानी 1 रूपये ख़ुश होकर दिया था......आज देश में बहुत सारे लोग लाखों करोड़ों हर माह कमा रहे हैं, फिर भी देश-दुनिया जस के तस... अब तो चला-चली की बेला है बेटा... तुम लोग देश-दुनिया के बारे में भूलना मत !''

 

ऐसे किसी बुजुर्ग से हम ख़ुद होकर मिलने जाते हैं ?

 

गाँव, मामा और साइकिल

मैं जब कभी गाँव के बस स्टेशन पर उतरता हूँ - कोई न कोई ऐसे लपकता है जैसे मैं ही उसका सगा भाँजा हूँ और उसका घर ही नौनिहाल हो मेरा !सच मानिए : मैं हूँ कि उनकी कारगो बन चुकी साइकिल पर ऐसे जा बैठता हूँ जैसे साइकिल न हो, कोई सुपर सोनिक विमान हो और मामा पायलट हों ! और पायलट भी ऐसे कि सारी एअर होस्टेस का रोचक संगीत सिर्फ़ एक उन्ही के पास हो ।गाँव के मामा आज भी चंद्रमा की सैर करा लाने की विद्या जानते हैं लेकिन शहर के कारवाले मामा प्याज का कोई छिलका तक दिखाने से कतराते क्यों हैं ?

 

 

कहो राम ?

रावण के राज्य में कोई कवि नहीं था। सिर्फ़ लंकाई भाषा थी : जो रावण और उसके क़रीबी दैत्य बोलते थे ।राम ! तुम्हारे नहीं रहने के बाद भी तुम हो सर्वत्र, तो इसलिए भी कि तुम साहित्य में हो, केवल भाषा में नहीं । इसलिए ही कि तुम्हारे साथ कवि थे !भाषा का अमर रस कवि के पास होता है, केवल दरबारी भाषा बोलनेवाली जनता के पास नहीं ।राम ! तुम और तुम्हारे राज्य की भाषा भी बची हुई है तो केवल साहित्य है, जहाँ तुम हो, तुम्हारी भाषा भी है ! साहित्य ही पहचानता है राम क्या है और रावण क्या नहीं है ।राम, मरे हुए को समझाने कहूँगा नहीं, क्योंकि मरा हुआ आदमी समझता भी कहाँहै, उसकी तो भाषा भी नहीं होती !

 

दरबार बनाम दरबारी

रचनाकार दरबारी होकर मरता अधिक, जीता कम है । रचनाकार का दरबारी होना दरबार की जीत नहीं हार हैं, क्योंकि यही असंतुष्ट दरबारी ही दरबार को जमींदोज़ करते आये हैं, क्योंकि दरबार सत्ता की माया है । माया रचनाकार को पागल कर देता है । पगला रचता कब है ! माया की सत्ता पर नमकीन जल बिखेर देता है ।

 

जहाँ लेखक राजा होता है

दिनकर कुमार जी यूँ तो असम के कवि-मित्र हैं । आज भोपाल में हिंदी सम्मेलन के बहाने उनसे एक रहस्य जैसी बात सुनने को मिला - 'असम में हिंदी के साहित्यकार कम हैं, लेकिन जितने भी हैं वहाँ उनका बहुत आदर होता है। हर साल हिंदी साहित्यकारों का वहाँ एक मेला लगता है, जिसमें पूरे प्रदेश के साहित्यकार एकत्रित होते हैं। एक लेखक को इसका सभापति बनाया जाता है कि इसे एक राजा की तरह सालभर रखा जाता है।वहाँ किताबें बहुत सस्ती हैं और शादी-विवाह में लोग अमूल्य तोहफ़ों की जगह किताबें गिफ्ट करते हैं।''

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