‘कविता लिखना आसान काम नहीं’

1.कविता के प्रति आपका झुकाव कैसे उत्पन्न हुआ ?

शहंशाह आलम : मेरा पूरा समय अभाव में गुज़रा है। होश संभाला तो देखा पिता हम पाँच भाई और तीन बहनों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। पिता बिहार स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कंपनी के मुंगेर प्रतिष्ठान में मामूली ड्राइवर थे। जो कमाते, मेरी माँ के हाथों में सौंप देते थे। वे छल नहीं जानते थे। आज भी नहीं जानते हैं। सिद्धांतपसंद आदमी थे। अपने सिद्धांत पर अडिग रहने के कारण पिता दो-तीन मरतबा निलंबित हुए थे। मुझे याद है, पिता जिस समय निलंबित किए गए थे, उस समय बिहार के मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र हुआ करते थे। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र मुंगेर आए थे और उनका काफ़िला हमारे मोहल्ले गुलज़ार पोखर होकर गुज़रने वाला था। मैं छोटा था उस वक़्त। देखा पिता ने ख़ुद को अकारण निलंबित किए जाने वाला आवेदन मुख्यमंत्री के काफ़िले को रोककर उन्होंने सीधे मुख्यमंत्री के हाथों में सौंपा था। आज ऐसा कोई कर्मचारी करने की ज़ुर्रत करेगा, तो उस कर्मचारी को शायद जेल की हवा खानी पड़ जाए मुख्यमंत्री के काफ़िले को रोकने के जुर्म में। लेकिन उस समय के मुख्यमंत्री ने ऐसा कुछ भी नहीं करवाया बल्कि धैर्य से मेरे पिता के दुःख को उन्होंने सुना था और पिता के दिए आवेदन पर एक्शन भी लिया। लेकिन नतीजा यह हुआ कि एक अदना-से ड्राइवर की ऐसी हिम्मत देखकर उस वक़्त के नौकरशाह ने पिता को निलंबित नहीं बल्कि अपने कार्य में लापरवाही बरतने के कारण बर्ख़ास्त हुआ दिखा दिया था। घर में कोहराम-सा मचा था। पिता के साथ हुए इस अन्याय को देखकर मेरे मन में गहरा आक्रोश उठा था। लगा था कि उस नौकरशाह की ईंट-से-ईंट बजा दूँ। परंतु यह एक छोटे बच्चे का आक्रोश भर था। मैं उस नौकरशाह का कुछ बिगाड़ नहीं सकता था। लेकिन उस नौकरशाह के विरुद्ध मेरे मन में जो ग़ुस्सा था, वह ग़ुस्सा कविता की शक्ल में कोरे काग़ज़ पर उतरा था। अराजकता हर समय में अपना डेरा डाले हुए थी। सच पूछिए तो कविता की तरफ़ मेरा झुकाव तभी से है। हालाँकि मेरे पिता के साथ ग़लत हुआ था, उस ग़लत के विरुद्ध पिता ने न्यायालय का सहारा लिया और केस जीतकर दोबारा नौकरी में वापस भी आए। लेकिन पिता के साथ हुए अन्याय ने उनके घर में एक अदद कवि पैदा ज़रूर कर दिया था।

  1. आपकी कविताओं में एक आंतरिक लय और यथार्थ से आगे जाकर सृजन की कोशिश दिखाई पड़ती है। आप इसे कैसे साध पाते हैं ?

शहंशाह आलम : हमारी जीवन-स्थितियाँ इतनी विकट होती जा रही हैं कि हमारा जीवन-राग हमसे छिटकता चला जा रहा है। जीवन में जो बचा दिखाई देता है, अवसाद ही दिखाई देता है। इस जीवन को एक अवसादक जीवन कहिए, तो ग़लत नहीं होगा। इसलिए कि आज जिस आदमी पर नज़र डालिए, वह अवसादग्रस्त दिखाई देता है। यहाँ जिस जीवन और जिस आदमी के बारे में मैं कह रहा हूँ, वह जीवन या वह आदमी खाया-अघाया नहीं है बल्कि ख़ुशियाँ ऐसे जीवन और ऐसे आदमी से दूर जा चुकी हैं। ऐसे में एक कवि को ऐसे जीवन

