गजेंद्र रावत की कहानी ‘ग्रैंड पार्टी’

                 

  हमेशा की ही तरह सचिवालय बिल्डिंग के भीतर अफरा-तफरी मची हुई थी। तमाम लिफ्टें भरी! कैंटीन में जगह-जगह लोगों के जमघट!….. कहाँ से आते हैं इतने लोग ? क्यों आते हैं ? सैलरी रुक गई है क्या इनकी या ये भी ट्रांसफर के चक्कर में हैं ? शैलेंद्र पिछले दो सालों से यहाँ आता रहा है परंतु हर बार मुंह बाये खड़े इन सवालों की तह तक नहीं पहुँच पाया। वो बस स्वयं भी उन्हीं चेहरों में शामिल हो जाता और काम न होने की टीस उसे बिसर सी जाती।

मधुकर आया होगा कि नहीं ? यह सवाल अचानक ही बड़ी बेचैनी से उसके दिल में कौंध उठा। इस आभास के साथ ही पसीने की बूंदें उसके माथे पर छलछला आई। उसने जरा रुककर रुमाल से चेहरा पोंछा और सिर झटककर सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया।

  …….हूँ पहले इतना मिल लिया तो कौन-सा तीर मार लिया……बात जितनी मर्ज़ी करवा लो। लम्बी-लम्बी छोड़ेगा।……जब जाओ, कोई नई कहानी सुना देगा।……भूल गया बच्चू, कैसे-कैसे पापड़ बेले थे मैंने तेरे मकान के डुप्लीकेट कागज़ निकलवाने के लिए।….दलाल दस हज़ार मांग रहे थे सस्ते टाइम में !

मैं ज़ोर न लगाता तो लटका रहता ज़िंदगी भर !……पर अब सब भूल गया है पट्ठा ! मेरा काम इसके लिये बाएँ हाथ की बात है, है ही क्या, छोटा-सा डिपार्टमेंटल ट्रांसफर ! ज़रा-सा सीरियसली ले ले तो हफ्ते भर का काम नहीं है।…….मुझे देखो, सालों से चक्कर काट रहा हूँ। जब से ऑफिस सुपरिटेंडेंट बना है, तभी से दिमाग खराब हो गया है स्सले का। ये तो हेडक्लर्क ही ठीक था….. ।  

       वो मन ही मन सोचता हुआ सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ता जा रहा था। उसे पता ही नहीं चला, कब तीसरी मंज़िल आ गई। वो थोड़ा रुककर गोलाई में बने कमरों के दरवाजों पर लटकी नेम प्लेटों को पढ़ने लगा। अपनी उस स्थिति के असमंजस से उबरकर वो कॉरीडोर में घुस गया। शुरू में ही शीशे के पारदर्शी दरवाजे के ठीक सामने उसके पाँव ठिठक गये। ये जगह उसे जानी-पहचानी लगी। उसने झुक कर शीशे के आर-पार देखा। ठीक सामने टेबिल पर सिर झुकाए मधुकर बैठा था। वो दरवाजा खोल बिना किसी आहट धीरे-धीरे सधे हुए कदमों से चलकर टेबिल के सामने चुपचाप खड़ा हो गया।

       मधुकर पहले की तरह फाइल पर नज़र गड़ाए सिर नीचे किये बैठा रहा। थोड़ी देर में उसने सिर उठाया तो डर और आश्चर्य से उसके मुंह से निकला, ‘ ओफ्फो ! डरा दिया यार ! दबे पाँव, बिल्ली की चाल से कब आ गया ?…. कैसे हो, शैलेंद्र बाबू ? ’

       वो मधुकर के ठीक सामने कुर्सी खींचकर बैठ गया था। थोड़ी देर चुप रहकर बोला, ‘ कोई फायदा नहीं आपके अफसर होने का। ’

       ‘ क्यों भई, ऐसी क्या बात हो गई ? ’ मधुकर का सिर अभी भी नीचे था, वो फाइल में लगे कागज पलट रहा था।

