जंतर तो है पर मंतर अब काम नहीं करता

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव

दिल्ली होने का मतलब क्या है? सत्ता का केंद्र? ताक़त और पॉवर का गलियारा या इसी सत्ता के लिए बार-बार रक्तरंजित होने वाली एक बेबस-लाचार नगरी? या फिर बार-बार उजड़ कर बस जाने के हौसले का नाम है दिल्ली? अगर ये हौसले का नाम है तो फिर लोग ये क्यों कहते हैं कि दिल्ली का लड् डू जो खाए वो भी पछताए, जो ना खाए वो भी पछताए? दिल्ली का ये लड् डू क्या दिल्ली के रग-रग में बहता सत्ता का नशा ही है? क्या इसीलिए ये भी कहा जाता है कि दिल्ली अभी दूर है क्योंकि सत्ता और पॉवर तो आसानी से नहीं मिलती।

या फिर दिल्ली इंसानों का एक ऐसा जंगल है, जहां सर्वाइवल ऑफ दि फिटेस्ट का सिद्धान्त लागू होता है? यहां कुछ लोग जंगल के राजा की तरह हैं तो ज्यादातर लोगों को दो वक्त की रोटी के लिए बेरोजगारी से लड़ना पड़ता है, पीने के पानी के लिए जद्दोजहद करना पड़ता है। घात लगाकर बैठे डेंगू-मलेरिया के मच्छरों से खुद को बचाना पड़ता है। आम आदमी की ज़िन्दगी ठीक वैसी है, जैसी किसी विशाल जंगल में मेमने की होती है। हर कदम पर मौत। सड़क हादसे से बच गए तो मिलावट मार सकती है। मिलावट से बच गए तो गलत इलाज मार सकती है। इलाज सही मिल गया तो अस्पताल का भारी भरकम बिल मार सकता है। और तो और एक छोटे से मच्छर से भी उसे बच कर संभल कर रहना है।

इतने खतरों वाले दिल्ली को लोग फिर दिलवालों की दिल्ली क्यों कहते हैं? सच पूछिए तो मुझे दिल्ली एक रहस्य लगती है। जिसे समझना-परखना बड़ी मुश्किल है। ये दिल्ली आज तक किसी की नहीं हुई। इसलिए हर काल में इस सवाल का उठना वाजिब है कि आखिर दिल्ली है क्या? आखिर दिल्ली होने का मतलब क्या है? जटिल सवाल है और इसका उत्तर आसान नहीं है लेकिन अगर आप एक बार जंतर मंतर घूम आएं तो इसका एक आसान सा जवाब आपको मिल जाएगा। दिल्ली एक उम्मीद है। देश की सवा अरब आबादी की उम्मीदों का शहर है दिल्ली। इंसाफ की आस में देश के अलग अलग इलाकों से आकर यहां धरने पर बैठे लोगों की आंखों में ये जवाब दिखता है। उनकी आंखों में ये उम्मीद झलकती है।

जंतर-मंतर से महज एक किलोमीटर की दूरी पर है देश की संसद। इसलिए इंसाफ़ की आस में यहां आए लोगों की आंखों में उम्मीद कुछ ज्यादा ही चमकती है। उनके मन में ये विश्वास होता है कि जब वो संसद के इतने करीब पहुंच गए हैं तो उनकी आवाज़ भी जरूर एक दिन वहां पहुंच जाएगी। इसलिए वो हिम्मत नहीं हारते। डटे रहते हैं। कुछ लोग तो कई सालों से यहां जमे हुए हैं, डटे हुए हैं। ना दिल्ली की भारी गर्मी उनके इरादे को पिघला पाती है ना जमा देने वाली ठंड उनके हौसले को पस्त कर पाती है। ये हौसला शायद दिल्ली के जीन में ही है। शायद इसलिए तो बार-बार उजड़ने के बाद भी दिल्ली बार-बार बसती रही, आबाद और गुलजार होती रही।

