क्यों न खुश रहें हम

संजय स्वतंत्र

द लास्च कोच : किस्त 6

हर शनिवार


मेरे आज लिखे के साथ जो तस्वीर देख रहे हैं ना, वो हॉलीवुड की अदाकारा क्रिस्टिन बेल की है, जो हाल में अनजाने में ही अपने एक बयान से सबको खुशियों की सौगात दे गर्इं। कैसे? इसकी चर्चा आगे करूंगा। 
दरअसल, पिछले दिनों न्यूजरूम में वर्ल्ड हैपीनेस रिपोर्ट पढ़ कर मैं उदास हो गया। नए अध्ययन में बताया गया था कि दुनिया में नार्वे अकेला देश है जो सबसे अधिक खुशहाल है। भारत इस मामले में 122वें नंबर पर है। ओह, खुशियों के पायदान पर इतने नीचे हैं हम? खुशी की तलाश में यों हम सभी भटकते हैं। फिर भी कितना इतराते हैं। झूठ ही सही, मगर जब लोग पूछते हैं-आप कैसे हैं, तो हम अक्सर यही कहते हैं कि अच्छे हैं। और जब यही सवाल आप करते हैं तो सामने वाला भी झूठ बोल कर निकल लेता है। हम अच्छी तरह जानते हैं कि वह खुश नहीं है। हम सब की जिंदगी का यही तो सच है।
मेट्रो में सफर के दौरान आज जब हमेशा की तरह आखिरी डिब्बे में बैठा तो यही समझने की कोशिश की कि दिल्ली में कितने लोग खुश हैं। यात्रियों के चेहरे को पढ़ना चाहा तो पाया कि औसतन लोग खुश नहीं हैं। वही निर्विकार चेहरे। उलझे हुए और खुद में खोए। मानवीय संवेदना भी बची है या नहीं, मालूम नहीं। तो वो कौन सी चीज है जो मिल जाए तो खुश हो जाएंगे हम। लग्जरी होम, नई कार, महंगा मोबाइल, स्वादिष्ट भोजन, ब्रांडेड कपड़े......आाखिर क्या चाहिए हमें। इसकी तो कोई सीमा ही नहीं। और अब तो अधिकतर दिल्ली वालों के पास इन चीजों की कमी नहीं।
मुझे याद है कुछ अरसा पहसे नील्सन के सर्वे में दिल्ली को सबसे खुशहाल शहर बताया गया था। बंगलुरु दूसरे नंबर पर था और मुंबई तीसरे पर थी। वही मुंबई जहां शेयर बाजार उछाल मारता है तो हम पत्रकार लोग बिजनेस पेज पर इस खबर को लीड बना देते हैं मगर मुंबई का हैपीनेस इंडेक्स कभी नहीं बताते। अब हम खुशियों के ग्लोबल इंडेक्स में 122वें नंबर पर हैं। तब नील्सन ने क्या सोच कर दिल्ली को भारत का सबसे खुश शहर बताया था? क्या देश की राजधानी सच में सबसे खुशहाल है? या उसकी उपभोक्ता आदतें उसे पल दो पल खुश रहने का झांसा देती हैं। 
कोई दो राय नहीं कि हम दिल्ली वालों की आदतें बहुत बदली हैं, लेकिन जीने का नजरिया नहीं बदला है। लोग गैजेट पर बेशुमार खर्च करते हैं। इससे खुशियां तो मिली हैं, मगर वह सतही किस्म की हैं। जिस चीज को पाने के लिए हम बेताब रहते हैं, वह मिल जाने के बाद उसकी खुशी कितने दिनों तक रहती है? एक सप्ताह या एक महीना या बहुत हुआ तो साल भर। फिर दूसरी किसी खास चीज की ख्वाहिश कुलबुलाने लगती है मन में। 
अभी मैं मेट्रो में सफर कर रहा हूं और देख रहा हूं दिल्ली वालों को। क्या उनके चेहरे पर खुशी है? आम तौर पर यात्रियों के चेहरे पर चिंता की बारीक लकीरें दिख रही हैं। किसी चेहरे पर अधूरे काम को पूरा करने की बेचैनी है तो किसी के चेहरे पर जीवन की असंतुष्टि है। इस लिहाज से मुझे लग रहा है कि जीवन स्तर को नाप कर खुशी की तलाश नहीं की जा सकती। भारत जैसे देश में जहां इतनी ज्यादा बेरोजगारी है। निजी क्षेत्र के लाखों लोगों को इतनी भी सैलरी नहीं मिलती कि वे घर का खर्च ठीक से चला सकें। ऐसे में वे परिवार को भला क्या खुश रख पाते होंगे? फिर भी वे खुश रहते हैं। 
कोई खुश है और कोई क्यों नहीं है, आज भी रहस्य है। मेरे लिए यह कुछ ज्यादा ही है। वर्ल्ड हैपीनेस रिपोर्ट तैयार करने वालों ने खुशहाली का स्तर जानने के लिए मोटे तौर पर जो पैमाना बनाया, उसमें सबसे पहले व्यक्ति की आय, फिर स्वास्थ्य को रखा। इसके बाद सामाजिक सुरक्षा को मानदंड बनाया। यही नहीं खुद फैसले लेने की कितनी स्वतंत्रता है, यह बात भी शामिल की। ........ इस मानदंड पर नार्वे खुश देशों में नंबर एक है। तो फिर हम क्यों नहीं है? 