       शैलेंद्र ने एक लम्बी सांस खींची और बड़े ही अजीब ढंग से बोलना शुरू किया, ‘ मैं ही जानता हूँ, कैसे दिन काट रहा हूँ। चपरासी तक नहीं है, ……सब कुछ मैं ही हूँ पूरे डिपार्टमेन्ट में !……सुबह का गया रात के नौ-नौ बज जाते हैं ऑफिस में।…….चलो ऑफिस का काम तो जैसे-तैसे कर भी लूँ, बॉस के पर्सनल काम भी मुझे ही करने पड़ते हैं।……कभी उनके साहबजादे का फार्म जमा कराओ, कभी बैंक की लाइन में लगो, और तो और घर का फ्रिज, टी॰ वी॰ कुछ खराब हो, तो सब मेरे जिम्मे ! नौकर समझ लिया है….स्साले ने ! ’ अचानक अपशब्द निकलने से वो मुंह पर हाथ रख चुप-सा हो गया, मगर बॉस के प्रति उफनते आक्रोश को दबा न सका। थोड़ी देर में फिर बोलने लगा,      ‘आपकी अफ़सरी भी किसी काम की नहीं !…दो साल से ज्यादा हो गये मुझे यहाँ के चक्कर लगाते-लगाते।……कुछ भी करो, मुझे निकालो इस जंजाल से!’

‘ चाय पिएगा ? ’

वो कुछ न बोला। इस असंगत सवाल पर गुस्से, खीझ और आश्चर्य से मधुकर के झुके हुए चेहरे को देखता रहा जिस पर किसी तरह का कोई भाव नहीं था……बिल्कुल सपाट ! मधुकर पहले की तरह ही व्यस्त था—फोन, कम्प्यूटर स्क्रीन और टेबिल पर पड़े कागजों की मोटी तहों में। उसने सिर उठाकर शैलेंद्र की तरफ देखा तक नहीं।

     ‘ मैं जो कह रहा हूँ…..उस पर भी तो गौर फरमाएँ….. आपको तो चाय की पड़ी है, कौन कितनी मुसीबत में है, ये तो देखिये। ’ शैलेंद्र होठों को टेढ़ा करते हुए तल्ख स्वर में बोला।

      उसके लहजे को सुनकर मधुकर हौले से मुस्कुरा दिया लेकिन फिर भी टेबिल की सतह पर माउस को घूमाता रहा। उसकी नज़रें उसी तरह स्क्रीन पर टिकी रहीं।

      कुछ देर तक वे चुप्पी में बंधे बैठे रहे।

  …….बेकार ही है इसके पास आना। ध्यान तक नहीं देता काम तो क्या ही करायेगा……शैलेंद्र उसको काम में लगे देखकर सोचता रहा।

      काफी देर बाद मधुकर इस तनावपूर्ण खामोशी को तोड़ते हुए बोला,     ‘अब पक्का इंतजाम कर लिया है, घबराने की जरूरत नहीं।……ऐसा अफसर ढूंढ लिया है कि पूछ मत…..ये सारे ट्रांसफर करने वाले उसके चेले हैं। ’

      ‘सीनियर ही नहीं, साथ उठता-बैठता है…..हम प्याला है….. काम यूं हुआ समझो। ’ यह कहते-कहते उसने उँगलियों से दो-तीन चुटकियाँ बजाई और शैलेंद्र के चेहरे को देखने लगा।

      ‘कहीं ये भी पहले जैसा न निकले ? ’ शैलेंद्र पिछले कटु अनुभवों को सोचता हुआ संदेह की परिधि में घिर गया।

       ‘ नहीं भई, ये बड़ा अफसर है, वो तेरा डीलिंग था। कोई फर्क नहीं क्या डिप्टी सेक्रेटरी और क्लर्क के लेवल में ? पहले काम नीचे से शुरू होना था, अब बिल्कुल ऊपर से होगा। पहले रिक्वेस्ट थी, अब आर्डर होगा। समझे ? अब तो डीलिंग का बाप भी करेगा ! देखते जाओ। इस बार दूर की कौड़ी है। ’

       ‘ पैसे लेगा क्या ? ’

     ‘ न भई न तौबा करो ! रिश्वत से तो चिढ़ है उसे….यही तो खासियत है। मैंने काम किया है उसके साथ, रुपये बिल्कुल नहीं लेता, ये तो सौ फीसदी पक्का है।…….हाँ पियक्कड़ है पूरा, डेली पैसेंजर है।……भई, ये बड़े अफसर और करते ही क्या हैं, शाम होते ही ढक्कन खोल लेते हैं। मैंने भी बहुत पी है उनके साथ। ’ बोलते-बोलते उसने कम्प्यूटर बंद कर दिया और आँखें गढ़ाकर शैलेंद्र के चेहरे पर देखने लगा।