अतीत के पन्नों पलटें तो हम पाएंगे के जयपुर के महाराजा जय सिंह द्वितीय ने सन् 1724 में इस जंतर मंतर का निर्माण कराया था। दिल्ली के अलावा उन्होंने जयपुर, उज्जैन, वाराणसी, मथुरा में भी जंतर मंतर बनवाए थे। खैर हम सिर्फ दिल्ली की बात करेंगे। मकसद था बड़े यंत्र यानि जंतर के साथ सटीक मंत्र यानि मंतर यानि फॉर्मूले के साथ समय को सही सही नापा जा सके लेकिन अब जंतर मंतर के आसपास बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएं सूरज का रास्ता रोक कर खड़ी हो गई हैं, इसलिए जंतर-मंतर का जंतर और मंतर अब हर वक्त को सही-सही नहीं पकड़ पाता। मानो वक्त की नब्ज उसकी पकड़ के बाहर निकल गई हो। जंतर उसी तरह मौजूद है लेकिन अब मंतर काम नहीं करता। इसलिए जंतर-मंतर ये जरूर सोचता होगा कि दिल्ली साज़िशों की शहर है। उसके आस-पास बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं के रूप में खड़ी साज़िशों ने उसके मंतर को नाकाम कर दिया।

दिल्ली होने का मतलब क्या है? सत्ता का केंद्र? ताक़त और पॉवर का गलियारा या इसी सत्ता के लिए बार-बार रक्तरंजित होने वाली एक बेबस-लाचार नगरी? या फिर बार-बार उजड़ कर बस जाने के हौसले का नाम है दिल्ली? अगर ये हौसले का नाम है तो फिर लोग ये क्यों कहते हैं कि दिल्ली का लड्डू जो खाए वो भी पछताए, जो ना खाए वो भी पछताए? दिल्ली का ये लड्डू क्या दिल्ली के रग-रग में बहता सत्ता का नशा ही है? क्या इसीलिए ये भी कहा जाता है कि दिल्ली अभी दूर है क्योंकि सत्ता और पॉवर तो आसानी से नहीं मिलती।

या फिर दिल्ली इंसानों का एक ऐसा जंगल है, जहां सर्वाइवल ऑफ दि फिटेस्ट का सिद्धान्त लागू होता है? यहां कुछ लोग जंगल के राजा की तरह हैं तो ज्यादातर लोगों को दो वक्त की रोटी के लिए बेरोजगारी से लड़ना पड़ता है, पीने के पानी के लिए जद्दोजहद करना पड़ता है। घात लगाकर बैठे डेंगू-मलेरिया के मच्छरों से खुद को बचाना पड़ता है। आम आदमी की ज़िन्दगी ठीक वैसी है, जैसी किसी विशाल जंगल में मेमने की होती है। हर कदम पर मौत। सड़क हादसे से बच गए तो मिलावट मार सकती है। मिलावट से बच गए तो गलत इलाज मार सकती है। इलाज सही मिल गया तो अस्पताल का भारी भरकम बिल मार सकता है। और तो और एक छोटे से मच्छर से भी उसे बच कर संभल कर रहना है।

इतने खतरों वाले दिल्ली को लोग फिर दिलवालों की दिल्ली क्यों कहते हैं? सच पूछिए तो मुझे दिल्ली एक रहस्य लगती है। जिसे समझना-परखना बड़ी मुश्किल है। ये दिल्ली आज तक किसी की नहीं हुई। इसलिए हर काल में इस सवाल का उठना वाजिब है कि आखिर दिल्ली है क्या? आखिर दिल्ली होने का मतलब क्या है? जटिल सवाल है और इसका उत्तर आसान नहीं है लेकिन अगर आप एक बार जंतर मंतर घूम आएं तो इसका एक आसान सा जवाब आपको मिल जाएगा। दिल्ली एक उम्मीद है। देश की सवा अरब आबादी की उम्मीदों का शहर है दिल्ली। इंसाफ की आस में देश के अलग अलग इलाकों से आकर यहां धरने पर बैठे लोगों की आंखों में ये जवाब दिखता है। उनकी आंखों में ये उम्मीद झलकती है।

जंतर-मंतर से महज एक किलोमीटर की दूरी पर है देश की संसद। इसलिए इंसाफ़ की आस में यहां आए लोगों की आंखों में उम्मीद कुछ ज्यादा ही चमकती है। उनके मन में ये विश्वास होता है कि जब वो संसद के इतने करीब पहुंच गए हैं तो उनकी आवाज़ भी जरूर एक दिन वहां पहुंच जाएगी। इसलिए वो हिम्मत नहीं हारते। डटे रहते हैं। कुछ लोग तो कई सालों से यहां जमे हुए हैं, डटे हुए हैं। ना दिल्ली की भारी गर्मी उनके इरादे को पिघला पाती है ना जमा देने वाली ठंड उनके हौसले को पस्त कर पाती है। ये हौसला शायद दिल्ली के जीन में ही है। शायद इसलिए तो बार-बार उजड़ने के बाद भी दिल्ली बार-बार बसती रही, आबाद और गुलजार होती रही।