और ऐसे आदमी के लिए अपने भीतर की लय को बचाए रखना होता है। एक कवि के जीवन और आदमी का यथार्थ यही है। इसी कारण एक कवि एक परिष्कृत, एक सर्वव्यापी, एक ऊर्जा से भरी कविता दे पाता है। मैं भी कवि होने के नाते यही करता हूँ यानी अपनी कविता को ऐसे ही साधता हूँ। कवि का काम साधने का ही तो काम होता है। मैं भी सुस्ती लाने वाले इस समय को अपनी कविता के भरोसे ही साधता रहा हूँ। यूँ कहिए कि जीवन और आदमी के लिए छितराई हुई ख़ुशियाँ समेटता रहता हूँ ताकि अवसाद से भरे लाखों-करोड़ों लोग, मेरी कविता में कुछ ढूँढ़ना चाहें, तो अपने हिस्से का सुखद क्षण ढूँढ़ें। इसलिए कि आज सबसे अधिक जो चीज़ हमसे छीन ली जा है, वह हमारी ख़ुशी ही तो है। मुझमें कविता जब आती है, उन्हीं लाखों-करोड़ों लोगों के दिलों से होकर आती है।

  1. आपके पहले कविता-संग्रह ‘गर दादी की कोई ख़बर आए’ से लेकर आपके पाँचवें कविता-संग्रह ‘इस समय की पटकथा’ तक कविता के गंभीर पाठकों के ज़ेहन में सुखद स्मृति के रूप में सुरक्षित हैं। कविता के आलोचकों ने आपकी किताबों को किस तरह जाँचा-परखा है ?

शहंशाह आलम : सच कहिए तो मेरी कविताओं को पत्र-पत्रिकाओं ने जिस प्रमुखता से छापा, मेरी कविताओं को पाठकों ने जिस अपनत्व से अपने जीवन की कविताएँ मानीं, कविता के आलोचकों ने मेरी कविताओं को हमेशा उपेक्षित किया। इसमें दोष आलोचकों का क़तई नहीं मानता। इसलिए कि आलोचना का इलाका मेरे विचार से एक ऐसा इलाका है, जिसमें मेरे जैसे कवियों का प्रवेश सदियों से वर्जित है। इस इलाके में उन्हीं कवियों की ध्वनियां सुनी जाती रही हैं, जो कवि आलोचकों के सुर-ताल में अपना सुर-ताल मिलाते रहे हैं। मेरा कवि तो बिना ताम-झाम वाला शुरू से रहा। जबकि आलोचकों को तो ताम-झाम चाहिए होता है। वे उन्हीं कवियों पर लिखते रहे हैं, जो कवि उनके दरवाज़े तक पहुँचते हैं या उन कवियों के आका उन्हें उनके दरवाज़े तक ले जाते हैं। मुझमें कमी यही रही कि मैं किसी के तलुए सहला नहीं पाया। आदत ही नहीं रही ऐसा करने की। न मेरे माँ-पाप को ऐसा करते कभी देखा है। उम्मीद यही की जानी चाहिए कि कविता के आलोचक आगे भी ऐसा ही बर्ताव मेरे साथ करते रहेंगे। इसलिए कि आगे भी उनकी गली मैं जाने से रहा। हर सच्चे रचनाकार को ऐसा ही होना चाहिए। यह काम उन विलक्षण कवियों के लिए छोड़ देना चाहिए, जो ख्यात आलोचकों की नज़रों के तारे हैं।

  1. आज आभासी दुनिया जिसे हम कहते हैं यानी फ़ेसबुक, वेब पोर्टल आदि, इस आभासी दुनिया से क्या हमारे लेखक-वर्ग को कोई फ़ायदा पहुँचा है ?

शहंशाह आलम : मैं तो इस आभासी दुनिया को हमारे लिए फ़ायदे की दुनिया मानता हूँ। ग़ौर कीजिए तो फ़ेसबुक और वेब पोर्टल की वजह से आज लिखने वालों की सक्रियता काफ़ी बढ़ी है। इस मंच का अपना नफ़ा-नुक़सान है। यहाँ आपकी किसी कविता अथवा आपके किसी विचार पर तुरंत प्रतिक्रिया का फ़ायदा ज़रूर होता है। नुक़सान यह है कि इस आभासी दुनिया की प्रतिक्रियाएँ पानी के बुलबुले जैसी होती हैं। आपके लेखन को स्थायित्व पत्र-पत्रिकाएँ ही देती हैं। तब भी यह आभासी दुनिया रोज़-ब-रोज़ कवियों और विचारकों की सँख्या बढ़ाने में सहायक सिद्ध हो रही है। इसमें ज़र्रा बराबर भी संदेह नहीं है।

  1. आजकल के बिलकुल नए कवियों ( 1980 के बाद जन्मे ) की कविताओं के बारे में आपके क्या विचार हैं ?