        ‘ वो भी आप जैसा ही ! यार, मैं तो कहता हूँ, सीधे पैसे पकड़ लेता तो ठीक रहता। वैसे क्या विडम्बना है कि हम हाथ में पैसे लिये घूम रहे हैं और कोई लेने वाला नहीं मिल रहा है। ’ मुस्कुराते हुए व्यंग्यात्मक लहजे में शैलेंद्र बोला।

         ‘ मैं तो कहता हूँ, हमें फायदा ही है। तू हिसाब कर ले, एक-दो बार की दारू में कितना खर्चा आ जाएगा ?…….ज्यादा से ज्यादा चार-पाँच  हज़ार ! इतना भी लगा के चलें तो भी सस्ते में निबट गए समझो ?……और फिर हम भी तो पियेंगे साथ में। ’ मधुकर ने थोड़ी देर आँखें बंद कर ली, फिर एक लम्बी सांस खींचकर बोला, ‘ वैसे भी तेरे जैसे को अफसरों के साथ उठना-बैठना सीखना चाहिये…..बड़ी-बड़ी बातों का पता चलता है, कहाँ कैसे चल रहा है, समझे ? ’

        ‘ आपको तो पता है, मैं ज्यादा पीता नहीं हूँ…..आप दोनों ही कर लेते तो……’ गुनगुनाहट सी ध्वनि में शैलेंद्र बोला।

         ‘ तेरे को करना क्या है, तू बीयर लेके बैठा रहियो।…..देख भई, मैं तो अकेला भी कर लूँ पर तेरे रहने से बहुत फर्क पड़ता है। क्या काम है ? किसका काम है ? पता तो लगना चाहिए। ’ मधुकर संजीदा होकर बोलने लगा, ‘और फिर वहीं से पीते-पीते, तेरे सामने सामने फोन करवा देंगे। बस अगले दिन से ही काम शुरू हो जाएगा।…..हफ्ते भर में ट्रांसफर ऑर्डर ! तुझे नहीं पता, बड़ा पावरफुल आदमी है। ’

          वो खड़ा हो गया और बोला, ‘ तो फिर ठीक है, आप तय कर लें, ……कब बैठना है उनके साथ। ’

           ‘ तुम फिकर मत करो। मैं फोन पर बता दूँगा। ’ इसी हफ्ते करते हैं। ’ मधुकर के चेहरे पर एक अजीब चमक थी।

          ……हाँ, हाँ तुझे भी तो पीनी है, प्रोग्राम तो जल्दी बनाएगा ही…… वहीं खड़े-खड़े शैलेंद्र ने सोचा और ‘ अच्छा ’ कहकर शीशे के दरवाजे को धकेलता हुआ बाहर निकल गया। कुछ देर तक शीशे का दरवाजा हिलता रहा और चर-चर की आवाज़ करता रहा फिर जल्दी ही खामोश हो गया।

          हफ्ते भर में वे तीनों दो बार बैठ चुके थे। दोनों बार शैलेंद्र उन्हें फ्री का माल उड़ाते दिल पर पत्थर रखकर देखता रहा। मेहनत की गाढ़ी कमाई को यूं पानी सा बहता देख वो खून की घूंट पीकर रह जाता।……चलो, ये सब तो सह लिया मगर काम तो इंच भर भी आगे नहीं बढ़ा। हताशा बढ़ती जा रही थी। वह स्वंय को ठगा-सा महसूस करने करने लगा। इतना सब होने के बावजूद भी वो मजबूर था तीसरी पार्टी के लिए क्योंकि मधुकर ने फिर से नई तारीख पक्की कर ली थी।

