रमेश शर्मा की कहानी ‘एक मरती हुई आवाज़’

जाते दिसंबर का महीना था. हफ्ते भर पहले पछुआ हवाओं से हुई बारिश के चलते कड़ाके की ठंड पड़ रही थी. जगमगाते शहर को देखकर लगता था कि क्रिसमस की तैयारियां अब जोरों पर हैं. शहर के अधिकांश घर रंगीन झालरों की रोशनी में अभी से डूबे हुए थे. उसने पीछे मुड़कर अपने समय को देखा तो लगा कि कभी उसे भी तो उत्सव बहुत पसंद थे , पर समय ने उसकी बिना इजाजत उसके भीतर पल रही उस उत्सवधर्मिता पर उदासीनता की एक झीनी परत चढ़ा दी . “समय को आखिर किसी की इजाजत की जरूरत ही क्या है ? वह जब चाहे किसी के भी जीवन की तस्वीर पर उसकी बिना इजाजत अनचाहा रंग चढ़ा सकता है”. समय और अपनी दुनिया के अप्रिय होते संबंधों को बुझे मन से ढोते हुए वह कम्पनी की बस से उतरा और फिर पैदल चलने लगा. वह ज्यों ज्यों आगे बढ़ रहा था उसके कदमों के साथ साथ हरे पीले रंगीन रौशनियों में डूबे हुए घर भी जैसे साथ साथ चल रहे थे . चलते-चलते उसे कभी-कभी लगता कि यह शहर उसके लिए अब कितना अजनबी होने लगा है. पिछले कई महीनों से शहर की एक ही सड़क से जाकर उसी सड़क से लौटते हुए उसे लगने लगा था कि अपने ही शहर की सड़कें भी अब उसे किसी दिन पहचानने से इनकार कर देंगी. चलते चलते उसे अपने सहपाठी मार्टिन केरकेट्टा की वह बात याद हो आयी जबकि वो कहा करता था कि  ‘पहले आस पड़ोस के लोग छूटते चले जाते हैं, फिर धीरे-धीरे शहर भी हाथ से फिसलने लगता है’. सचमुच, वह महीनों से किसी मित्र या परिजन से मिला भी तो नहीं था. ऐसा नहीं था कि वह मिलना नहीं चाहता , वह तो सबसे मिलना चाहता है , उनके साथ समय गुजारना चाहता है, पर उसे लगता है कि समय ने उसे संबंधों की परिधि से बाहर धकेल दिया है . अब तो ऐसा हो गया था कि उनके फोन भी आने बंद हो गए थे.

उसका घर गुलमोहर कॉलोनी के सबसे आखिरी छोर पर था, जो गरीबों के लिए ई. डब्लू. एस. के तहत नगर-निगम द्वारा कालोनी के भीतर बनवाया गया था. रौशनियों की कतार में डूबे घर जहां खत्म होते थे, वहीं से उसके घर की सीमा प्रारंभ होती थी रौशनियों के साथ जुगलबंदी करते उसके कदम अब अंधेरों की गिरफ्त में आकर ठहर गए थे . अपने घर का जिक्र आते ही न जाने क्यों उसे आज भी दहशत सी महसूस होने लगती है . यह घर भी तो बड़ी मशक्कत के बाद उसके नाम आवंटित हो सका था. 

यूं तो वह अपने पिछले दिनों में लौटना नहीं चाहता, पर इस घर को हासिल कर पाने की कहानी जब भी उसे याद आती है वह उसे पीछे धकेल कर ले जाती है . एक खट्टी मीठी स्वादों से भरी कहानी जिसके अजूबे पात्र आज हर जगह मिलते हैं और दिनोंदिन उनकी संख्या कम होने के बजाय बढ़ ही रही है.  आज से तीन साल पहले जब वह इस घर के लिए सुबह ग्यारह बजे नगर-निगम के ऑफिस पहुंचा था,तो सबसे पहले तिवारी नामक क्लर्क से उसकी मुलाक़ात हुई थी. घर से सम्बंधित कागजात की पूरी फ़ाइल पहले ही वह ऑफिस में जमा कर आया था. उसने देखा कि तिवारी मुंह में चार-पांच पान दबाए टेबल की दराज को अन्दर बाहर कर रहा है. उस दराज में कुछ तो ऐसा था जिसे वह सबकी नजरों से बचाकर रखना चाहता था . उसका मुंह पान के रस से लाल हो गया था और पान का रस ओठों से बाहर आने को आतुर था, कहीं-कहीं चेहरे के निचले हिस्से और ठोंढी पर उसकी धार बहने भी लगी थी. उसका हुलिया भी कुछ अजीब सा था. माथे पर गेरूआ रंग का टीका और पीछे लम्बे लम्बे लटकते गीले बाल और उस पर चुटिया देखकर लगता था जैसे अभी अभी वह किसी मंदिर से पूजा पाठ करके लौटा है . तिवारी ने बगल में रखे पीक दान में पच्च से थूका और फिर उसकी ओर मुखातिब होते हुए पूछा  “हाँ तो बरखुरदार! तुमको ई. डब्लू. एस. का फ्लैट चाहिए?”