शहंशाह आलम : इस कवि-पीढ़ी के बारे में मेरी राय सकारात्मक है। यह पीढ़ी समकालीन कविता को एक नए मनुष्य, एक नई पृथ्वी, एक नए आकाश, एक नए संगीत से हमारे जीवन को समृद्ध कर रही है। इस पीढ़ी की कविताओं का रंग-ढंग थोड़ा अलग हटकर है। इन कविताओं का अपना मन-मिज़ाज है। आज का घुटन भरा जो माहौल इस पीढ़ी को मिला है, इस माहौल के ख़िलाफ़ यह पीढ़ी है। थोड़ी-बहुत कमी मुझे इन कवियों में यह दिखाई ज़रूर देती रही है कि ये कवि प्रगतिशील, जनवादी और वैज्ञानिक सोच से ज़रा हटकर अपने को खड़ा करने की कोशिश करते रहे है। मेरे विचार से इस पीढ़ी का यह प्रयास इनके लिए थोड़ा घातक सिद्ध हो सकता है। यही वजह है कि इनका इस बेहद जटिल वर्तमान के प्रति आक्रोश उतना मुखर नहीं है, जितना इनसे समकालीन कविता खोजती रही है। आप ग़लत के ख़िलाफ़ खड़े नहीं होंगे तो आप साहित्य के इतिहास में किस रूप में जाने जाएँगे, यह भी इस पीढ़ी को सोचना होगा। रूढ़िवादी होना आपके हित का कभी हो नहीं सकता। आपको दो टूक कहने की शैली विकसित करनी ही होगी।

इस पीढ़ी के कवियों को लिखने से पहले मेरे विचार से उन साहित्य-आंदोलनों के बारे में ज़रूर जानना चाहिए, जिन आंदोलनों ने हमारी वैचारिकता को नई धार दी। जिस आंदोलनों ने हमें अँधेरे और उजाले का फ़र्क़ समझाया। जिन आंदोलनों ने हमें सीधे और सचेत होकर लिखना सिखाया। यहाँ यह सब मैं इसलिए कहना चाहता हूँ क्योंकि आज की पीढ़ी के कवियों को किसी प्रगतिशील आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं है। सीधे-सीधे कहिए तो इस पीढ़ी में विज्ञानिक सोच का अभाव मुझे अकसर दिखाई दे जाता है। यानी इनके लेखन में भटकाव और विलगाव की स्थितियाँ ज़्यादा हैं। इन स्थितियों से जो बचे रहकर अपने लेखन में लगे हैं, वे ही कवि अच्छा लिख रहे हैं।

  1. क्या आज कविता का कोई सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व रह गया है ?

शहंशाह आलम : अपना-अपना नज़रिया है चीज़ों को देखने, परखने और समझने का। मेरा नज़रिया यह है कि कविता अकेली ऐसी विधा है, जिसमें सबसे अधिक लिखने वाले सक्रिय हैं। कहने वाले यह कहकर निकल लेते हैं कि कविता लिखना सबसे आसान काम है, इसीलिए इस विधा में लोग ज़्यादा सक्रिय दिखाई देते हैं। मैं बिलकुल इसके उलट सोचता हूँ कि यह विधा सबसे दुरूह विधा है। फिर भी इसी विधा से लिखना-पढ़ना लेखक शुरू क्यों करते हैं! भले बाद में वे साहित्य की किसी दूसरी विधा की शरण में चले जाएँ और फिर सब कवियों की कविताओं को ख़ारिज करना शुरू कर दें। जबकि वे ख़ुद कविता के घर में शरणागत रह चुके होते हैं। तब भी कविता के घर को तोड़ने की कोशिश में लग जाते हैं। कविता के सांस्कृतिक-सामाजिक महत्व को कम करने की एक तरह से साज़िश है यह। इसलिए कि कविता का सांस्कृतिक-सामाजिक महत्व काफ़ी पुराना है, पुरातन है। इसका यह महत्व ख़त्म हो चुका है, यह मैं मानने को क़तई राज़ी नहीं हूँ। कविता जैसी महत्वपूर्ण विधा का महत्व ख़त्म कभी हो ही नहीं सकता। अब हमीं कविता के ख़्वाबों को मार देंगे तो इसमें कविता का कैसा दोष!