         ये अलग रेस्तरां था। वे यहाँ पहले कभी नहीं आए थे। शैलेंद्र ही ज़ोर देकर उन्हें यहाँ लाया था। लेकिन उस शाम नीचे रेस्तरां पूरी तरह भरा हुआ था। बार काउंटर पर खड़े रावण जैसी मूछों वाले सरदार जी ने वेटर को ऊपर का इशारा किया। वेटर ने धीमे से शैलेंद्र के कान में कुछ कहा और फिर आगे-आगे ऊपर चढ़ने लगा। वे तीनों भी मशीन की तरह उसके पीछे-पीछे चढ़ आए। यह छोटी सी म्यानी जैसी जगह थी जिसकी छत बामुश्किल सात फुट ऊंची होगी। छत पर लगे दो छोटे बल्बों की धुँधली रोशनी में वहाँ के अस्त-व्यस्त हालात दिखाई दे रहे थे….कुछ- कुछ कबाड़ख़ाने से। दीवार के कोनों पर मकड़ी के जाले झूल रहे थे। बस बीचों-बीच एक आयताकार टेबिल एकदम पोंछकर साफ की हुई थी। जिसकी दोनों ओर छोटे आकार के सोफ़े बिछे हुए थे जिनके रंग धूल की परत से मटमैले पड़ गए थे। वहीं फर्श पर एक कोने में खाली अद्दे-पव्वों का ढेर लगा हुआ था।

         ‘ सर, आप लोग यहाँ इत्मीनान से बैठिए। ’ वेटर सीढ़ियों के पास खड़ा होकर बोला, ‘ यहाँ कोई भी डिस्टर्ब नहीं करेगा। ’

         ‘ हाँ ! ये ठीक है…….नीचे तो खच्चड़-खाना है ! ’ मधुकर थोड़ा उत्साहित होकर बैठता हुआ बोला, ‘ ले आ भई यहीं सब कुछ ! ’ उसने ऑफिस बैग सावधानी से दीवार से सटाकर टिका दिया।

          बड़ा अफसर हंसा और एक तरफ के सोफ़े को पूरा घेरते हुए धम्म से बैठ गया। ‘ बैठो भई ! तुम भी बैठो। खड़ा रहने की आदत है क्या ? ’ बड़ा अफसर आँखों को घुमाकर शैलेंद्र को बैठने का इशारा करते हुए बोला।

         ‘ सर ये एथलीट है, खिलाड़ी आदमी है बैठना कम ही पसंद करता है। ’ मधुकर हल्के से मुस्कुराते हुए बोला।

         ‘ एथलीट है ! सच ! कितनी लम्बी दौड़ लगाते हो भई ? ’ बड़ा अफसर आश्चर्य से बोला।

         ‘ सर मैं नेशनल खेला हूँ, चार सौ मीटर में ! ’ वो धीरे से मधुकर की बगल में बैठ गया।

         ‘ तभी तुम्हारा शरीर ठीक-ठाक है। हमें तो यार ऑफिस के कामों से ही फुरसत नहीं मिलती। और तो और सुबह की सैर भी नहीं जा पाते। ’ बड़े अफसर ने मुंह बनाते हुए कहा।

       ……ऑफिस का काम ! वाह ! यूं कहो सुबह हैंग-ओवर की वजह से उठा नहीं जाता…..वो खामोश, बड़े अफसर के चेहरे को देखता हुआ सोचने लगा।

          ‘ सर इसके ट्रांसफर केस को देख लो !…….रस्तोगी को फोन लगा दो ? आपके तो फोन भर से ही चालू हो जाएगा रस्तोगी ! ’ मधुकर की आवाज़ पहले जैसी स्वाभाविक नहीं रही, बनावटी ढंग साफ झलक रहा था

          ‘ करते हैं फोन भी, पहले मूड तो बन जाए ! दो-चार सही-सही पैग लगा लूँ फिर करते हैं बात ! ’ मुस्कुराहट अभी भी बड़े अफसर के चेहरे पर खेल रही थी।

          टेबिल तक पंहुंचे वेटर को शैलेंद्र कंधे पर हाथ डाल थोड़ी दूरी तक ले गया और उसके कान में धीरे-धीरे कुछ कह दिया, जिसे सुन वेटर वहीं से नीचे सीढ़ियाँ उतर गया।

         ‘ आज क्या बात है कोई बोतल नहीं…..’इधर-उधर देखता बड़ा अफसर बोला। उसकी आँखों की पुतली आश्चर्यवश तेज़ी से कांप रही थी।

         ‘ सर आज व्हिस्की भी ये लोग ही सर्व करेंगे…..जब पीनी ही है तो…’

       ‘ आ-हा –हा…….’ आल्हादित ध्वनि बड़े अफसर के होंठों से निकलने लगी। मधुकर की बेजान आँखें खुशी से चमकने लगी, वो बोला, ‘ ये हुई न बात !……तुम क्या बीअर लोगे ? ’

