हंसराज की चार ग़ज़लें

एक

जब से सुना कि माँ बीमार पड़ गई

हम भाइयों के बीच दरार पड़ गई

सबसे बड़ा नुकसान  बंटवारे का ये हुआ,

मां आधी इस पार, आधी उस पार पड़ गई

उम्रों की जमापूंजी थी रिश्तों की ये दौलत,

आज वो ही सरेआम  तार-तार पड़ गई

मशरूफ हैं हम दोनों पेशे में अपने-अपने

बस माँ हमारी, बीच में लाचार पड़ गई

वैसे ही क्या कम थी थकन बूढी आँखों की,

कम्बख़्त, बीच में फिर त्यौहार पड़ गई

हम बाँट कर ये जायदाद खुश तो हुए मगर,

ख़ानदान के चेहरों पे गर्दोगुबार पड़ गई

दो

एक लम्हा ही सही, वो तन्हा तो बिताती होगी,

कभी उसको भी, मेरी याद तो सताती होगी।

मैं उसको, हर लफ़्ज़ों में उतारा करता हूँ,

कभी वो भी मेरी तस्वीर  तो बनाती होगी।

मैं भी कुछ बात, ज़माने से नहीं कहता,

वो भी कुछ बात, ज़माने से तो छुपाती होगी।

मैं कहाँ भूल पाता हूँ  गुज़ारे लम्हों को,

कुछ बातें उसको  याद तो आती होगी।

तकिया मेरा भी गीला ही रहता है,

आँख उसकी भी भींग तो जाती होगी।

एक-एक लम्हा तुमने किश्तों में गुज़ारे है ‘हंस’

महीने उसके, यों ही गुज़र तो जाती होगी।

तीन

उसको भुला भी बैठा हूँ,  है उसी का इंतज़ार भी,

यही आदत है मेरी, और आदत से लाचार हूँ मैं।

एक दरिया है  हमारे दरमियाँ बस,

वो उस पार है  इस पार हूँ मैं।

मेरे चेहरे पे पढ़ लो तुम, बेरुखी अपने शहर की,

एक चलता-फिरता हुआ अख़बार हूँ मैं।

जो भी दिल में हो तेरे वो कह दो मुझसे,

हर फैसले के लिए  तैयार हूँ मैं।

एक दफ़ा भी ख्याल नहीं आया मुझे मनाने का,

मनो, किसी फ़क़ीर के लिए त्यौहार हूँ मैं।

चार

अपना किरदार छुपाना मुझे नहीं आता

जो नहीं हूँ वो नज़र आना मुझे नहीं आता।

दरिया हूँ भले छोटा  मगर अपना वज़ूद है,

समंदर में जाकर उतर जाना मुझे नहीं आता।

मिलता हूँ उससे रोज़  मगर, कायम है फ़ासले,

प्यार में हद से गुज़र जाना मुझे नहीं आता।

ऐ ख़ुदा ! जब तक नहीं मिलोगे छोड़ूंगा नहीं मैं,

दर से ख़ाली हाथ लौट जाना मुझे नहीं आता।

अपने पर है भरोसा खुदा पर ऐतबार है,

हर शख़्स के आगेझुक जाना मुझे नहीं आता।

——

हंसराज

द्वारका, नई दिल्ली

संपर्क- 7838725407

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1 Response

  1. Sumit jha says:

    Superb

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