  1. आज की कविता के बारे में कहा जाता है कि कवि हैं, कविताएँ हैं लेकिन पाठक नहीं हैं ? आज की मुख्यधारा की कविता को पाठकों से कैसे जोड़ा जाए ?

शहंशाह आलम : सच यह है, हमने यानी हम रचनाकारों ने कबीर वाला, निराला वाला, नागार्जुन-त्रिलोचन-शमशेर वाला जीवन जीना जबसे छोड़ा है, हम जनता से दूर होते चले गए। मुझे याद है, मुंगेर मेँ जब मैं था और रामदेव भावुक जैसे जनकवि, छंदराज जैसे शायर अकसर जनता के बारे में बातचीत किया करते, फ़िक्र किया करते। इस बातचीत का, इस फ़िक्र का नतीजा यह निकलता कि किसी रिक्शे वाले को ठीक किया जाता, उस रिक्शे पर माइक बांधा जाता और ‘कविता जनता की ओर’ लिखे बैनर से रिक्शा सज जाता और हम इसी तरह कभी मुंगेर के, कभी जमालपुर के, कभी बरियारपुर के, कभी हवेली खड़गपुर के किसी व्यस्त चौक पर अपनी कविताओं, अपने गीतों, अपनी ग़ज़लों के साथ सीधे जनता से मुख़ातिब होते। हम ऐसा अपना कवि-धर्म मानकर किया करते। हमारा यह ‘कवि-धर्म’ हमें जनता का कवि बनाए रखता था। अब हमारे सामने, यानी हम कवियों के सामने, संकट यह है कि हम जनता से बग़ैर जुड़े जनता का हाल-समाचार बयाँ करते फिर रहे हैं और ढोल यह पीट रहे हैं कि जनता के असली शुभचिंतक हमीं बचे रह गए हैं इस धरा-धाम में। दरअसल हमारा यही सोचना हमें जनता से दूर किए हुए है। ऐसे में, इस बात के लिए हम जनता को दोषी नहीं मान सकते कि जनता साहित्य से विलग होती जा रही है। यह विलगाव दरअसल हमारा विलगाव है। इस पर सोचना भी हमें है, जनता तक पहुंचने का रास्ता भी हमें ही निकालना है। कविता की ताक़त बची हुई है, कहानी की भी, उपन्यास की भी। कबीर-निराला, नागार्जुन-त्रिलोचन-शमशेर जैसे कवि-वृक्ष के झड़ रहे साहस के पत्तों को चुन-चानकर जनता के बीच हमें फिर से जाना चाहिए। तभी जनता हमें अपना समझेगी, हमारे लिक्खे को अपना समझेगी। इसके लिए जनता के जिस पर्दे को हमने सादा छोड़ रक्खा है, उसे जनता की महागाथा से हमें एक सच्चे रंगरेज़ वाले रंग से भरना होगा। इस तरह हम कविता के नए पाठक भी बना सकेंगे।

  1. बिहार के समकालीन कविता-परिदृश्य को आप किस रूप में देखते हैं ?

शहंशाह आलम : बिहार का समकालीन कविता-परिदृश्य काफ़ी समृद्ध है। सीधे-सीधे कहें तो बिहार की समकालीन कविता देश भर में अपना एक नया ठौर-ठिकाना बनाकर कविता के इस विपरीत और क़िलाबंदी के समय में भी ताज़ा हवा के झोंके जैसी फैली हुई है। कविता के विशेषज्ञ भी इस बात को दिल से स्वीकारते रहे हैं कि बिहार की समकालीन कविता देश की समकालीन कविता को खाद-पानी देती आई है। बिहार के कवियों की फ़ेहरिस्त लंबी है। यहाँ के जो जेनुइन कवि हैं, वे कोरा मनोरंजन के लिए कविताई नहीं कर रहे हैं। सच पूछिए तो कविता के पूरे अस्तित्व को बिहार के कवियों ने बचाकर रखा है। बिहार की धरती सचमुच में कविता का उत्सव मनाती है। यहाँ के कवि जितने विलक्षण हैं, उनकी कविताएँ उतनी ही ज़्यादा हमारे कठिन जीवन को प्रकट करती रही हैं।

  1. आप अपने कविता-लेखन में किन देशी या विदेशी कवियों से प्रभावित रहे हैं ?