         ‘ नहीं, नहीं पहला पैग तो व्हिस्की का ही लेना पड़ेगा ! ’ बड़ा अफसर बोला, ‘उसकी बिल्लौरी आँखें अभी भी कुछ ढूंढ रही थी।

          वेटर ने ट्रे में छ्ह लार्ज पैग, सोडे की बोतलें, आइस क्यूब तथा गरम कबाब की प्लेट जिससे धूआं उठ रहा था, टेबिल पर लगा दी। वो पैग बनाने झुका तो उसके मुंह से निकल आया, ‘ सर ……’

          ‘ नहीं, नहीं……’ मधुकर ने वेटर को जाने का इशारा किया फिर ट्रे को अपने पास खींचकर सोडे की बोतलें खोलने लगा।

          ‘ सोडा पानी बराबर ! ’ बड़ा अफसर बोला। उसके बड़े-बड़े होंठ मुंह से निकली लार से सने हुए थे।

         मधुकर ने सोडा-पानी बराबर मिला दिया। अभी-अभी डाले आइस क्यूब गिलासों की ऊपरी सतह पर तैर रहे थे।

        ‘ आज मैं भी बराबर की व्हिस्की लूँगा। ’ एक आश्चर्यजनक विस्फोट-सा करते काफी देर से चुप बैठा शैलेंद्र बोला, ‘आज मेरा जन्मदिन है!’

         ‘ जन्मदिन ! ’ उन दोनों के मुंह से एक साथ निकला। चेहरों पर मुस्कुराहट और आँखों ही आँखों में एक सुखद अनुभूति तैरने लगी। जल्दी ही आश्चर्य, मुस्कुराहट और खुशनुमा होती जा रही शाम का ख्याल उनके चेहरों पर दिखाई देने लगा।

        ‘भई आज तो ग्रैंड पार्टी होनी चाहिए’ बड़ा अधिकारी दोनों हाथ फैलाकर बोला, ‘ कोई बंदिश नहीं, कोई लिमिट नहीं……’

         उत्तेजना में तीनों गिलास उठाकर हवा में टकराए और एक स्वर में बोल उठे, ‘ चियर्स ! ’ फिर गिलास मुंह से लगाकर तीनों ने एक बार में ही पैग समाप्त कर दिया। उसी निरंतरता में दूसरा पैग उठाकर दोनों अफसर एक साथ बोले, ‘ हैप्पी बर्थ डे टू यू ! ’

      इसके बाद वेटर आता रहा, जाम भरते रहे, खाली होते रहे। खाली ट्रे उठ जाती और दोबारा भर जाती। शैलेंद्र ने भी दो पैग जल्दी खींच लिये फिर एक पैग हाथ मेन थामकर सोफ़े से कमर टिकाकर बैठ गया। अब उसकी निगाहें दोनों की गतिविधियों पर लगी थी।

      सामने बैठे बड़े अफसर ने दो घूंट मेन ही पैग घटक लिया, सामने रखी प्लेट से वो मुर्गे की भूनी टांग उठाकर दांतों से झिंझोड़ने लगा। उसका थुलथुल शरीर किसी भरे हुए बोरे-सा सामने के सोफ़े पर पसरा हुआ था। उसकी भूरी-लाल आँखें ट्रे मेन रखे पैगों पर लगी थी। उसने वक्त बरबाद किये बिना दूसरा पैग उठा लिया और दूसरे हाथ से मुर्गे की टांग पर चिपका गोश्त दांतों से खींचने लगा।

 …..क्या जानवर है ! स्साला भुक्कड़ की औलाद ! ऐसे खा रहा है जैसे जमाने भर का भूखा हो……ये मधुकर भी ऐसा ही है, अपने को अफसर कहता है…..लगता है ये दोनों मिलकर ही प्लान करते होंगे ! शैलेंद्र पैग हाथ में पकड़े सोचता रहा फिर थोड़ी देर में बोला, ‘ सर…..वो ट्रांसफर……

   बड़े अफसर के हाथ में अभी भी भूनी हुई मुर्गे की टांग थी और मांस के खींचे गये रेशों से मुंह भरा था लेकिन ट्रांसफर सुनकर उसके हाथ थम गये। स्थिति की नज़ाकत देखकर मधुकर ने बीच मेन दखलन्दाजी की और बोला, ‘ क्या बात कर रहा है, अरे ये तो सर के बाएँ हाथ का खेल है, बहुत जूनियर है रस्तोगी ! ’

   बड़े अफसर ने बिना चबाये ही मुंह का निवाला सटक लिया फिर जल्दी से बोला, जूनियर ! अरे वो अपना बच्चा है बच्चा ! जैसे कहेंगे वैसे ही कान पकड़कर बैठा देंगे समझे ! ’

   ‘ सर एक बार फोन…….’

