नंदना पंकज की पांच कविताएं

प्रेम का महीना
आकाश का निरभ्र नीलापन
मिट्टी की हरी-हरी सुगंध
माघ की गुलाबी धूप
फागुन की बौराई पुरवैया
ख़ुद में घोले हुए
ये रुमानी फरवरी
जब उतरती हैं तुम्हारी आँखो में
तुम्हारी आँखे भांग मिला
दूधिया गिलास हो जाती है…
बहकने लगती हैं अनुभुतियाँ
मन झुमता है जैसे
बसंती हवा में पगलाता
मंजरों से लदबद
जर्दालु के बगीचे
और कोयल की मादक
कूक बन जाती है
मेरे तुम्हारे समागम
से फुटी सिसकारियाँ…
प्रेम में रुमान जब
होता है चरम पर
तभी दस्तक दे देता है
ये निगोड़ा मार्च
बच्चों के एग्जाम्स
फाइनेंशियल इयर की एंडिग
सालभर का बजट
और रोमांस का बंटाधार…
साल का सबसे ख़ूबसूरत
ये प्रेम का महीना
बस अट्ठाइस का क्यों है…..
इमरोज़
फैसला कर लिया मैंने
मैं चली आऊँगी
तुम्हारे पास…
तुम्हारे लिए…
एक बार फिर से
सारी रस्में तोड़कर
तुम्हारे साथ
कुफ्र भरी बातें करने
चली आऊँगी,
समाज की परवाह
न तब की थी,
न अब करूँगी…
इस बार जो आई
अपने नाम से
‘प्रीतम’ हटाकर,
‘साहिर’ की दीवानगी
जेहन से मिटाकर,
सिर्फ और सिर्फ
तुम्हारे लिए ही आऊँगी…
और तुम्हारी पीठ पर
मेरी ऊँगलियाँ
अब जब भी फिरेगी
बस तुम्हारा ही नाम
लिखती चलेगी…
मैं चली आऊँगी…
बस इक बार
मेरी हथेलियों को थाम
मेरी आँखों से
आँखें मिलाकर
इतना भरोसा जता दो
कि मेरे ‘इमरोज़’
तुम ही हो…
           – तुम्हारी अमृता
       ‘रसीदी टिकट ‘ पढ़ते हुए मन में बस यूँ ही एक ख़याल आया…
आज तुम्हें सोचते हुए…
टूथपेस्ट से चेहरा धोया,
बदन शैम्पू मल के नहा ली,
बिन मैंचिग के कपड़े पहने,
बे-जोड़ी की चप्पलें डाली,
आज तुम्हें सोचते हुए…
आइने में ख़ुद को ख़ूब निहारा,
चेहरा फिर भी देख न पाई,
जैसे तुम ही मुझे देख रहे हो
सोच-सोच के मैं शर्माई,
आज तुम्हें सोचते हुए…
दूध में छौंका, चाय में हल्दी,
दाल में चायपत्ती डाली,
स्वाद का भी कुछ पता न चला
बेनमक, अधपकी सब्जी खा ली,
आज तुम्हें सोचते हुए…
एक शब्द भी पढ़ न पाई,
किताबों को बस पलटती रही,
हर पन्ने पे जैसे हो नाम तुम्हारा
यूँ  मन ही मन रटती रही,
आज तुम्हें सोचते हुए…
बिन मिले मुलाक़ातें कर ली,
जाने कितनी बातें कर ली,
तेरे ख़यालों में दिन बिताये,
तेरी याद से रातें भर ली,
आज तुम्हें सोचते हुए…
तुम्हारी कल्पनाओं से लिपट के,
ख़ूब रोई मैं जी भर के,
खिलखिला के हँसी भी ख़ूब
सारे अहसास तुमसे कह के,
आज तुम्हें सोचते हुए…
अब न सोचूँगी, ये सोचा,
न सोचने की कोशिश में ज्यादा सोचा,
सोचते-सोचते तुमको मैंने
साथ-साथ ख़ुद को भी सोचा,
आज तुम्हें सोचते हुए…
सोच पे किसका बस चलता है
तो मेरा भी कुछ नहीं चला,
मैं क्यों सोचती रहतीं हूँ तुम्हें
आज कुछ-कुछ पता चला
आज तुम्हें सोचते हुए…..
तुम्हारा साथ
माना ज़िंदगी नहीं हो तुम मेरी
न ही मेरी ज़िंदगी में
तुम्हारी कोई अनिवार्यता है
हवा, पानी या धूप जितनी
जी सकती हूँ तुम्हारे बगैर भी
फिर भी
मैं चाहती हूँ
तुम्हारा साथ…
जैसे अलसायी सी सुबह
नयी स्फूर्ति जगाती
तनावग्रस्त बोझिल शामों की
थकान मिटाती
ब्लैक टी
मैं पीना चाहती हूँ तुम्हें
ता-उम्र, सुबह-शाम
घूँट-घूँट, चुस्कियों में
कि उठा सकुँ कुछ
लुत्फ़ ज़िंदगी के…
उँघती, उनींदी सी दुपहरी में
अपने बिस्तर पे अधलेटे
मैं पढ़ना चाहती हूँ तुम्हें
किसी किताब की तरह
एक पन्ना रोज़
उसके हरेक हर्फ़ को
महसुसते हुए
देर रात अपने सिरहाने रख
मैं सो जाना चाहती हूँ
कुछ सुंदर सपनों की
ख़्वाहिशें लिये……
  ज्वार-भाटा
चढ़ती हुई चाँदनी के साथ
चिर-विरह को अभिशप्त
समुद्र के हृदय की
तरल वेदनायें
उबलने लगतीं है,
चाँद का गुरुत्व
बढ़ा देती है
मिलन की आतुरता
और किसी
विक्षिप्त प्रेमी की भाँति
व्यग्र हो छटपटातीं हैं लहरें,
दहकते लपटों सी उछलतीं हैं
टीस भरी लालसायें
प्रेयसी के चेहरे को चूमने,
उसे अपने आलिंगन में
डुबो लेने की चाह लिये
कल्पनाओं का ऊँचा आलाप भरके
सामर्थ्य की पराकाष्ठा तक
ऊपर ऊठती हिलोरें
यथार्थ के तलछट पे
पटका खा गिरतीं हैं,
निरंतर इसी क्रम में
चल रहे अनंत संघर्ष से
यूं तो अनभिज्ञ नहीं है चाँद,
साथ ही ज्ञात है उसे
अपने परिमंडल से भटकने का
परिणाम भी,
लीक से हटना
प्रलय का निमित्त हो सकता है ,
इसी भय से विवश
भावनाओं पे निष्ठुर नियंत्रण
कर रखा होगा शायद,
किंतु शांत और निर्लिप्त
लगने वाले चाँद को
जब समुद्र की लवणयुक्त नयनों में
अपना भीगा थरथराता सा
प्रतिबिंब दिखता होगा
कुछ ज्वार तो उसके
अंतस में भी
अवश्य ही उठता होगा

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