गोपाल प्रसाद की दो कविताएं

ग़ालिब
गूंगे और बलबलाते
लोगों के बीच
एक जीभ वाला राजा था
अपने खजानों और तहखानों में
वक्रोक्तियों को सिर्फ़
छिपाए ही नहीं रहा वो
दुनिया को बांटता रहा
वक्त बेवक्त
एक बहुत बड़ी भीड़ से
उगा था वह
और सारी जिंदगी खुद को
उसी से जोड़ता काटता रहा
सतह पर नहीं
नदी की तह में
कुछ खोजना, कुछ चुनना
उसकी आदतों में शामिल था
जहां भी लोग पूछते–
कौन है वह?
वह ऐसा था कि अपनी पहचान
खुद ही मिटाता रहा
दर्द में भी खूब गाया
और उसकी
रहने वाली दुनिया
भली चंगी हो गई
सुनता हूं
बाकी सब कुछ होते हैं
कुछ लोग
सिर्फ़ मनुष्य नहीं होते
वही सिर्फ़ मनुष्य था
और उसका नाम?
जो नहीं जानते
वे
इतिहास में–
बाकी सब कुछ होते हैं
इसके अलावा
और कुछ नहीं होते।
अपना सवाल जवाब

जब यही अपराध है कि
चोर को चोर न कहूं
तो मैं सहर्ष यह अपराध करूंगा
धरूंगा हर उस जगह कदम
जहां धरना जरूरी है
आम को आम
और वाम को वाम
उस समय तक कहूंगा
जब तक मेरी जीभ मेरे पास है
कैसा समय आ गया है कि
प्रतिवाद बर्फ बन गया है

सुना नहीं आपने
पैसेंजर ट्रेन में घुस
कुछ गुंडे
सैकड़ों लोगों के बीच
एक मां से जवान बेटी छीन
सबकी आंखों के सामने
बलात्कार कर,
डिब्बे को लूट
साहस के साथ धन और धर्म लेकर
रफूचक्कर हो गए।
वहां सभी पत्थर नहीं थे
मगर टुकुर टुकुर सब कुछदेखते रहे
और सोचते रहे कि
कब आएगा स्टेशन

क्या गजब है
लोग मल्हार को भैरवी
सिद्ध करने में
एड़ी चोटी का पसीना
एक किए हुए हैं
राशन की दुकान से
सिर्फ इसलिए
लौट आते हैं कि
बनिया कह देता है-नहीं है
मगर उसी दुकान से
बोरा का बोरा
लोगों की आंखों के सामने से
पार हो जाता है
आप समझ रहे हैं न सारी स्थिति?

लोग सिर्फ देखते हैं
ऐसा नहीं करते कुछ
कि हो जाय
वारा न्यारा

साला, संसद में एक चूहा
घुस जाता है तो
कोहराम मच जाता है
लेकिन उसके भीतर
कितने सांप और भेड़िए हैं
उनके लिए कहां कुछ होता है
है न देशभक्ति
मजाक का दूसरा नाम?

उम्र भर चौराहे पर
खीरा बेचने वाला
खीरा ही बेचता रहा गरीब
उधर, धूर्तता का पासा फेंक
जीरा में इधर-उधर करने वाला
हीरा का व्यापारी बन गया

आप इसका राज समझ रहे हैं
इसी को मोहन दास करम चन्द गांधी ने
कहा था –अपना सुराज
जैसा कल था
वैसा ही है आज।

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