“जी सर !” उसने बड़ी उत्सुकता से जवाब दिया 

“हूँह ! क्या तुम समझ रहे इस बात को कि इस देश में किसी को अगर घर मिल जाए, तो वह बड़ा किस्मत वाला होता है!” तिवारी ने अपनी बात पर जोर देकर इस तरह कहा जैसे वह उसके लिए भगवान की तरह है, और उसके नाम घर अलाट कर वह उसकी किस्मत ही बदल देगा .

सामने खड़े खड़े वह उसकी बातें इस तरह ध्यान से सुनता रहा जैसे वह उसे सचमुच भगवान ही समझ रहा है.   

“तुमको तो पता ही होगा कि शुरू में इसके बीस हजार एकमुश्त जमा करने होंगे और बाक़ी के तीस हजार, तीस किश्तों में!”

“जी पता है सर !” तिवारी की बातों का जवाब देते हुए वह उसके सामने उसी तरह सावधान मुद्रा में ही खड़ा रहा

तिवारी ने कभी भी उसे आप कहकर संबोधित नहीं किया . अपने सामने रखी खाली कुर्सी पर बैठने को भी उसने कभी नहीं कहा. शायद उस पर रौब-दाब जमाने का उसका यह एक तरीका रहा हो , अपने भीतर इस बात को महसूस करते हुए भी वह निर्विकार भाव से तिवारी के सामने उसी तरह खड़ा रहा   

“ऐसा करो, सामने सड़क पर मुन्ना पांडे की पान की दुकान है. वहां से दो पान ले आओ. कहना तिवारी जी ने भेजा है.” तिवारी ने अचानक बातों का रूख दूसरी ओर मोड़ते हुए कहा.

“जी सर” कहते हुए उसने सोचा कि शायद तिवारी पान का पैसा देगा. इसलिए अब भी वह उसकी प्रत्याशा में वहीं खड़ा रहा .

“अरे तुम जा नहीं रहे……?” तिवारी ने अपने चेहरे पर डांटने का नकली भाव लाते हुए फिर से पीक दान में पच्च से थूक दिया.

वह समझ गया कि पान के पैसे देने की नीयत तिवारी की नहीं है . यूं तो वह पान खाता नहीं था, पर तिवारी के चक्कर में वह मुन्ना पांडे की पान की  दुकान की ओर बढ़ गया. वहां पहुंचकर कुछ अजीब तरह के दृश्यों से उसका सामना हुआ जिसका कि वह आदी नहीं था . मुन्ना पांडे की पान की दुकान पर एक भदेस-सा फिल्मी गाना बज रहा था. वहां खड़े कुछ लड़के सिगरेट का कश खींचते हुए उस गाने का मजा ले रहे थे. कुछ लड़के, जिन्होंने अजीब-सा हुलिया बना रखा था और जिनके बाल विराट कोहली जैसे कटे हुए थे और जिनके जीवन में अभी तक कोई अनुष्का जैसी लड़की अवतरित नहीं हुई थी, सड़क पर जा रही लड़कियों को छेड़ती नजरों से देख रहे थे.

“क्या बात है, खूब मजे ले रहे हो मियाँ ! पसंद आ गयी तो बुलवा दूँ !” उनकी तरफ देखकर मुन्ना पनवारी बीच-बीच में अपनी खीसें निपोर दे रहा था.

असहज से दृश्यों में उलझकर उसने मुन्ना पनवारी से कहा,”भाई नगर-निगम वाले क्लर्क तिवारी जी के दो पान लगा देना.”

