हाशिये पर

उदयराज

 

”हैलो, कौन?”
”हैलो, मैं श्यामल बोलता। तुम्हारे पीछे से।”
”अरे, श्यामल दा। तुमने इस नाशुक्रे को कैसे याद किया?”
”नहीं दीपक, तुम ऐसा मत बोलो। वो हमारा मिस्टेक था।”
”नहीं, श्यामल दा, कुछ तो सच, अ बिट ट्रूथ तो रहा ही होगा न।”
”हम तुम्हारा बात आज भी सबको बोलता। क्या बोला था तुम वो दही-दूध वाला बात?”
” यही कि दही में दूध मिलाने से दही ही बनेगा।”
” हां, तुम एकदम सत्य बोला था। हम अब समझ गया है। हम तो दूध का बाउल (कटोरा) को सागोर (सागर) समझ लिया था। और सोचा था कि थोड़ा सा दही में सागोर भर दूध मिला देगा तो दही का पता नहीं रहेगा।”
”होता है, जोश में ऐसा ही होता है। एक उम्र, एक विशेष वयस की शोभा होता है जोश भी। इस जोश के उपयोग यानी यूज के लिए होश भी तो चाहिए न। मगर गड़बड़ यहीं है। जिसके पास जोश होता है उसके पास होश नहीं होता और होश है जिसके पास उसके पास आईना नहीं है।”
”दीपक, यार तुम सब कुछ भूलकर एक बार फिर आ जाओ न।”
”श्यामल दा, याद है न तुम्हें? तुमने मुझे इसी होश की बात पर झिड़क दिया था। कहा था-मैं और मेरे जैसे लोग पीछे रह जाते हैं। मुख्य धारा में कभी नहीं मिल सकते। मैं तो आज भी उसी राह पर पड़ा हूं। तुम बताओ, मुख्य धारा की हलचल।”
”तुम टेढ़ा का टेढ़ा ही रहेगा। सुनो, मुख्य धारा में हम आया था ”पावर” पाने के वास्ते। सो हमने पाया। आज हमारा पास गाड़ी है, अपना घर है, दस ठो लोग आगे-पीछे है। हम अकेला नहीं चलता।”
”तुम्हारे साथ जो चले थे, क्या सब के सब तुम्हारे जैसे ही हैं?”
”तुम इतना काहे को सोचता है दीपक? हम मानता है कि सब लोग हमारे साथ वाला हमसे अच्छा था और एक बात पर मिट जाने वाला भी था लेकिन सबका भाग तो एक जइसा नहीं होता…।”
”दादा, एक कॉमरेड के मुंह से भाग्य की बात? यह क्या मुख्य धारा का चमत्कार है?
”हम भाग्य नहीं भाग बोला। भाग माने शेयर, हिस्सा।”
”शब्द बदलने से भाव नहीं बदलता दादा। भाग्य या भाग कुछ के हिस्से होने के पीछे तो साजिश एक ही है, है न?”
”तुम भी समझा, हम भी समझा –इस साजिश को।तुम इसको विचार से खत्म करना चाहा। हम इसमें घुस कर इसको समझ कर इसको शेष करना चाहा…।”
“परन्तु तुम आज खुद ही इस साजिश की मजबूत दीवार बन बैठे क्योंकि तुम हिम्मत वाले थे, क्योंकि तुम आधार वाले थे, क्योंकि तुम नेतृत्व की भाषा जानते थे…क्योंकि तुम इसी साजिश रचने वाली जाति के थे…।”
”तुम कुत्ते की दुम सा सीधा नहीं हो सकता। पता नहीं क्या सोचता है, क्या-क्या बोलता है…भाषा, जाति–ये सब क्या है? हम तो ये सब फिजूल मानता है.।”
”और इसीलिए इसकी चलने देते हो, जिसके चलते रहने से तुम सुरक्षित हो…।”
”दीपक, हम और तुम एक साथ ज्वायन किया था…।”
”हां…तब हमारा दल सत्तासीन नहीं था….सर्वहारों की आशा था, उनकी उम्मीदें की लहरें थीं। उनका स्थान था। उनके लिए कुछ कर पाने का उन्माद था।”
”लेकिन तुम तो तब भी हमको और दूसरा साथी को समझाता था। हमको धीरे-धीरे लोगों के मन में घुसना चाहिए। जोश में वो सब नष्ट नहीं करना चाहिए, जिससे हम एक दूसरे से बंधता है.. यही सब तो बोलता था तुम..।”
”हां”
”हम तुमको कापुरुष(कायर) बोलता था। बोला था हम कि दूब घास के माफिक बिछा रहेगा तो ओस का बूंद भी दबा देगा। और हम गलत तो नहीं बोला था। आज हमको देखो। कोई दबाने की बात सोच भी नहीं सकता। हम लोगों का कितना क्लब खोल दिया। जहां जहां यूनिटी नहीं था, वहां-वहां यूनियन बनवा दिया।”
”हां, श्यामल दा, हर तंत्र के अपने ताने-बाने होते हैं। तुमने भी ये खाते पूरी कर दी। याद है वह लड़की? वही लड़की, जिस पर मैं और तुम दोनों ही मन ही मन फिदा हो गए थे…। अपनी खिड़की के पास खड़े हम दोनों उसे दूसरी खिड़की के पास कपड़े उतारते देखते, उसके बदन के सलोनेपन के रेशमी रेशों से सरकती हुई हमारी आंखें हर गोपन अंगों पर ठहर ठहर जाती थीं और गर्मी में भी हम ठिठुर-ठिठुर जाते थे। इस सिहरन में एक चिंगारी सी चिनक उठती थी, जब हम एक दूसरे को अपने जैसी ही स्थिति में पाते। मैं तो सहज हो जाता लेकिन तुम एकदम से झपट पड़ना चाहते थे।”
”हां, लेकिन वह लड़की तो हम दोनों को धोखा दे गया।”
” दोनों को नहीं, सिर्फ तुम्हें श्यामल दा। तुमने उस पर अधिकार मान लिया था अपना–अकेले अकेले। प्यार की खासियत है अधिकार सहज सा।”
”वो चीज ही ऐसा था। कितना रक्तो भर देता था उसका देखना।”
”हां, हर मादक चीज़ मादकता फैलाती है पर होती बड़ी क्षणिक है। बस यही सोच सहजता है।”
” तुम साला पाजी (बदमाश) आदमी है। तुम इतना धैर्य कहां से पा गया?”
”इसीलिए तो हाशिये पर हूं।”
”तुम लेखक है न। बात बनाना तुमको बहुत आता है।”
” लेकिन बातें तो जोश भरी तुम करते हो कॉमरेड। ताली बजवाते हो, जोश जमाते हो और …।”
”दीपक, कॉमरेड तो तुम भी हो। तुम तो सब समझता है। जब पावर का लड़ाई चलता है तब असली उद्देश्य पाना कितना मुश्किल है। है न?”
” मुश्किल तो है पर असंभव नहीं श्यामल दा। इस देश को जब काम की जरूरत है, तब हड़ताल होती है। हड़ताल एक कारगर तरीका, जिसे आए दिन उपयोग में ला लाकर हम कहां पहुंच गए।”
”हड़ताल का यूज ज्यादा हुआ और कभी कभी बेकार भी हुआ। हम मानता है। लेकिन हमारा आदमी लोग ज्यादा होशियार भी बन गया। ये तो तुम भी मानेगा?”
”मानेगा क्यों नहीं? रोज ही तो भुगत रहा हूं। आदमी के सामन्ती विचार और आचरण नए नए रूप में सामने आ गए हैं। पुराने महल ढहे तो नये महल समस्त सजते हैं–जैसे घरों के पर्दे बदल गए हों।”
”तुम हिप्पोक्रेट है। झोला लटकाए कॉमरेड को स्कूटर पर बैठा देख कर तुम जल गया है–कार में चलता देख कर सुलग गया है। है न?”
”हां, कितनी जानों के जनाजे पर उगी हैं ये बेलें…। हां,क्योंकि मैंने माना है कि कॉमरेड वह है जो सड़क के आदमी के पास है, साथ है। किसानों के पांव के छाले, उसके अपने हैं। मजदूर के घर के चूल्हे का धुआं उसकी सांस है—बिना किसी भेद के, बिना भाव के। कॉमरेड के जीवन का सपना सबके लिए होता है, सिर्फ अपने लिए नहीं। श्यामल दा, तुमने क्लब खोले हैं, तो उनसे गुंडागर्दी बढ़ी है, बलात्कार बढ़े हैं। कितने गरीबों को फायदा पहुंचा है इन क्लबों से?”