मैं भारतीयों की खुशहाली पर सोच ही रहा हूं कि अभी मेट्रो में एक मजदूर परिवार अपने बच्चों के साथ सवार हुआ है। हैरत में हूं उन्हें देख कर। समृद्धि से अघाए दिल्ली वालों से कितना अधिक खुश है यह परिवार। इसकी क्या वजह हो सकती है? अगर किसी गरीब को रोज दो वक्त की रोटी और तन ढकने के लिए कपड़े मिल जाए तो यही उसे खुशी देने के लिए काफी है। इसके बाद सेहत है तो सब कुछ है। बीमार और थके लोग अक्सर मेट्रो में दिखते हैं। उनके चेहरे पर खुशी दिखे भी तो कैसे। सब कुछ है मगर स्वास्थ्य ही ठीक नहीं तो फिर कैसी खुशी? गरीब को दो जून की रोटी और सेहत के बाद सिर ढकने के लिए कहीं भी छत मिल जाए, बेचारे इसी में खुश हो जाते हैं। 
दरअसल, खुशी मन की अवस्था है। एक समाजशाास्त्री ने ठीक ही कहा है कि सच्ची खुशी किसी को तब मिलती है जब महसूस होता है कि उसे किसी चीज का अभाव नहीं और वह अपने समाज में सुरक्षित है। यानी खुशी धन-दौलत में नहीं बल्कि संतुष्टि बोध में है। और इससे भी बढ़ कर रिश्ते में सम्मान और स्नेह से जो खुशी मिलती है, उसे कोई पैमाना नाप सकता है क्या? मुझे लगता है कि हैपीनेस इंडेक्स बनाने वाले भी नहीं नाप पाएंगे। अगर वे नाप पाते तो भारत को 122वें नंबर पर तो नहीं ही रखते। 
मुझे अभी मेट्रो में फर्श पर बैठे इस मजदूर परिवार की खुशी और उनके बच्चों में उमंग के बारे में जानना है। क्या इनकी खुशी को किसी पैमाने से नापा जा सकता है? इस परिवार की महिलाओं के चेहरे पर वैसी चमक है जो अमूमन लोगों के चेहरे पर नहीं दिखती। हॉलीवुड की अदाकारा क्रिस्टिन बेल उस दिन बता रही थीं कि चेहरे पर खुशी आपके भीतर से आती है। यानी जब आप मन से खुश होते हैं तो चेहरे पर भी चमक आ ही जाती है। हमारी कोशिश एक अच्छा इंसान बनने की हो तो हम खुश ही नहीं, सुंदर भी दिखेंगे।
इस मजदूर परिवार को देख कर लग रहा है कि खुशी धन-दौलत या भोग-विलास में नहीं है, वह तो हमारे भीतर है। जैसा कि क्रिस्टिन भी यही मानती हैं। हम जिस भी परिस्थिति में हों, खुशी का कोई बहाना तलाश लें। जीवन में सिर्फ कामयाबी से ही खुशी नहीं मिलती। क्योंकि कई कामयाब स्त्री-पुरुष भी निजी जीवन में खुश नहीं हैं। हम जरा सा भी खुश होते हैं, तो अपने सभी गम भूल जाते हैं। जब छोटी-छोटी बातों से खुशी मिल जाती है, तो बड़ी खुशियों के इंतजार में क्यों हलकान हुआ जाए। और कुछ नहीं तो अपनी गलतियों-नादानियों पर ही परिवार और दोस्तों के बीच हंस लिया जाए।
इस मजदूर परिवार को नोएडा जाना है। उनके पास चंद थैले और दो संदूक हैं। एक हाथ में रेडियो भी है। इनका एक शरारती बच्चा उसके कान उमेठने की लगातार कोशिश कर रहा है। मगर उसका पिता प्यार से उसे बार-बार झिड़क दे रहा है। फिर भी बच्चा अपनी कोशिश में कामयाब हो ही जाता है और एक गीत हौले से बज उठता है-
राही मनवा दुख की चिंता
क्यों सताती है
दुख तो अपना साथी है
सुख है छांव ढलती, आती है
जाती है.... दुख तो अपना साथी है........। 
मैं न्यू अशोकनगर मेट्रो स्टेशन उतर रहा हूं। यह यह गीत सुनते हुए। इस गीत मे कितना दम है। अगर हम दुख को भी गले लगा कर आगे बढ़ें, तो सुख भी अगली मंजिल पर जरूर मिलेगी। ....और उस सुख में भी तो खुशी होगी ना। जिसकी तलाश में हम रोज यहां से वहां भटकते हैं। क्रिस्टिन तुम सही कहती हो। खुशी उस कस्तूरीमृग की तरह ही है, जिसकी तलाश में हिरण भटकता रहता है मगर वह नहीं जानता कि उसे जो चाहिए, वह तो उसी के पास है।

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1 Response

  1. Rishi Kamal says:

    बहुत सुन्दर

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