अतीत के पन्नों पलटें तो हम पाएंगे के जयपुर के महाराजा जय सिंह द्वितीय ने सन् 1724 में इस जंतर मंतर का निर्माण कराया था। दिल्ली के अलावा उन्होंने जयपुर, उज्जैन, वाराणसी, मथुरा में भी जंतर मंतर बनवाए थे। खैर हम सिर्फ दिल्ली की बात करेंगे। मकसद था बड़े यंत्र यानि जंतर के साथ सटीक मंत्र यानि मंतर यानि फॉर्मूले के साथ समय को सही सही नापा जा सके लेकिन अब जंतर मंतर के आसपास बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएं सूरज का रास्ता रोक कर खड़ी हो गई हैं, इसलिए जंतर-मंतर का जंतर और मंतर अब हर वक्त को सही-सही नहीं पकड़ पाता। मानो वक्त की नब्ज उसकी पकड़ के बाहर निकल गई हो। जंतर उसी तरह मौजूद है लेकिन अब मंतर काम नहीं करता। इसलिए जंतर-मंतर ये जरूर सोचता होगा कि दिल्ली साज़िशों की शहर है। उसके आस-पास बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं के रूप में खड़ी साज़िशों ने उसके मंतर को नाकाम कर दिया।

IMG_20150918_145702472

अब इसे विडंबना ही समझिए कि जो जंतर-मंतर आधुनिकीकरण की दौड़ में नाइंसाफ़ी का शिकार हो गया, वही जंतर-मंतर इंसाफ़ की लड़ाई का केंद्र बन गया है। जंतर मंतर रोड यानि प्रतिवादों का रोड। प्रतिरोध की सड़क। कहीं इंसाफ़ नहीं मिला तो जंतर-मंतर पहुंच जाओ। पूरे देश से प्रतिवादी यहां आकर धरने पर बैठ जाते हैं। बड़े राजनीतिक दल से लेकर छोटा से छोटा गरीब आदमी भी संसद के कानों तक अपनी आवाज़ पहुंचाने के लिए यहां धरने पर बैठ जाता है।

तिब्बत की मुक्ति के लिए तिब्बती भी यहां धरने पर बैठे हुए हैं तो आसाराम के भक्त भी अपने गुरु पर हुए कथित अत्याचार के लिए यहां बैठे हुए हैं। दिल्ली के किराएदार भी अपनी मांगों को लेकर यहां जमे हुए हैं तो कोई बलात्कारी को सज़ा दिलाने की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन पर बैठा हुआ है। लेकिन जरूरी नहीं कि जो चीज़ पास हो, उस तक हमारी आवाज़ भी आसानी से पहुंच जाय। इसलिए सबकी आवाज़ नहीं पहुंचती। कई लोग बरसों से धरने पर बैठे हुए हैं। जंतर मंतर उनका ठिकाना ही बन गया है। यहीं रहना, यहीं सोना। पास के गुरुद्वारा का लंगर ज्यादातार प्रतिवादियों की भूख मिटाता है।

हौसला इन प्रतिवादियों का जंतर यानि यंत्र है तो आंदोलन इनका मंतर यानि फॉर्मूला। जंतर इनके पास है लेकिन आंदोलन का मंतर सबके लिए काम नहीं करता है। भीड़ का आंदोलन हो तो सरकार और मीडिया तक बात पहुंच भी जाती है लेकिन कमजोर की आवाज़ तो यहां भी कोई नहीं सुनता। बस आप उसके हौसले को दाद भर दे सकते हैं।

इन तमाम नाउम्मीदियों के अंधेरे के बीच सबसे अच्छी बात ये है कि पाबंदियों के इस दौर में दिल्ली के पास कम से कम अपना एक ऐसा कोना है, जहां प्रतिरोध पलता है। जहां विरोध को आवाज़ मिलती है। जिस दौर में आम आदमी की विरोधी आवाज़ को दबाने का षड्यंत्र लगातार रचा जा रहा हो वहां जंतर-मंतर पर विरोध के इस यंत्र के फलने-फूलने का मंत्र सचमुच रोमांचित करता है।

Save

Save

You may also like...

Leave a Reply