”दीपक, तुम यूनिटी के अगेन्स्ट बात करता है। अरे, दुनिया का सब कॉमरेड यूनिटी का बात, ऐक्यो की बात बताता है। तुम भी इसी ऐक्य (एकता) के लिए चिंता करता है। बैठने के लिए एक जगह होने से विचार-विमर्श का अवसर मिलता है।”

”श्यामल दा, तुम्हारे इस क्लब में कैसे लोग आते हैं? अधिकतर क्लब्स में बेकार युवकों का गिरोह अंटा पड़ा है। तुम्हारे संरक्षण का लाभ उठाकर ये लोग समाज में एक नई रस्म चलाते हैं। आतंक का रस्म। हर छोटी बड़ी पूजा के लिए चंदा उगाहना ही जैसे इनका मुख्य काम है। चलो, इस पर भी ऐतराज नहीं लेकिन चंदा उगाहने के लिए जिस आतंक का सृजन किया जाता है–क्या वह आतंक भी हमारी पार्टी के सिद्धान्तों में सूचीबद्ध है? गरीब हो या अमीर, ठेलेवाला हो या ट्रक वाला, पैदल चलने वाला हो या कार वाला, इन तथाकथित कॉमरेड नौजवानों से सभी एक समान आतंकित रहते हैं। क्या कहेंगे आप इसे?”

