आदमी और राजा

जयप्रकाश मानस
हर शुक्रवार, किस्त 20

6 नवंबर, 2015

बेटियों के साथ कुछ पल

फ़ैशन इंस्टीट्यूट (काईट कॉलेज, रायपुर) में पढ़-सीख रही हमारी बेटियों द्वारा दीपावली पर बहुत सारी चीज़ों के डिजाइनों की प्रदर्शनी और सेल में घूमते हुए आज लगा : “बेटियों की क्रियाशीलता को पहचानना और उन्हें सही दिशा में प्रोत्साहित करना हर माँ-बाप का नैतिक कर्तव्य होना चाहिए।” बहरहाल दोस्त प्रवीण ने जमकर खरीदारी की।

दासता

जहाँ से बुराई का अहसास बंद हो जाता है, वहाँ से दासता आरंभ होती है ।

ये फूल चुनना नहीं

यह चमेली फ़ूल चुनना नहीं, बेटे-बहुओं, पोते-पोतियों, गाँव-घर की ख़ुशहाली के लिए माँ का शुभ्र शुभकामनाएँ चुनना है ।जयपुर में हमारे मित्र शैलेन्द्र जयपुरिया जी की 84 वर्षीय माँ रोज़ सुबह यही करती हैं । उन्हें देखकर माँ की बरबस याद आ गई ।दुनिया की माँएँ शुभकामनाएँ ही चुनती हैं ।माँएँ संसार की सबसे बड़ी पूजा और पुजारी जो होती हैं !

असहिष्णुता के मायने

असहनशीलता, बर्दाश्त न करना, झगड़ालू, चिड़चिड़ापन मिज़ाज, क्रोध, गुस्सा, सख़्त विरोध, अत्याचारी । इस अपशब्द पर कबीर की याद न आये तो किसकी याद आये ! वे कह गये हैं :

मोको कहाँ ढूँढ़ूँ रे बन्दे मैं तो तेरे पास में।

ना तीरथ में ना मूरत में, ना एकान्त निवास में।

ना मंदिर में ना मस्जिद में, ना काशी कैलाश में।

ना मैं जप मे ना मैं तप में, ना मैं व्रत उपवास में।

ना मैं क्रियाकर्म में रहता, ना ही योग संन्यास में।

नहिं प्राण में नहिं पिण्ड में, ना ब्रह्मांड आकाश में।

ना मैं भृकुटी भंवर गुफा में, सब श्वासन की श्वास में।

खोजी होय तुरत मिल जा इस पल की तलाश में।

कहैं कबीर सुनो भाई साधो, मैं तो हूँ विश्वास में।

याद तो वह औरंगजेब भी आ रहा है——- मुगल शासक औरंगजेब असहिष्णुता और धार्मिक कट्टरता के लिए बदनाम रहा, लेकिन भगवान राम की तपोस्थली भूमि चित्रकूट के मन्दाकिनी तट पर 328 साल पहले सन् 1683 में बना जो ‘बाला जी मन्दिर’ उसने ही बनवाया था । इतना ही नहीं, हिन्दू देवता की पूजा-अर्चना में कोई बाधा न आए इसलिए उसने इस मन्दिर को 330 बीघा बे-लगानी कृषि भूमि भी दान की।

8 नवंबर, 2015

इससे कहीं बेहतर है फ़ेसबुक…

राकेश कुमार पालीवाल जी जैसे वरिष्ठ रचनाकार, जो बड़े ओहदे (कमिश्नर, आयकर) पर हैं, जब ऐसा कहते हैं तो सचमुच मन में प्रकाशक, सरकारी पुस्तकालयों, ख़रीदी, कमीशनबाज़ी, सरकारी नीतियों और पाठकीयता आदि पर कई-कई प्रश्न उठते हैं कि आख़िर ऐसा कब हिंदी में ? ”अब और किताबें प्रकाशित कराने का मन नहीं है : आठ साहित्यिक कृतियाँ प्रतिष्ठित प्रकाशनों से प्रकाशित होने के बाद अब और कोई किताब प्रकाशित कराने की इच्छा नहीं है। हिंदी के प्रकाशक अनावश्यक रूप से अधिक क़ीमत रख किताबें कमीशन के बूते सरकारी पुस्तकालयों में ठूँसते हैं, जहाँ उन्हें शायद ही कोई पढ़ता है। इस से कहीं बेहतर है अपने लिखे को फेसबुक पर हजारों मित्रों से साझा करना। यदि मित्रों को कोई रचना ज्यादा पसंद आती है तो आपकी रचना लाखों लोगों तक पहुँचाने का माद्दा है सोशल मीडिया में। अब कहानी और कविता की अगली किताब किसी प्रकाशक से तभी छपवानी है जब वह कम क़ीमत के पेपरबैक में छापने के लिए तैयार हो ताकि सुधी पाठक आसानी से ख़रीद कर पढ सकें।”

मैं भी तो ऐसा ही सोचने लगा हूँ इन दिनों !

जब-जब बदलते हैं पाँव

टोपी बदलने से धूप नहीं बदलती। छाँव नहीं बदलती चश्मे बदलने से। छाता बदलो आसमान फिर भी कहाँ बदलता। जूते बदलने से तनिक भी नही बदलता रास्ता। बदलती है धरती तब-तब,जब-जब बदलते हैं पाँव ।

काष्ठ-लेखक

आपने ‘श्रेष्ठ लेखक’, ‘कनिष्ठ लेखक’ आदि तरह-तरह के शब्द तो सुने ही होंगे । एक और तरह का भी लेखक होता है – ‘काष्ठ लेखक’ । यानी घुन । श्रेष्ठ लेखक लेखक तो सिर्फ़ कागज़ बर्बाद करते हैं क्योंकि वे अंततः इंसान होते हैं किन्तु ‘काष्ठ लेखक’ खम्भों, बल्लियों और अंततः सारा घर ही बर्बाद कर देते हैं । क्योंकि ये कीड़े के कीड़े रहते हैं ।

आदमी और राजा

शाहजहाँपुर से हमारे कवि मित्र दिनेश रस्तोगी जी पहले देश-दुनिया पर अपनी चिंता जाहिर करते हुए मोबाइल पर एक कथा सुना रहे थे । सारांश यह : एक आदमी राजा बना ।राजा बनते ही आदमी तो मर गया । राजा राज करता रहा….