मुन्ना पनवारी ने पहले तो सिर से पैर तक उस पर नजर दौड़ाई फिर गंभीर होकर कहा  “उनका मैसेज पहले ही मुझ तक पहुंच गया है, अभी लगाया भाई !”

उसे आश्चर्य हुआ कि पान के लिए भी तिवारी ने मैसेज किया था, जबकि वह तो उसी काम के लिए उसके द्वारा वहां भेजा गया था . 

मुन्ना पनवारी कभी सड़क पर आती जाती लड़कियों को देखता तो कभी पान के पत्ते सजाने लगता, चूना-कत्था लगाते-लगाते फिर धीरे से वह कहने लगा, “आपका काम तो बहुत सस्ते में हो रहा है भाई, बस दस ही हजार में!”

“दस ही हजार में? क्या मतलब?”

“अरे बरखुरदार ! मतलब यह कि एक पान याने पांच हजार, और दो पान यानी कि दस हजार. यही तिवारी जी का कोडवर्ड है. इस बात को ठीक से समझोगे तो तुम्हारी नैय्या जल्दी पार लगेगी. मेरे यहाँ दस जमा करके दो पान ले जाओ तभी तुम्हारा काम आगे बढ़ेगा.”

पनवारी की बात सुनकर वह परेशान हो उठा था. दस हजार की रिश्वत उसके लिए बड़ी रकम थी. ऊपर से घर की कीमत पचास हजार, सो अलग.

उधर चुटिया और गेरूवा टीके वाला तिवारी और इधर खीसें निपोरता मुन्ना पांडे, दोनों ने ऐसा जाल फैलाया था कि किसी को हवा भी न लगे. रिश्वत खाने के नए-नए तरीके इस तरह इजाद हो चुके थे कि गटर में डूबकर भी उनकी ईमानदारी बेदाग़ ही रह जाए और जगह जगह अपनी ईमानदारी का वे ढोल भी बजा सकें .  पर यह घर भी उसके लिए कितना जरूरी था. वैसे भी किराए का वह दो हजार दे ही रहा था. तिवारी से फोन पर गिड़गिड़ा-मिमिया लेने के बाद ले-दे कर आठ हजार में बात बनी और वह दो पान लेकर उस दिन वापिस गया था. उस वक्त ‘न खाऊंगा, न खाने दूँगा’ का नारा उसके सीने को चीरकर भीतर गहराई तक कहीं उतर गया था.

बस से उतरकर रोज की तरह उसे अभी डेढ़-दो किलोमीटर और आगे जाना था. रास्ते भर चलते-चलते वह सोचता रहा कि काश कोई सान्ताक्लाज उसके जीवन में ‘अच्छे दिन’ लाकर भर देता. न जाने कितने वर्षों से वह अपने जीवन में किसी सान्ताक्लाज के आने की प्रतीक्षा में था, और कभी-कभी तो उसका विश्वास उठ-सा जाता था कि सान्ताक्लाज उसके जीवन में कभी आयेगा भी ?

घर लौटते-लौटते उसको रोज ही देर जाती थी, पर आज वह कुछ ज्यादा ही देर से लौटा था. रात के दस बज चुके थे. ठंड बहुत बढ़ गई थी. मोहल्ले के आवारा कुत्ते, जो किसी अन्य मौसम में भौंकते हुए आस-पास दिख जाते थे, ठंड में यहाँ-वहां ओट पाकर कहीं दुबक गए थे.देर से लौटने को लेकर उसकी पत्नी ने आज उससे कोई सवाल नहीं किया. कई बार किसी का सवाल नहीं करना भी मन को परेशान कर देता है. वह चाहता था कि उसकी पत्नी इस देर से आने का कारण पूछे तो वह उसकी वजह बता सके. उसे धीरे-धीरे आभास होने लगा था कि उसकी पत्नी के लिए ऐसे सवाल भी अब अपना अर्थ खोते जा रहे हैं.

‘जब सवाल अपने अर्थ खोने लगते हैं तो जीवन भी अपना अर्थ खोने लगता है.’ – बचपन में मास्टर जी ने कक्षा में एक बार उससे कहा था जब वह सवाल पूछने से पीछे हट रहा था. तब से सवालों को लेकर वह संजीदा हुआ था. पर अब वह समय आ गया था कि सवाल सचमुच अपने अर्थ खोते जा रहे थे.सवाल पूछना अब सरकार की नजर में भी अपराध माना जाने लगा था.

