डॉ हरविंदर सिंह बक्शी की तीन कविताएं

विनाश निकट खड़ा है

यह धरा पर क्या घटित हो रहा है

जाग रहा बाज़ार, इंसान सो रहा है।

दागदार करता प्रकृति का आंचल

बीज विनाश के मानव बो रहा है।

सुरसा जैसी बढ़ रही  सड़कों पर गाड़ियां

लील रही लोलुपता वृक्ष, वन और झाड़ियां।

तप रहे पर्वत, पिघलती हिम-शिलाएं

तांडव करतीं क्रुद्ध विकराल जल धाराएं

उद्घोष हो रहा है, विकास हो रहा है

मूर्ख मानव, विनाश निकट ही खड़ा है।

आशा
(स्तुति-गान)
तुम्हारे उर्जित साथ का आभास,
उर में भर जाता अनुपम उल्लास।
मन करता नृत्य बन मुदित मयूर,
वेदना-विहग उड़ जाता दूर।
टूटते जब प्रयास-पत्ते और सूखने लगता साहस-उपवन,
पंख लगाकर कल्पनाओंं को, तुम भरती जीवन में नवयौवन।
कठिनाइयों के कोहरे में तुन जैसे कोमल धूप,
सहलाती सर्द-सम्वेदना, तुम प्रेरणा का प्रतिरूप।
काले जलधर देख, हर्षित हलधर की तुम मुस्कान,
अन्तर्निहित तुम चातक-स्वर में जब गाता वह वर्षा-गान।
संचालित तुम्हीं से अखिल विष्व का उर-स्पन्दन,
हे अनश्वर आस! तेरा अनवरत अभिनन्दन।

मौन
मौन असीम ऊर्जा का कोष है,
योगी-मस्तक पर छाया परितोष है।
मत समझो कि मौन में नहीं जोश है,
मौन क्रान्ति का पूर्व-उद्घोष है।
मौन में अवसित है कर्कश नाद,
मौन है शब्दहीन मधुर संवाद।
मौन में अंतर्निहित है व्यथा,
अनकही, अनसुनी, अप्रकाशित कथा।

शब्द-दासता से रिक्त; सजीव संवेदना से सिक्त,
अद्भुत मौन की भाषा, नहीं सरल है जिसकी परिभाषा।
अनुभूति से जोड़ती; अंतःकरण से अंतःकरण,
मौन की भाषा का नहीं है कोई व्याकरण।
वेग से सीधे अंतर्मन के पट खोलता है,
निरीह से लगते शब्द, जब मौन बोलता है।

 

 

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