समाज में बढ़ती सांप्रदायिकता से मुठभेड़ करतीं कहानियां

पहल 122′ में प्रकाशित गौरीनाथ की कहानी ‘हिन्दू’ और हरियश राय की कहानी ‘महफिल’ पर एक टिप्पणी

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव

‘पहल जून-जुलाई 2020’ में प्रकाशित गौरीनाथ की कहानी ‘हिन्दू’  न केवल इस अंक की उपलपब्धि है बल्कि मौजूदा समय को बड़े प्रभावी ढंग से रेखांकित करती एक महत्वपूर्ण कहानी है। 2014 के बाद हिन्दुओं में बदलाव की यह ऐसी गाथा है, जिसे आप हम हर रोज़ महसूस करते हैं। अब हर वह शख्स हिन्दू विरोधी है, जो सरकारी नीतियों से असहमति रखता है। उसे देशद्रोही घोषित करने के लिए और किसी सबूत की जरूरत नहीं है। ‘उत्तर 2014 काल’ में समाज के नए वर्गीकरण में देशद्रोही या टुकड़े टुकड़े गैंग एक नया वर्ग है।

इस बदलाव का सबसे अहम बिन्दु यह है कि यह केवल राजनीतिक या धार्मिक गलियारों तक ही सीमित नहीं है, घर-घर तक पहुंच गया है। और यह इतना सहज और स्वाभाविक ढंग से पहुंचा है कि अपने ही छोटे भाई के बारे में बड़े भाई को यह कहने में कोई झिझक नहीं होती कि

मिसर बाबा कहते हैं, देशद्रोहियों का सफाया हिंदू राज में कोई अपराध नहीं।… सामने लोकसभा का चुनाव है। ऐसे लोगों को मारने से किसी को जेल नहीं होगा, उल्टे ईनाम मिलेगा। रुकिए न आप, एक ही कुल्हाड़ी में सरबे को आज ही…’’ 

ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि इंटरनेट क्रांति की वजह से अब वाकई दुनिया हर मुट्ठी में बंद हो गई है। इस दुनिया को सुंदर बनाया जा सकता था लेकिन इसे लोगों  के मन में ज़हर भरने का हथियार बनाया गया। नतीजा यह कि मुठ्ठी में बंद दुनिया बाहर निकलने के लिए कसमसा रही है।

शाहीन बाग के जिक्र से शुरू होने वाली यह कहानी दिल्ली दंगों पर आकर खत्म होती है लेकिन यह कहानी सियासी नहीं, पारिवारिक है लेकिन खुद को इस वक्त की उन तमाम घटनाओं से जोड़ती है, जिसका प्रभाव हर व्यक्ति पर पड़ता है। इसलिए कहानी का मैसेज बहुत बड़ा है।

कहानी में चार भाई हैं। मां है। मातृभूमि के लिए जान देने की कसमें खाने वाले भाई मां को अपने साथ नहीं रखना चाहते। सबसे छोटा भाई चित्रकार है। दिल्ली में रहता है। मां उसके साथ रहती है। उत्पल सुलझा हुआ युवक है। हिन्दू मुस्लिम नहीं मानता। शाहीन बाग में विरोध प्रदर्शन कर रहे लोगों के लिए पोस्टर भी बनाता है। तार्किक बातें करता है। इसलिए परिवार, गांव-जवार और यहां तक कि दिल्ली में अपनी कॉलोनी में भी उदासे टुकड़े-टुकड़े गैंग के सदस्य के रूप में देखा जाता है। हिन्दुत्व के झंडाबरदारों की नजर में वह हिन्दू समाज के लिए उतना ही खतरनाक है, जितना कोई विधर्मी।

जब दिल्ली दंगों की आग में जल रही थी, तब उत्पल की मां सबको भरोसा देती है कि डरने की कोई बात नहीं है।व ह आश्वस्त करती है, “निश्चिंत रह! हम हिंदू हैं! हमारा कुछ नहीं बिगड़ेगा, कहीं निकलो तो टीका लगा लिया कर!…रोहित और जया को मैं हनुमान चालीसा याद करवा दूँगी!…’’