  ‘ चलो ऐसा करते हैं उसे कल अपने ऑफिस बुला लेता हूँ। एक कच्चा लैटर मैं ही बना दूँगा……ठीक है……बड़ा अफसर जीभ को अपने मुँह के भीतर ही भीतर घुमाता रहा। थोड़ी देर खाली मुँह चलाता रहा, फिर मुर्गे की टांग प्लेट से उठाते हुए बोला, ‘ अभी तुम हमें ठीक से जानते नहीं हो, यहाँ तो मिनिस्टर तक हमसे पूछे बिना एक कदम नहीं चल सकते। बस ये समझो हम ही चला रहे हैं राजधानी !…..अरे मधुकर बताया नहीं……! ’

…….स्साला रस्तोगी का फोन नहीं लगा रहा, इधर-उधर की फेंक रहा है…….दिल कर रहा है दो लगाऊँ हरामी को और तोड़ दूँ जबड़ा, जिससे खाये जा रहा है पचड़-पचड़ ! शैलेंद्र बड़े अफसर को खाते देख सोच रहा था।

  ‘ सर तो मुख्यमंत्री कार्यालय भी रह चुके हैं। ‘ मधुकर अपने हाथ का पैग खत्म करता हुआ बोला।

    ‘ मत दिला उन दिनों की याद ! आहा ! क्या दिन थे ! शाम होते ही सारे चौकी-थाने हमारे दारू-मुर्गे की भाग-दौड़ में लग जाते थे। उन दिनों तो दिल्ली में पत्ता भी हमारे इशारे पर हिलता था। शैलेंद्र बाबू अगर तुम्हारा जन्मदिन उन दिनों मना रहे होते तो हम यहाँ नहीं होते, किसी फाइव-स्टार में होते इस वक्त ! ’ बड़े अफसर की जुबान के साथ आँखों में अजीब-सी चमक पैदा हो गई थी।

    ‘ सर मुझे तो अब भी बहुत अच्छा लग रहा है कि इतना बड़ा अफसर मेरे जैसे मामूली क्लर्क के जन्मदिन में शामिल है। ’ शैलेंद्र ने चतुराई से धारा के रुख को पहचानते हुए कहा।

   ‘ हाँ…..हाँ….’ बड़े अफसर के मुँह से तेज़ ध्वनि निकली।

  ‘ सर काफी देर हो गई, मैं आपके लिये सिगरेट लाता हूँ। ’

 ‘ अरे ! किसी को भेज देते हैं……’

‘ नहीं, नहीं सर ये वेटर ब्रांड ठीक नहीं लाते, मैं खुद जाता हूँ। ’ शैलेंद्र खड़ा होता हुआ बोला।

 बड़ा अफसर हाथ में पैग पकड़े बैठा था, इस बार उसका मुंह कबाब के टुकड़ों से भरा था, वो वैसे ही सिर हिलाकर बोला, ‘हूँ, हूँ……’

सीढ़ियाँ उतरते हुए शैलेंद्र ने दोनों अफसरों की ओर देखा….वे टेबिल पर झुके हुए थे, उनके हाथ चल रहे थे।

    वे दोनों थोड़ी देर तक चुपचाप खाते रहे। यकायक टेबिल के साथ खड़े वेटर को देख बड़ा अफसर बोला, ‘ जाओ भई ! और पैग लाओ। मच्छी रोस्टेड है ?…….वो लाओ……’

   वेटर बिना कुछ कहे चला गया।

  ‘ सर मुझे समझ नहीं आया आप इसे क्यों बुलाते हैं दारू में ? सिर पर बैठा रहता है, यूं लगता है हमारे पैग गिन रहा हो। ’मधुकर शैलेंद्र की अनुपस्थिति में खुलकर सामने आ गया।

  ‘ तू भी न, दिमाग तो तेरे भी बाबुओं जैसा है। अगर उससे दो बोतल ले भी लेते तो ये जो ठूँसे जा रहे हैं उसका बिल कौन भरता ? वो नहीं पीता, न पिये, काणा तो करो ! किसी तरह की कोई बात न छोड़ो कि वो कह सके उसने हमें पिलाई है, अरे वो भी तो बैठा है हमारे साथ ! अब भक्ति देख ! सिगरेट लेने गया है हमारे लिये ! हा…..हा…..’

