‘राजनीतिक रूप से अशिक्षित व्यक्ति सबसे निकृष्ट अशिक्षित’

हर शुक्रवार, किस्त 19

साहित्यिकी या राजनीति

पश्चिमी दुनिया की तर्ज़ पर हिन्दी की कुछ गिनी चुनी पत्र-पत्रिकाएँ भी हर साल कथित श्रेष्ठता के अनुमापन के लिए अपने-अपने हिसाब से पुस्तक-पाठक सर्वेक्षण कराती रही हैं। ताज्जुब नहीं कि हर आयोजकों द्वारा घोषित संबंधित विधाओं की वर्ष की सर्वश्रेष्ठ कृतियों की सूची एक-सी नहीं होती । यानी यह भी सर्वश्रेष्ठ वह भी सर्वश्रेष्ठ !यानी इनके अलावा भी कोई कृति वर्ष की सर्वश्रेष्ठ कृति है.....हो सकती है......बहरहाल इन सर्वेक्षणों के पीछे आयोजकों की साहित्यिकी तो समझ आती है, राजनीति बिलकुल समझ नहीं आती ।मुझे समझ में आती है क्या राजनीति ?

पसंद-नापसंद

सच की पसंदगी (Like) बहुत न्यून होती है, क्योंकि वह सबसे अधिक ऐब की नापसंद होती है ।

सुबह

रात के चौकीदारों के सपनों की बदौलत सुबह होती है न कि दिन के थानेदारों की नींद से ।

सबसे निकृष्ट अशिक्षित

 “सबसे निकृष्ट अशिक्षित व्यक्ति वह होता है जो राजनीतिक रूप से अशिक्षित होता है। वह सुनता नहीं,बोलता नहीं, राजनीतिक सरगर्मियों में हिस्सा नहीं लेता। वह नहीं जानता कि ज़िन्दगी की क़ीमत, सब्जियों, मछली, आटा, जूते और दवाओं के दाम तथा मक़ान का किराया – यह सब कुछ राजनीतिक फैसलों पर निर्भर करता है। राजनीतिक अशिक्षित व्यक्ति इतना घामड़ होता है कि इस बात पर घमण्ड करता है और छाती फुलाकर कहता है कि वह राजनीति से नफ़रत करता है। वह कूढ़ मगज़ नहीं जानता कि उसकी राजनीतिक अज्ञानता एक वेश्या, एक परित्यक्त बच्चे और चोरों में सबसे बुरे चोर – एक बुरे राजनीतिज्ञ को जन्म देती है जो भ्रष्ट तथा राष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का टुकड़खोर चाकर होता है।” ---बर्तोल्त ब्रेख्त

4 नवंबर, 2015

पहचान

जब देखें कि वर्षों तक दोपहरी में पेड़ के नीचे पथिकों को कलसी का पानी पिलाने वाला एकाएक समीप के किसी फ्रीज वाले ढाबे का पता देने लगा हो तब समझ लें वह अब सिर्फ़ दलाली करने लगा है ।

नाम बतायें

उस भारतीय संत, साधु, महात्मा, योगी, त्यागी, प्रवचनकर्ता, ज्ञानी, ध्यानी, आध्यात्मिक गुरु का नाम बतायें जो करोड़ों-अरबों का तेल, शैम्पू, साबुन, घी, नमक, पेस्ट, अगरबत्ती, चाय, आटा, बिस्कुट, च्यवनप्राश, शिलाजीत, दवाइयाँ देश में न बेचता हों और उसे ही सर्वश्रेष्ठ न बताता हो !

 

हल्दी और नीम

आज घर पर जब यह नुस्ख़ा तैयार हो रहा है तो मुझे मेरे क़रीबी मित्र और सहकर्मियों से अक्सर पूछा गया प्रश्न भी याद आ रहा है - ''आख़िर आपकी शारीरिक, मानसिक और नैतिक तंदुरस्ती का राज़ क्या है?''

पत्नी महोदया के जादुई हाथों से बना 'हल्दी और नीम का पावडर, जिसे मैं बिलानागा किये धरती को प्रणाम करने के बाद और सुबह होने के पहले नियमित लेता हूँ ।और यह नुस्ख़ा सीखा है मैंने वरिष्ठ रचनाकार द्वारिका प्रसाद अग्रवाल जी से।

वनमानुष और मनुष्य

देश के कुछ वनमानुषों की बात सुन-पढ़कर याद आ गया – फ्रेडरिक एंगेल्स (पुस्तक - 'परिवार, व्यक्तिगत संपत्ति और राज्य सत्ता') का कहा हुआ : ''वनमानुषों के जीवन और मनुष्य समाज में सबसे महत्वपूर्ण अंतर यह उत्पन्न हुआ कि मनुष्य में पारिवारिक सहिष्णुता की भावना पैदा हो सकी, वह अपने कोई र्ष्या से मुक्त कर सका ।''

भूल गये हम

हमारे ही शिक्षामंत्री मौलाना अबुल क़लाम आज़ाद ने ख़ुद को भारत रत्न दिए जाने के फ़ैसले अस्वीकार करते हुए कहा था - ''पुरस्कार चुनने वाले लोगों को ख़ुद को पुरस्कार देने का अधिकार नहीं है ।''

एक अच्छा दिन

आज सरगुजा में । एक आदिवासी गाँव ।प्राइमरी स्कूल ।  कक्षा पाँचवी में पढ़ रही आदिवासी छात्रा बुधियारिन बिटिया ने सीखा हमसे पहली बार मोबाइल से तस्वीर लेना दुनिया की !वह आज बहुत ही खुश थी, उससे ज़्यादा मैं खुश था......

दोपहर में भोजन के बाद नज़रें बचाकर बेटियाँ पानी की कविता दोहरा रही हैं खेल-खेल में - इत्ता इत्ता पानी गोल गोल रानी ।

एक करण, दूसरा अर्जुन । दोनों सगे भाई । बड़ा चौथीं का विद्यार्थी, छोटा दूसरी में । पिता कहीं दूर ड्राइवरी करते हैं, माँ मजदूरी ।

ये किसी फ़िल्म नगरी मुंबई के नहीं, राजधानी रायपुर से बहुत दूर सरगुजा जिले में लुप्तप्राय आदिवासी 'पहाड़ी कोरबा' के 'महादेवडूगु' गाँव के हँसते-खिलते दो फूल हैं ।

गाँव भी ऐसा कि आप 2 किमी बिना पैदल चलें वहाँ पहुँच ही नहीं सकते ।मैं दूर अपनी कार खड़ी करके यहाँ तक पहुँचा हूँ ।

दोनों पढ़ने में सामान्य बच्चों के बीच अव्वल और दिमाग़ से तेज़ !नदी-नाले, पेड़-पौधों, खेत-खलिहान, चाँद-सितारे, चिरई-चिरगुन की ऐसी जानकारी रखते हैं कि वैद्यराज फेल हो जायें। मैं इनके स्कूल से लौट तो रहा हूँ लेकिन मन है कि इनके पास अटका-अटका।

कितना अच्छा गुज़रता है कोई-कोई दिन !

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