हंस राज की लघु कथा ‘दान’

आज मैं बहुत जल्दी में था।  दफ्तर के लिए घर से निकलते-निकलते देर हो गई थी।  सोचा पैदल मेट्रो स्टेशन तक जाऊंगा तो और देर हो जाएगी। अतः रिक्शा ले लिया।  रिक्शेवाला लोहे के छर्रे पर अपनी बूढी हड्डियों के सहारे रिक्शा को खींचता स्टेशन की तरफ चल पड़ा।  स्टेशन पहुँचते ही मैं तेज़ी से रिक्शा से उतरा और उसे पैसे देने के लिए बटुआ निकाला ही था कि अचानक एक अंजान हाथ मेरी तरफ बढ़ गया।  मैंने उसे झिड़कते हुए कहा- भीख मांगते  शर्म नहीं आती, कुछ काम-धाम क्यों नहीं करते……..वगैरह-वगैरह।

दफ्तर पहुँच कर खुद को पड़ने वाली डांट का भड़ास मैं उसपर निकाल  चुका था।  रिक्शा वाला चुपचाप सब देखता रहा।  जब रिक्शा वाले से किराया पूछा तो उसने 25 रुपये बताया। उसे पैसे देकर मैं तेज़ी से अन्दर की तरफ बढ़ गया।  अभी 2-4 सीढ़ी ही चढ़ा था कि सहसा पीछे की आवाज सुनकर मैं रुक गया।  रिक्शा वाला उस भिखारी को 5 रूपये देते हुए कह रहा था- ‘लो, यह पाँच रुपये रख लो. मैंने तुम्हारे लिए भी मांग लिया था । ’

पाँव के नीचे से मानो जमीन ख़िसक गई।  हाथ में रखा हुआ बटुआ मुझे चुभता हुआ सा लग रहा था.

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1 Response

  1. Sumit says:

    Nice stores… amazing

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