वह अचानक बड़बड़ाने लगा –‘जी. एम. बहुत हरामी है स्साला…..!’

उसका बड़बड़ाना जारी रहा – ‘कहता है कि इस हफ्ते काम ज्यादा है. कोई छुट्टी-वुट्टी नहीं मिलेगी. मैंने बहुत कहा कि बच्ची की तबीयत कुछ दिनों से बिल्कुल ठीक नहीं है, उसको डॉक्टर को दिखाना है, कल भर की छुट्टी दे दो. तो बोला घर में जोरू नहीं है क्या ? वो भी कुछ करेगी या बस बैठे-बैठे खायेगी घर में.डॉक्टर के पास नहीं ले जा सकती बच्ची को थोड़ी देर के लिए.तुम लोग कामचोर हो गए हो.बहुत बहाने मारने लगे हो आजकल.मैं उसको कैसे समझाता कि पत्नी भी घर-बाहर कितना खटती है.’

उसका बड़बड़ाना थोड़ा तेज हो गया–‘मन कर रहा था स्साले के गाल पर जड़ दूँ दो तमाचा. फिर यह सोचकर रुक गया कि नौकरी भी हाथ से जाती रहेगी.है भी तो ऐसा ही ….. ज्यादा कुछ बोलो तो दांव-पेंच लगवाकर नौकरी से छटनी करवा देगा.’

पत्नी उसकी बातें सुन रही थी और एकटक उसे देखे जा रही थी. थोड़ा ज्यादा ही उदास दिख रहा था वह ….. एक थकी-हारी सी उदासी.वह सोच रही थी–‘वह पहले ऐसा बिल्कुल नहीं था. कितना हँसमुख था वह.चर्च में जब पहली बार मिला था वह,कितना अच्छा केरोल सांग गा रहा था. पहली ही नजर में ही तो उसकी तरफ वह आकर्षित हो गई थी.’

जीवन इतना कसैला हो जाता है वह सोची भी नहीं थी कभी.उसे ढाढ़स बंधाते हुए बोली,”अब छोड़ो भी यह सब. ये तो रोज की बात है.आदमी को सुनकर थोड़ा सहना भी सीखना चाहिए.चलो,खाना खा लो.सुबह काम पर भी तो जल्दी जाना है.”

“अब तो लगता है किसी दिन सुबह उठूँगा और काम पर जाने की वह सुबह भी मुझसे छीन ली गई होगी.”

“शुभ-शुभ बोलो भी.”नौकरी छिन जाने की मात्र कल्पना से ही वह सिहर उठी। 

सामने वाश बेसिन था. नीचे की ओर जाती उसकी सफेद पाइप बहुत मटमैली हो गई थी.जगह-जगह जमे काई के धब्बे घर की माली हालत को उजागर करने लगे थे. यह सिर्फ पाइप का धूसरपना नहीं था, बल्कि उनके मौजूदा जीवन का भी धूसरपना था जो अब जगह-जगह उभरने लगा था.वह बेसिन पर झुककर अपने चेहरे पर पानी के छींटे छिड़कने लगा. फिर सामने टंगे गंदे-से तौलिए से जल्दी-जल्दी मुंह पोंछकर जमीन पर बिछी चटाई पर जाकर बैठ गया.

“आज दाल खत्म हो गई थी. सोचा था स्कूल से पढ़ाकर लौटते वक्त सामने की दुकान से लेती आऊंगी, पर आज वह बंद मिली. दोबारा शहर की ओर जाने की हिम्मत नहीं हुई.” पत्नी ने ठंडी हो चुकी रोटियाँ और आलू-प्याज की सब्जी परोसते हुए संकोच के साथ कहा.

पत्नी की बातों को अनसुना कर वह रोटियाँ चबाने लगा.वह रोटियों को इस तरह चबाए जा रहा था मानो वर्षों से भूखा हो. देखते ही देखते उसने सारी रोटियाँ और सब्जी खा ली. और उसकी पत्नी उसको एकटक देखती रही.

उसके चेहरे पर पसरी थकान और उदासी उसे थोड़ी छंटती हुई नजर आई.पत्नी ने न चाहते हुए भी पूछ लिया,”बड़े दिन की छुट्टियों में क्या इस बार हम घर नहीं जा सकेंगे ?”