शहंशाह आलम : सच पूछिए तो मैं अपनी कविता-यात्रा में एक ही कवि से गहरे तक जुड़ा हुआ महसूस करता रहा हूँ, वे कवि हैं पाकिस्तान के अफ़ज़ाल अहमद। इस कवि की कविताएँ उदास पानी तक को आग बना सकती हैं। दुनिया में ढेरों कवि हैं, जिनसे प्रभावित हुआ जा सकता था। मगर मैंने जब से अफ़ज़ाल अहमद की कविताओं को पढ़ा है, तब से सिर्फ़ इन्हीं का मुरीद होकर रह गया हूँ। हाँ, मेरी पसंद के कवियों के बारे में जानना चाहें तो आलोकधन्वा, अरुण कमल और राजेश जोशी बेहद पसंदीदा कवियों में से हैं। मेरे समकालीनों में मैं सुशील कुमार, राजकिशोर राजन, राकेश रंजन, विनय सौरभ, राहुल राजेश की कविताएँ मुझे बेहद पसंद हैं। इधर के कवियों में मनोज कुमार झा, शंकरानंद आदि अच्छा लिख रहे हैं। प्रभावित मैं बस अफ़ज़ाल अहमद से रहा हूँ। मेरी इधर की कविताओं में अफ़ज़ाल अहमद का असर देखा भी जा सकता है। मेरी अफ़ज़ाल अहमद को समर्पित एक कविता आप भी सुनिए :

 

वे मुझे समुंदर के पास जाने नहीं देंगे

वे तुम्हें समुंदर के पास जाने नहीं देंगे

तो पानी में नमक मिलाकर समुंदर

मैं तुम्हारे लिए ख़ुद बना दूँगा

लहरें तुम में पहले से मौजूद हैं मेरी जान

 

वे मुझे घोड़े की सवारी करने नहीं देंगे

मैं उनके घोड़े की नाल चुराकर

तुम्हारी नाव में ठोंक-पीट दूँगा

तुम्हारी नाव तुम्हारे लिए घोड़ा बन जाएगी

तुम्हारे जैसा चाबुक-सवार कोई है कहाँ

क्या ऐसा सचमुच हो पाएगा

हाँ, मुझे मालूम है, ऐसा सचमुच हो पाएगा

 

फिर तुम अपनी मर्ज़ी का सफ़र कर सकोगे

फिर तुम अपनी मर्ज़ी का गीत गा सकोगे

 

फिर वे तुम्हें तुम्हारी आज़ादी से

कभी रोक नहीं पाएँगे मेरी जान।

  1. अंत में चलते-चलते एक हलका-फुलका सवाल पूछना चाहूँगा कि कविता-लेखन से आपने क्या खोया-पाया है ?

शहंशाह आलम : ओम दा, यह बड़ा बढ़िया सवाल पूछ लिया है आपने। कविता ने मुझे आज तक कुछ भी खोने नहीं दिया। इसी कविता ने मुझे नौकरी पर भी लगवाया है। इसी कविता ने न जाने कितने अनजानों को अपना बनवाया है। मेरे ख़्याल से जहाँ रिश्ते के सारे दरवाज़े बंद कर दिए जाते हैं, कविता रिश्तों के उन बंद दरवाज़ों को खुलवाकर दम लेती है।

 

——

You may also like...

1 Response

  1. शायान कुरैशी says:

    शहंशाह आलम का साक्षात्कार पढ़ कर सुखद अनुभव हुआ। एक ऐसे सच्चे कवि, जिसका मन दर्पण की तरह स्पष्ट, आकाश की मानिंद विस्तृत, धरती जैसा उपजाऊ और पर्वतों की विशालता से परिपूर्ण होते हुए भी एक विरहा के कोमल ह्रदय की संवेदनाओं से पोषित है, के अन्तर्मन् में झांकना कितना बहुमूल्य क्षण होता है यह इस साक्षात्कार को पढ़ कर महसूस होता है।

Leave a Reply