लेकिन होता यह है कि सोसाइटी के ही दो हिन्दू लड़के आते हैं और उत्पल की गोली मारकर हत्या कर देते हैं। मां समझ नहीं पाती कि यह हो क्या गया? सांप्रदायिक दंगे में हिन्दुओं के हाथों एक हिन्दू का खून कैसे हो गया? यह हमारे नवनिर्मित समाज का बिल्कुल ही नया आयाम है। ऐसी ही एक हत्या 30 जनवरी 1948 को भी हुई थी। तब कि वह फ्रिंज (Fringe) गोडसे-मानसिकता आज घर-घर पहुंच चुकी है। हर परिवार इससे ग्रस्त है। एक परिवार की कहानी बांचते हुए गौरीनाथ ने बड़ी ही गहराई के साथ इस बदलाव को पकड़ा है।

सबसे बड़ी बात है कि ऐसे समय में जब सच्चाई लिखने से पहले लोग सौ बार सोचते हैं, गौरीनाथ की कलम बेखौफ़ होकर लिखती है। कहानी में कहीं भी झिझकने वाला स्वर नहीं है। इस समय के सच को उन्होंने बड़ी ही ईमानदारी के साथ लिखा है। इस कहानी के लिए वे बधाई के पात्र हैं।

‘पहल’ के इसी अंक में एक और कहानी है, जो इसी बदलाव का दर्ज करती है। हरियश राय की कहानी ‘महफिल’। इस कहानी में एक राजस्थानी लोक गायक को इसलिए अपमानित किया जाता है क्योंकि उसका नाम करीम खान है। उसकी कला में कोई कमी नहीं है। जब वह ‘लंगा’ गाता है तो सुनने वाले मंत्रमुग्ध हो जाते हैं लेकिन जब कंपनी के चेयरमैन को उसका नाम पता चलता है तो वह बस इतना ही कहता है, ”तुम्हें इन लोगों के सिवाय और कोई लोग नहीं मिले।’’ चेयरमैन के चेहरे पर फैली वितृष्णा और ‘इन लोगों’ से सबकुछ साफ हो जाता है कि नफरत के इस वायरस ने ‘हिन्दू’ कहानी के किसान को ही नहीं बल्कि बहुत ज्यादा पढ़े लिखे और एक बड़ी कंपनी के चेयरमैन तक को संक्रमित कर चुका है। बीमारी की जड़ें इतनी गहरी हैं कि इसका निदान फिलहाल तो बहुत मुश्किल दिख रहा है।

इस कहानी की खूबसूरती यह है कि इस पढ़ते वक्त पाठक को भनक तक नहीं लगती कि कहानी किस ओर जा रही है। ऐसा लगता है कि आप बिगड़ती अर्थव्यवस्था और इससे नौकरी पर मंडरा रहे खतरों की कहानी है लेकिन अचानक कहानी ऐसा मोड़ लेती है तो पाठक भौंचक रह जाता है।

करीम लाल और उसका बेटा होटल का बटर चिकन खाना चाहते हैं। कार्यक्रम का आयोजन करने वाले सौमित्र से करीम ने कहा था कि

हुकुम, महफिल में खाने के बाद जो बटर-चिकन बच जाये, वह हमको खाने के लिए दे देना हुकुम। कई सालों से हमने होटल का चिकन नहीं खाया। सुणयों है। इण होटल रो चिकनखूब मजेदार है। बड़ी आस है हुक्मह इण होटल के चिकन खावण री।’’

लेकिन जब उसे बीच में ही महफिल से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है तो जहां करीम के मन में तमाम सवाल उभर रहे होते हैं कि आखिर उससे क्या गलती हो गई, उस वक्त उसका 10 साल का बेटा केवल बटर चिकन के बारे में सोच रहा होता है। वह बाप से पूछता भी है

हमें बटर चिकन मिलेगा खावण वास्तेन।’’

सौमित्र बाद में बटर चिकन पैक करवाकर उन्हें खोजता भी है लेकिन वो नहीं मिलते। इस पूरे प्रकरण का बहुत ही मार्मिक चित्रण हुआ है। मजहब के नाम पर छोटी-छोटी चीजों से वंचित होना पड़ रहा है, बटर चिकन के बहाने इसका अच्छा चित्रण हुआ है। इस बेहतरीन कहानी के लिए हरियश जी को ढेर सारी बधाइयां।

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