“क्या कहा … छुट्टियां !अब भूल ही जाओ छुट्टियाँ.”

एक उदास-सा जवाब सुनकर चुप हो गई थी वह. बड़े दिन का सेलेब्रेशन उनके लिए धीरे-धीरे अब सपना-सा होने लगा था.

थका हुआ वह कुछ ही देर बाद बिस्तर पर चला गया. गहरी नींद में उसको सोते देखकर पत्नी को थोड़ी राहत महसूस हुई. उनकी दिनचर्या में अब ये रोज-रोज की घटनाएँ थीं.ऎसी दिनचर्या को लेकर वह कई बार अपने को असुरक्षित भी महसूस कर चुकी थी. उसकी आँखों में नींद नहीं थी. उसे वर्षों पहले सेलेब्रेट की हुई एक क्रिसमस की याद हो आई–

छत्तीसगढ़ के जशपुर शहर से दूर लगभग निर्जन सा स्थान घोलेंग की शांत वादियों में बने उस गिरिजाघर में तब कितना शुकून था. लगभग सौ के आसपास की गेदरिंग और वहां बजने वाले केरोल और मोजार्ट की धुन. उस दिन वह कितना अच्छा मोजार्ट बजा रहा था.वह चाहती थी कि इस बार भी किसी गिरिजाघर में जाकर वह मोजार्ट की धुन बजाये और वह उसे सुनती रहे. पता नहीं उसकी यह इच्छा अब कभी पूरी होगी या नहीं !….. तभी दूर गिरिजाघर में लगी विशाल दीवाल घड़ी के दोलन करते हुए कांटे ढन-ढन करते अचानक बज उठे ….. वह सोचने लगी-सुबह के चार बजने का संकेत दे रहे इन काँटों की यह ढन-ढन करती ध्वनि रोज सुबह-सुबह ऐसे ही जन्मती होगी, और उसी वक्त मर भी जाती होगी. तो क्या ध्वनि का भी कोई जीवन-काल होता है ! हमारी आवाजों से जन्मी ध्वनियाँ न जाने कितनी बार जन्मी होंगी, और न जाने कितनी बार मरी होंगी. आवाजों का मरना भी तो इंसान के मर जाने की तरह ही है …..नींद की आगोश में रहते हुए इस आवाज को अक्सर वह नहीं सुन पाती थी. आज उसकी आखों से नींद गायब थी तभी तो सारी रात जागते हुए उसे सुन पा रही थी वह.

सच,रात की नीरवता और इस ढन-ढन करती आवाज में भी एक संगीत था.लेकिन यह संगीत सुकून देने के बजाय डरा रहा था उसे. वह अब दुनिया में बजने वाले हर ऐसे किसी संगीत से थोड़ा-थोड़ा डरने लगी थी. पता नहीं दुनिया का कौन संगीत कब बेसुरा हो जाए.नोटबंदी भी एक संगीत की तरह ही था,जिसे मंच पर बजाने वाले बजाए जा रहे थे इस बात से बेख़बर कि इसके कारण इर्दगिर्द की स्थितियां बहुत तेजी से बिगड़ती चली जा रहीं थीं, कम्पनी ले-दे कर किसी तरह चल पा रही थी.कितने ही लोग किसी न किसी बहाने निकाले जा चुके थे.

वह पति से मिस्टर सिंह के साथ जो हुआ था,पहले ही सुन चुकी थी.चोरी का आरोप लगाकर नौकरी से निकाला गया था मिस्टर सिंह को.कम्पनी का क्वार्टर खाली करवाने के लिए उनके घर का पूरा सामान सेक्युरिटी के जरिये लदवा दिया गया था ट्रक पर. सिंह गिड़गिड़ाते रहे, विनती करते रहे–‘मैंने कोई चोरी नहीं की.निर्दोष हूँ मैं. जरा रहम खाइये साहब. इस हालत में मैं अपने बाल-बच्चों को लेकर कहाँ जाऊँगा ? यहाँ इस शहर में इतनी जल्दी किराए का मकान मुझे कौन देगा? इतना तो सोचिये साहब !’ लेकिन जी. एम. पर कोई असर नहीं हुआ था इस गिड़गिड़ाने का.ये कार्पोरेट कल्चर भी आदमी को कितना क्रूर बना देता है, जी.एम. उसका ही जीता-जागता उदाहरण था.अंत में बात यहाँ तक आ गई थी कि जी. एम. के आदेश पर वहां मौजूद सेक्युरिटी गार्ड, मिस्टर सिंह के साथ झूमा-झटकी पर उतर आए थे और उन्हें धकियाकर बाहर कर दिये. ट्रक पर लदे सामान के साथ सिंह का परिवार कहाँ गया, उन्हें तत्काल कोई घर मिला या नहीं, इसके बारे में किसी को कोई खबर नहीं.