”नौयुवक लोग है न। उमंग में थोड़ा ज्यादा बढ़ जाता है। अरे, हम तुम भी तो नौयुवक था। छोटा छोटा बात में फायर हो जाता था। जैसे हमारा फायर होने से अभी सब कुछ बदल जाएगा। लेकिन क्या बदला? गरीब और गरीब हुआ, अमीर और अमीर हुआ…।”
”हां, इसके साथ कॉमरेड्स भी तो अमीर हो गया और उसका संघर्ष गरीब हो गया।”
” तो खराब क्या हो गया? कॉमरेड आदमी नहीं है क्या? क्या उसका आशा-आकांक्षा सही नहीं है?”
”है। साधन सम्पन्न होना कॉमरेड के लिए सुअवसर की बात है लेकिन साधारण आदमी सा नहीं। यहीं तो हम लोग सब भूल गए। जिन्हें साथ लेकर चले, वो रहा में छूटते गए और नए लोग मिलते गए, जिन्होंने अपने सपने और अपनी आशा हम पर उतार फेंकी और हमने अंधेरे में ही सही, उसे अपनाने में गर्व समझा। आदतन आवाज़ तो कॉमरेडी ही रही लेकिन आचरण, जीवन शैली वहीं हो गई, जिसका शायद हमसे बड़ा विरोधी कोई नहीं था। कितना दोहरा चरित्र हो गया हमारा। गरीबों-असहायों को हमने यही दोमुंही चरित्र दिया है।”
”दीपक, तुमसे हम मित्र की तरह मिलने आया और तुम हमको ये सब शिक्षा देने लगा। हमको तुम नया आदमी समझता है क्या? हम भी तुम्हारा माफिक पार्टी किया। बड़ा बड़ा बोई (किताब) पढ़ा। जिस गरीब का तुम पक्ष लेता है, वो अपना भूख मिटाने का वास्ते, अपना हवस का वास्ते तुमको-हमको सबको बेच खाएगा। तुम तो खाली बोई में पड़ा रहता है। वास्तविक दुनिया का कोई चाल तुमको कैसे समझ में आएगा? मिल का यूनियन देखो। एक दो दिन हड़ताल हुआ नहीं कि सब गरीब लोग भागने लगा। कुत्ता माफिक उस मिल को छोड़ दूसरा मिल में जाकर रिरियाने लगा। नहीं तो ठेकेदार के पास में जाकर काम करने लगा। अइसा लोग से क्या होगा?”
”दादा, गरीब तो गरीब इसीलिए है कि उसके पास न तो सोच की धारा है न ही सोच की धारा बनाने की स्थिति। इस स्थिति को बनाने और उन्हें मुहैया कराने की लड़ाई हमारी लड़ाई है। किसी चीनी या रूसी रास्ते से नहीं। अपने रास्ते से बिल्कुल देसी रास्ते से। जिस आस्था और विश्वास के लोग कायल हैं–उसी आस्था और विश्वास को रखते हुए दृष्टि में परिवर्तन लाना है।”
”दीपक, इसीलिए हम तुम्हारा पास आया है। देखो, तुम विचार करता है–हमको बढ़िया-बढ़िया स्लोगन दे सकता है। तुम्हारे जैसा लोगों का हमारा पास एक पूरा टीम है। पर तुम्हारा माफिक वो सब भी कुछ कुछ टेढ़ा ही है। तुम हमारा मित्र है। हम उस सबका साथ तुमको भी सह लेगा…। तुम पाजी मार्जिन पर क्यों सड़ना चाहता है?”
” मार्जिन पर कोई सड़ता नहीं दादा। बल्कि तुमलोगों की मुख्य प्रवाह का आधार बनता है। मैथ तो बनाया ही होगा तुमने स्कूल डेज में। मार्जिन पर ही मौलिक क्रियाएं गुणा, भाग, जोड़, घटाव की जाती है। बाकी पेज तो रिजल्ट ही रिजल्ट का मकड़जाल होता है।”
”लेकिन तुम्हारा वैचारिक क्रांति मार्जिन पर नहीं आ सकता। प्याले में तूफान कहां से आएगा?”
”मार्जिन तूफ़ान के लिए नहीं होता। तूफान आने पर लोग बचने के लिए किनारे चले जाते हैं। सुरक्षा के लिए ताकि असमय और अनीतिवश आए तूफ़ान से बचाकर अपने को नए संघर्ष में लगा सकें।”
”तो यही तुम्हारा फैसला है?”
”क्या?”
”कि तुम हमारा साथ नहीं आएगा?”
”यदि तुम आज की मुख्यधारा के साथ हो तो….।”
”तुम्हारा मार्जिन पर हमारा वास्ते जगह रहेगा?”
”दुर्भाग्य को निमंत्रण ने दें आप।”

”उसी दुर्भाग्य से तुमको बचाना चाहता है हम।”

”मगर, यह तो हमारा सौभाग्य है।”

”क्या?”
”बने रहना–वहीं हाशिए पर।”

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1 Response

  1. anand says:

    after a long time a great thoughtful writing read by me .
    i feel fortunate and honoured thanx

    expecting many more God give you you strength to continue this……………………….

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