धर्म अंहकार का विसर्जन, विजय अंहकार का विस्तार

जयप्रकाश मानस

डायरी के ये पन्ने भी पढ़ें

हर शुक्रवार, किस्त 21

10 नवंबर, 2015

पढ़ता था तो पानी के बर्तन लेकर

(बिज्जी जी की पुण्यतिथि पर )

“खोजे खोजे खोजेगा तो तीन लोक को पायेगा,

पाए पाए पायेगा तो कित्ता गडेरा खाएगा।

विजयदान देथा जी कहते थे –“बचपन में जब शरतचंद्र को पढ़ता था तो पानी के बर्तन लेकर बैठता था। पढ़ता था और आँख से आँसू निकलते रहते थे, फिर पानी से आँख धोता था और पढ़ता था। शरतचंद्र, रवीन्द्रनाथ टैगोर, चेखव, तालस्ताय, गोर्की, रसूल हमजातोव -इन सबको पढ़ता। लेकिन मैं सिर्फ़ इनके लिखे शब्दों के पीछे नहीं भागता बल्कि इनके शब्दों को लिखने की कला की खोज करता।”

झूमर

आज मैं फिर से भीष्म साहनी की प्रसिद्ध कहानी ‘झूमर’ में कुछ तलाश रहा था :

अर्जुन दास चौंका, उसने ध्यान से देखा उसकी पत्नी कमला ने झूमर उतार कर झोली में फेंके थे। उसका एकमात्र झूमरों का जोड़ा, जो बेटी की शादी के समय उसने अपने लिए बनवाया था। झूमर फेंक चुकने के बाद, कमला सिर पर अपनी ओढ़नी ठीक कर रही थी और अपनी आँखें पोंछ रही थी।

धर्म और विजय

धर्म और विजय परस्पर दो विपरीत ध्रुव हैं । धर्म प्रेम की ओर ले चलता है, विजय युद्ध, हिंसा और असहिष्णुता की ओर । धर्म अंहकार का विसर्जन है जबकि विजय अंहकार का विस्तार । धर्म में आँख, नाक, कान सब खुल उठते हैं और विजय में सब बंद हो जाते हैं ।

12 नवंबर, 2015

उनके भी नाम

छत पर कुछ दीये : क्षितिज, जल, पावक, आकाश, वायु और इनके चिर अनुयायी हमारे पूर्वजों के नाम !

चलो दलिद्दर भगायें

आज पहले ‘साखी’ के संपादक आदरणीय सदानंद शाही जी का बनारस से दीपावली पर एक मनभावन संदेश मिला । मैं पढ़ रहा हूँ बार-बार :

दीपावली मनाएँ चलो दलिद्दर भगाएँ

भीतर से भगाएँ

बाहर से भगाएँ

घर से भगाएँ

दफ़्तर से भगाएँ

मुहल्ले से भगाएँ

शहर से भगाएँ

यूपी से भगाएँ

बिहार से भगाएँ

प्रदेश से भगाएँ

देश से भगाए

माताएँ आएँ बहने आएँ

सूपा उठाएँ झाडू ले आएँ

चलो दलिद्दर भगाएँ चलो दलिद्दर भगाएँ

हमारी ओर दीपावली वाली रात की सुबह दलिद्दर खेदने का रिवाज़ है। सुबह होने से काफ़ी पहले सूप बजाकर घर के हर कमरे से दलिद्दर भगाया जाता है । यह हम बच्चों के लिए बडा मनोरंजक होता था। शहर में आने के बाद भूल ही गए थे। लिहाज़ा बहुत दलिद्दर इकट्ठा हो गया है। दीपावली मनाएँ चलो दलिद्दर भगाएँ।

मन न हो तब भी पढ़ो

लक्ष्मी की माया से बचा कौन है !अख़बार वाले अपना धंधा चमकाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाते रहते हैं : कोई बाल्टी गिफ्ट देता है, कोई लाटरी से कार देता है….आज तो हद हो गई….शायद हॉकर वाले को पटाकर किसी दूसरे अख़बार वाले ने आज अपना अख़बार डलवा दिया ।मन हो तो पढ़ो न हो तब भी ।

ज़रूरत या शुभकामना

अभी भी हमारे आसपास ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्हें उजियारे से लबालब शुभकामनाओं की नहीं, ज़रा सा तेल, एक दो दीया, कुछ बाती और चुटकी भर मिठाई की ज़रूरत है ।

Leave a Reply