हमारे समय की पटकथा

राजकिशोर राजन

 

हम ऐसे समय में जी रहे हैं जब साहित्य भी बाजारवाद के ढाँचे में समाहित हो रहा है। प्रतिरोध के स्वर नेपथ्य में जा रहे हैं। वैसे में एक कविता ही है जो सबसे ज्यादा बेचैन है, चूँकि उसका सपना संसार को सुन्दर, कलात्मक, भय-भूख और शोषण से मुक्त करना है। आज हिन्दी कविता का संसार निरन्तर विस्तृत और समृद्ध हो रहा है। वह सीना तान कर इस कविता विरोधी और मनुष्य विरोधी समय के विरूद्ध खड़ी है।
शहंशाह आलम हिन्दी कविता संसार के जाने-पहचाने नागरिक हैं और ‘इस समय की पटकथा’ उनका पाँचवा काव्य संग्रह है। संग्रह पर कुछ बात हो उससे पहले ही यह रेखांकित करना जरूरी है कि शहंशाह आलम की कविताएं भले कोरे कागज पर जन्म लेती हैं लेकिन जीना किताबों में नहीं चाहती हैं, उनकी इच्छा मजदूर, किसान, पसीने से तरबतर आम आदमी के बीच जीने की है। इसीलिए इस कवि की कविताएं कागज से बाहर की हैं और अकारण नहीं कि अपने समय की पटकथा हैं। ‘हत्या के इस समय में’ नामक कविता में हमारे समय की एक भयावह सच्चाई से आप भी रूबरू होइए –
मालूम नहीं किधर से चाकू आया/
और कैसे घुसा उसके पेट में/
कोई अँधेरे झुरमुट में था छिपा।
मुक्तिबोध के ‘अँधेरे में’ का भयानक विस्तार हो चुका है। वह अँधेरा और ज्यादा मायावी, शातिर और मनुष्य विरोधी हो चुका है। मठ और गढ़ दिनोंदिन रक्तबीज की तरह फैल रहे हैं। परन्तु, कवि सिर्फ दर्शक बन कर अपने कविकर्म का इतिश्री नहीं करना चाहता। शहंशाह आलम जैसे कवि ऐसा कर भी नहीं सकते। कवि प्रतिरोध में खड़ा होता है भले हत्यारा उसका कत्ल भी क्यों न कर दे –
हत्या और मृत्यु के समय में/
मैं चाहता हूँ खींच निकालूँ/
हत्यारे को झाड़ी के पीछे से
जन सरोकार रखने वाले कवि की यही खास पहचान है। वह आलोचकों को चमत्कृत कर देने वाली और मानसिक खुराक देने वाली कविताओं के बरक्स जनता के लिए और समय से संवाद करने के लिये कविताएँ लिखता है। इस संग्रह की एक कविता है ‘चावल’ जो प्रकारान्तर से शहंशाह आलम की कविताई का वह पक्ष है जो उन्हें अपने समकालीनों के बीच महत्वपूर्ण बनाती है-
चावल ने रचे कितने शरीर/
कितनी आत्माओं को दिया संबल/
कितनों को संभावनाएं/
कितने बच्चों को किलकारियाँ/
जीवन की लड़ाई में भात बन कर
जैसे जीवन की लड़ाई में चावल का भात बन जाना उसका श्रेय और प्रेय है उसी प्रकार शहंशाह आलम की कविताई भी है।
कवि के पास भाषा की पूँजी है और कहने का अपना तरीका। भाषा में गंगा-जमुनी तहजीब देखनी हो तो इनकी कविताएँ बेहतर उदाहरण हैं। इनकी कविताएँ शिल्प के नाम पर तिलिस्म नहीं रचती अपितु खूबसूरत तरीके से और सलीके से अपनी बात कहती हैं। एक कवि को भाषा के संसार में अपने लिये कुछ अलग भाषा की तलाश करनी पड़ती है, उसे धो-धाकर और तराश कर अपना बनाना पड़ता है। यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि शहंशाह आलम ने अपनी कविताओं की भाषा ढूढ़ने के लिये गाँव-गाँव, नगर-नगर का भ्रमण किया है और अनदेखे अनजाने पुलों को पार किया है।
अपने समय समाज के साथ शहंशाह आलम जब कभी कोई प्रेम कविता लिखते हैं तो चकित कर देते हैं। अनूठा शिल्प और प्रेम का अद्भुत आख्यान। संग्रह की एक कविता ‘फरवरी की एक सुबह टहलने निकलीं सात अदद लड़कियाँ’ की कुछेक पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं-
मैं तुम सबको आज
परवीन शाकिर की नज्में सुनाऊँगी
और चाय पीते हुए
फरवरी की इस सुबह को
हम एक यादगार सुबह बनाएंगी
जिन्होंने परवीन शाकिर को पढ़ा है, उन्हें इसका रसास्वादन करने में आनंद आ जायेगा। कहने की जरूरत नहीं कि शहंशाह आलम की कविताएँ बहुत अनकही भी कहती है। उनकी कविता के पेट में एक और कविता रहती है। ‘हमारे लोकतंत्र में’ आकार में एक छोटी कविता है परन्तु आप स्वयं देखिए कि अपने समय की व्यथा-कथा को, किस साफगोई से हमारे सामने लाती है-
हमारे लोकतंत्र में वे
दसों दिशाओं से आए
इस सभ्य सभ्यता में
मारे गए लोगों की
विधवाओं का विलाप सुनने
जबकि समाप्त हुआ
लोकतंत्र का उत्सव
इस लोक से कब का
लोक का कवि ही लोक की पीड़ा समझ सकता है और कविता में अपने समय की पटकथा लिख सकता है।

काव्य पुस्तक-इस समय की पटकथा
कवि- शहंशाह आलम
प्रकाशक- शब्दा प्रकाशन, पटना
कीमत- 150/- रू॰
प्रथम संस्करण- 2015

10 comments

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    _डॉ जियाउर रहमान जाफरी

  5. एक निष्पक्ष समीक्षा के लिए भाई राजकिशोर राजन जी को बधाई !
    कवि मित्र शहंशाह आलम को बहुत बहुत बधाई !!
    उनकी लेखनी अनवरत चलती रहे धरती को खुशनुमा बनाने के लिए !!!

  6. शानदार समीक्षा हार्दिक बधाई कृतियाँ भेजिएगा जी

  7. ‘इस समय की पटकथा’ पुस्तक में संकलित सभी कवितायेँ एक से बढ़कर एक हैं, कवि शहंशाह आलम को बहुत बहुत बधाई तथा इस खूबसूरत समीक्षा हेतु समीक्षक श्री राजकिशोर राजन जी का हार्दिक आभार.

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