दूसरी भाषा में पाठक ज्यादा, हिन्दी में कवि

जयप्रकाश मानस

हर शुक्रवैार, किस्त 15

3 अक्टूबर, 2015

चला अब बिहू प्रदेश की ओर

आज से आने वाले 10 दिन तक चाय और बिहू प्रदेश आसाम में । जोरहाट में साथहोंगे असम के नवलेखक और देश के कुछ लेखक मित्र । मानव संसाधन विकास मंत्रालय(केंद्रीय हिंदी निदेशालय) के इस नवलेखक शिविर में नवागतों को सिखाऊँगा भला क्या मैं – सीखूँगा ही अधिक ।

4 अक्टूबर, 2015

हम नहीं ठाकुर

कामाख्या मंदिर प्रांगण में । “पंडित जी, सभी शक्तिपीठों के पुजारी ठाकुर हैं, आप बतायें अपने बारे में ?”

“हम ब्राह्मण हैं । कन्नौज से आ बसे । कामाख्या में हम पूजा कराकर पेट पालते हैं । किरपा माई की “

देवी से मिलना : माँ से मिलना । असम में कामाख्या । माँ के परिसर में । जितना आध्यात्मिक उससे अधिक भौतिक। माँ के क़रीब जाना धर्म नहीं, नैतिकता है । मंदिर जाना माँ के कक्ष की यात्रा जैसी ही ।

 अ-सम

रात: 11 बजे, 4 अक्टूबर 2015, कांजीरगा की उपत्यका से गुज़रते हुए…..जिसके समान कोई न हो । जो किसी के समान भी न हो ।यह भी कि जो सम न हो। मेरे सपनों का भूगोल । मेरी स्मृति का इतिहास । मेरे आध्यात्म का समाज-शास्त्र! मेरे हृदय का संगीत..मेरी नातेदारी का बह्मपुत्र….मेरी आत्मा का कांजीरंगा…. मेरे अंहकार का गैंडा…..मेरे अविकारी मन का ठिठका हुआ मृग….यानी असम…..असम की धरती में चाय के बागान के आसपास का मानस…..

6 अक्टूबर, 2016

आदी

ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे मैं । तट पर पहुँचकर हम सब द्वीप की चाहे जितनी तारीफ़ करें, द्वीप से मूलतः दूर भागते हैं । हम सुरक्षित तट के आदी हो चुके हैं। नदी की लहरें क्या खाक गिन सकेंगें और द्वीपवासी होने की योग्यता का दंभ तो बहुत दूर की बात !

सोच सको तो सोचो !

वह मनुष्य, जो अपने पड़ोसी भगवान की हत्या कर सकता है, उसे भगवान के पड़ोसी मनुष्य की हत्या से भला कैसे शर्म आये; सोचो वह दरअसल कैसा और कितना मनुष्य है !

हिरणियों की चाहत

फ़ेसबुक की हिरणियाँ चाहती हैं कि संसार एक जंगल की तरह बन जाये, जहाँ हर कोई उनकी खूर की वंदना करे और बाक़ी सब बचे-खुचे उनके खूर के नीचे की घास पर हिरणियों की तरह पगुराते रहें। (एक लेखक से मिलने के बाद )

चाय बगानों के बीच हिन्दी

अहिन्दीभाषी हिन्दी नवलेखक कार्यशाला असम के जोरहाट में कल से प्रारंभ हुआ है । इस आवासीय कार्यशाला का आयोजन मानव संसाधन विकास मंत्रालय के केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय, दिल्ली द्वारा किया जा रहा है ।असमिया गामछा धारे हिन्दी कविता पढ़ने-पढ़ाने के एक नये अनुभव के साथ बीता कल का दिन । “सौंदर्य का हरा-भरा स्वर्ग है असम”- युवा कवि प्रवीण ऐसा ही कुछ कह रहा था मुझसे आज और मैं सहमति में खुद भी हरा-भरा महसूस रहा था ।

असमिया गामछा धारे हिन्दी कविता पढ़ने-पढ़ाने के एक नये अनुभव के साथ बीता कल का दिन । आज का दिन भी ।

कविता का फूल

कवि कविता का फूल खिला सकता है, महत्वपूर्ण यह नहीं, महत्वपूर्ण यह भी कि कवि फूल की कविता में खिलखिलाता है या नहीं !

 

नाटक किसे कहते हैं?

दर्शक देखना कुछ चाहे, निर्देशक दिखाना कुछ चाहे और कलाकार दिखना कुछ और चाहे ।

समस्या या निदान !

दूसरी भाषाओं में पाठक अधिक पाये जाते हैं और हमारी भाषा में कवि !

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1 Response

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