‘लोकभाषा बचेगी, तभी हिन्दी बचेगी’

जयप्रकाश मानस

हर शुक्रवार, किस्त 13

30 सितंबर, 2015

उनके पड़ोस में

आज के दिन विशेष तौर पर याद आ रहे हैं - छायावाद शब्द के प्रथम प्रयोक्ता, छायावादी कविता के जनक पद्मश्री मुकुटधर पांडेय । उनकी कविता 'कुर्री के प्रति' पहली छायावादी रचना मानी जाती है। आज यानी 30 सितम्बर 1895 को बालपुर, रायगढ़ में जन्मे पांडेय जी से मुझे एकबार डॉ. बलदेव के साथ गंभीर साक्षात्कार करने का अवसर मिला था ।उन्होंने उस दिन कहा था - ''लोकभाषाओं को बचाये बिना हम हिंदी को नहीं बचा सकते ।''

 

मुझे गर्व है कि मैं किसी राजनेता नहीं बल्कि उनके पड़ोस में जन्मा, पला-बढ़ा, सीखा, समझा ।

 

एक शब्द : सविता

‘सविता’ शब्द का अर्थ है -प्रेरक, उद्बोधक, उत्तेजक, गति या तेज देने वाला। ग्रन्थों में ‘वायु’, ‘चंद्रमा’, विद्युत और मन को भी सविता कहा गया है। यदि हम शब्दों के मूल रूप को लें तो ‘पाणिनि’ धातु-पाठ के अनुसार “सु, प्रसवैश्वयोः’’ उत्पन्न करना, गर्भ धारण करना और अद्भुत-पराक्रम के अर्थ में तथा ‘सुर, एश्वर्यदीप्तोः’ को सामर्थ्य और चमकाना के अर्थ में लिया गया है, जिसका संबंध ‘प्रकाश’ से है। धातु ‘सु’ एवं ‘सुर’,- सूर्य, सविता एवं सावित्री के मूल शब्द कहे जा सकते हैं। वैदिक तत्व ज्ञान के अनुसार ये ‘प्राण-शक्ति’ के प्रतीक भी हैं। कारण, प्राचीन ‘असु’ धातु का अर्थ,- ‘प्राणशक्ति संपन्न होने के कारण अग्नि, इन्द्र आदि कई महत्वपूर्ण देवों को ‘असुर’ भी कहा गया है। वेदों में सविता और सूर्य की एकात्मता है। प्राचीन साहित्य का ‘सविता’ ही सूर्य है- दिव्यप्रकाश का प्रतीक और ‘‘सावित्री” उसकी शक्ति है।

 

समझ

ऐसा कोई कवि नहीं जिसे सभी पाठक समझें । ऐसा कोई पाठक भी नहीं जो सभी कवियों को समझे।

 

समझौते

आईना जितना भी हो नया, मेरा चेहरा दिखता है हर बार पुराना । जितना आईना ईमानदार, मैं कहाँ उससे अधिक बेईमान। हम दोनों ने कर लिये हैं समझौते या सुलह कि न तुम मुझे देखो न मैं तुम्हें देखूँ !

 

नज़र

अपने शहर की गलियों में घूमें तो आगे नहीं, पीछे की ओर तथा अजनबी शहर की गलियों में घूमें तो पीछे नहीं, आगे की ओर नज़र गड़ाये रखें ।

 

बया की तलाश में

बया यानी बुनकर चिड़िया मेरी प्रिय दोस्त है । बचपन के दिनों से ही । मुझे उसका घास के तिनके, लकड़ी या पत्तियों की पतली तीलियों से बुन कर घोंसला बनाना सदा से लुभाता रहा है । शायद हम साधारण लोगों और उसका संघर्ष समान है। यहाँ महानगर में भी पिछले साल तक मेरे घर के पास उनका डेरा था । ख़िड़की से मैं उन्हें एकटक निहारा करता था । पेड़ कट गया, वे जाने कहाँ चले गये ।आज उनकी तलाश में प्रवीण भाई के साथ भटकता रहा । एक जगह उनके घोंसले तो मिले, वे न मिले ।साधारण लोगों की तरह दाने की तलाश में वे भी शायद कहीं निकल चले थे ।

 

 

निरालाजी के 10 रुपये

निराला जी के बारे में सुनने से अधिक रोचक और क्या होगा?  उनके बारे में सुनने में उन्हें देखना ही होता है । वेदप्रकाश 'वटुक' जी आज बता रहे थे :

 

''69 वर्ष बीत गये । 1946 में तुलसी जंयती पर महाप्राण निराला मेरठ पधारे थे । वे मेरठ के साहित्य जगत के प्राण होमवती जी के निवास पर ठहरे थे । उस समय वेद मर्मज्ञ अग्रज स्व. रामनिवास विद्यार्थी 18 वर्ष के थे। सुबह-ही-सुबह वे निराला जी को नमन करने होमवती जी के यहाँ पहुँच गये ।

 

काव्य-साधना का आदिकाल था उनका। निराला जी ने सहज भाव से अभिवादन स्वीकार किया । मुक्तभाव से बात की और कहा- ''सुनाओ कुछ।''  सकुचाते हुए मेरे अग्रज ने अपनी कुछ कविताएँ सुनायीं । निराला जी प्रसन्न हो गये । उन्होंने कहा - ''होमवती, इस युवक को 10 रुपये दे दो ।''

 

दीन छात्र के लिए वह उस समय कुबेर का ख़जाना था । मेरे अग्रज तुरंत साहित्य भंडार नामक पुस्तक दुकान पर गये और निराला जी का सारा उपलब्ध साहित्य ख़रीद लाये ।

 

उसी रात तुलसी जयंती समारोह कवि सम्मेलन में निराला जी ने घंटो 'राम की शक्तिपूजा' जैसी लम्बी कविताओं का पाठ किया । दत्तचित्त होकर हम सुनते रहे ।आज उस दिन की याद आती है तो लगता है कोई दिव्य सपना था । विशेष कर आज के कवि सम्मेलनो को देखकर ।''

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