वेटर ने एक साथ ट्रे में छ्ह पैग सजा दिये।

‘ उठाओ ! ’ बड़ा अफसर गर्व से बोला। अब उसकी आँखें पूरी लाल हो चुकी थी।

‘ आज आ गए मज़े ! सही माइने में यही पार्टी है…’

‘ मौका ही आज मिला है, खुद ही मुर्गा छुरे के नीचे आ गया, जन्मदिन बताकर ! बेचारे से रहा नहीं गया। ’ बड़ा अफसर गिलास उठाकर ज़ोर से बोला, ‘ जन्मदिन मुबारक हो ! ’

 इस सारी प्रक्रिया को मधुकर ने अपने अंदाज़ में दोहराया। फिर काफी देर तक दोनों हँसते रहे।

‘ वेटर ! मछली और लाना। ’ बड़ा अफसर इतना कहकर मधुकर की ओर देखने लगा, कुछ देर चुप रहकर बोला, ‘ मधुकर तुम भी सही आदमी पकड़ते हो ! वैसे मैं नहीं जानता किसी रस्तोगी को लेकिन तुमने उसे पूरा विश्वास में ले रखा है। ये हुनर कमाल का है तुम्हारा ! देखो एक-आध पार्टी लेके करते हैं कुछ जुगाड़बाज़ी !…..ये तेरा पैग है…..मैं सोच रहा हूँ उसके आने से पहले एक दौर और चला लेते हैं, क्यों ? भई, जन्मदिन है ! ’

 ‘ ठीक है। ’

 वे दोनों ठहाके लगाते रहे।

 वेटर छ्ह पैग लगाकर ट्रे ले आया।

चलो देर न करो, मुर्गा और ले आओ…..जल्दी ! ’ बिना वक्त बरबाद किये वे खाते रहे, पीते रहे। कमरे में सिर्फ चबाने और घटकने की आवाज़ें आती रही।

नीचे गोश्त भुनने की गंध ऊपर तक पहुँच रही थी। सामने की खिड़की पर वाहनों की रोशनी की आँख-मिचौली बढ़ गई। एक तेज़ रोशनी बड़े अफसर के चेहरे पर पड़ी। वो चौंक पड़ा। उसे समय की याद आ गई। उसने हाथ की घड़ी देखी। भुने मुर्गे की कुतरी टांग उसके दूसरे हाथ में थी, उसी हाथ को हवा में लहरा कर वो चीखा, ‘ अबे ! वो कहाँ गया ? पूरा घंटा हो गया है ! ’

बड़े अफसर की आवाज़ कानों में पड़ते ही मधुकर दोनों हाथ फैलाकर चमगादड़ की तरह तेज़ी से सीढ़ियाँ उतरकर नीचे आ गया और रेस्तरां के बाहर खड़े होकर देर तक इधर-उधर देखता रहा।

‘ भाग गया स्साला…..चूना लगा के ! ’ ऊपर पहुँचकर मधुकर हाँफता हुआ कह रहा था, ‘ इस बार तो पैग भी यहीं से……बड़ी महंगी दारू होती है यहाँ ! ’

सामने टेबिल पर दोनों हाथों से सिर पकड़े बड़ा अफसर बैठा था और नीचे काउंटर पर बैठे बड़ी मूंछ वाले सरदार जी का चेहरा उसके दिमाग में कौंध रहा था।


गजेन्द्र रावत
जन्म
25 अक्टूबर 1958 (उत्तराखंड)

विज्ञान स्नातक
प्रकाशन – (तीन कहानी संग्रह)
बारिश ठंड और वह
धुआँ-धुआँ तथा अन्य कहानियाँ
लकीर
हिन्दी की सभी साहित्यिक पत्रिकाओं में निरंतर कहानियों का प्रकाशन
पुरस्कार – कथादेश अखिल भारतीय लघुकथा पुरस्कार 2009॰
संप्रति –  स्वतन्त्र लेखन
संपर्क – डब्ल्यू ॰ पी॰ – 33 सी, पीतम पुरा, दिल्ली-110034
मो॰ – 09971017136
ई-मेल rawatgsdm@gamil.com

         

                               

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