इस घटना के बारे में जबसे वह सुनी थी,तबसे उसके मन में एक आशंका घर कर गई थी. इसी वजह से उसने मात्र तीन हजार रुपये माहवारी वेतन पर पास का स्कूल ज्वाइन कर लिया था. उसे लगा था कि आड़े वक्त में इतने रुपये भी कहाँ नसीब होंगे.

विचारों की नदी में डूबती उतरती हुई उसके हिस्से की सुबह तो आई पर वह सुबह जैसी नहीं लगी और वह जागती रही ….. वह अब तक जाग ही रही है. जीवन की कई रातें और कई सुबहें इसी तरह निकल चुकी हैं. टीवी के विज्ञापन पर बजते खुशहाली के गीत भी अब उसे आकर्षित नहीं करते . देश की एन्ट्रापी इतनी बिगड़ चुकी कि उसे ठीक करने के लिए कोई गांधी शायद ही अब कभी पैदा हो . पर इन सबके बावजूद जीवन को तो उसी तरह गतिमान रहना होता है, सो इन बीत रही सुबहों के साथ उसी तरह उसके पति का काम पर जाना जारी रहा , लेकिन अब वह कुछ बोलता नहीं है! एकदम चुप-चुप रहता है ! शायद इस डर से कि उसके सवाल करते ही उसको कम्पनी की नौकरी से निकाल बाहर किया जाएगा मिस्टर सिंह की तरह कुछ न कुछ इल्जाम लगाकर! इस क्रूर व्यवस्था ने उसे किसी मोम के पुतले में बदल दिया है. हाँ में हाँ मिलाना अब उसकी आदत बन गयी  है. हर सुबह वह उसी तरह जाता है और रात होते होते उसी तरह घर लौट आता है. शहर की अन्य गलियाँ और रास्ते अब उसे सचमुच नहीं पहचानते. उसके जीवन का दायरा बस एक ही सड़क पर सिमट कर रह गया है. देश के लाखों लोगों की आवाज की ध्वनियों की तरह मानो उसकी आवाज भी जन्मती है और तुरंत मर जाती है. आवाज के जन्मने और मरने का अंतराल जो कभी बड़ा था , अब सिमटता जा रहा . विदा हो चुका है संगीत उसके जीवन से.

उसकी जिंदगी में मोजार्ट की धुन किसी गुजरे जमाने की बात होकर रह गयी है.

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रमेश शर्मा

जन्म- 06 जून 1966

शिक्षा- एम.एस-सी. ( गणित ) बी.एड.

सम्प्रति – व्याख्याता

प्रकाशित किताबें

कहानी संग्रह-  1. मुक्ति   2.एक मरती हुई आवाज

कविता संग्रह-  “वे खोज रहे थे अपने हिस्से का प्रेम” 

परिकथा, हंस, अक्षर पर्व, समावर्तन, इन्द्रप्रस्थ भारती, माटी,पाठ ,साहित्य अमृत, गंभीर समाचार   सहित अन्य पत्रिकाओं में कहानियाँ प्रकाशित .

हंस, बया ,परिकथा, कथन, ,अक्षर पर्व ,सर्वनाम,समावर्तन,आकंठ  सहित अन्य पत्रिकाओं में कवितायेँ प्रकाशित

संपर्क . 92 श्रीकुंज , बोईरदादर , रायगढ़ (छत्तीसगढ़) मो. 9752685148
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रेखा चित्र

रोहित प्रसाद पथिक 

पता: के.एस रोड,  रेल पार डीपू पाड़ा, 

क्वार्टर नम्बर:(741/सी),आसनसोल-713302(पश्चिम बंगाल)

मोबाइल:8167879455/8101303434

सम्पर्क:poetrohit2001@gmail.com

 

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