शुक्ला चौधुरी की 3 कविताएं

शुक्ला चौधुरी

मां

एक

जब घर से
अचानक गायब हो जाती थी मां
पहले हम
चावल के कनस्तर में झांकते
फिर दाल मसाले के डिब्बे
से पूछते तब भी
अगर मां आवाज़ नहीं देती
तब हम चूल्हे के पास
खड़े हो जाते और
जोर-जोर से रोते

मां मां मां

चूल्हे से निकल आती थी मां
बहुत बड़े परिवार में

आग हमारी भूख थी

मांं हमारी रोटी।

दो

जब एक
बच्ची को उठा 
लिया जाता है
सामुहिक बलात्कार के बाद
उसे मरने के लिए
फेंक दिया जाता है तब

एक मां सारी उम्र

उसी अत्याचार को
अपने ऊपर महसूस करती है फिर

बाकी ज़िंदगी कभी नहीं सोती

मेरा चाँद

कभी बूढ़ा नहीं होता
मेरा चाँद
कृष्ण पक्ष में
एक-एक कर 
जब गिरने लगते है
उसके दाँत तब भी
बहुत खूब लगता है
पोपले मुंह की हंसी

अक्सर
याद आ जाते हैं पिता 

शुक्ला चौधरी के फेसबुक वॉल से साभार

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