परितोष कुमार पीयूष की दो कविताएं

एक

मेरे सपनों की
महफिल में
हर शाम तुम आती हो०

बड़े ध्यान से
मेरी कविताएं सुनती हो
आँखें चुराकर
मुस्कुराती हो
उँगलियाँ बार-बार
बालों पर यूँही फेरती हो०

मेरे सपनों की
महफिल में
हर शाम तुम आती हो०

एक नयी कविता
साथ लाती हो
पलकें झुकाकर
मुखर आवाज में
नयी शैली में
अपनी कविताएँ
सुनाती हो०

अब मैं
तुम्हारी कविताओं में
जीता हूँ
तुम्हारी पंक्तियाँ
गुनगुनाता हूँ
तुम्हें सुनने ही
महफिल में आता हूँ०

मेरे सपनों की
महफिल में
हर शाम तुम आती हो०

बातें बस आँखों में
हो पाती है
जिसमें निःशब्द हम
सबकुछ कह जाते हैं
हमारे मूक प्रेम की
सारी अनुभूतियाँ
सारे एहसास
सारे स्पर्श
आँखों ही आँखों
हो जाते हैं०

मेरे सपनों की
महफिल में
हर शाम तुम आती हो०

ना तुम कुछ कह पाती हो
ना मैं कुछ कह पाता हूं
मन ही मन
कुछ बुदबुदाती हो
बालों पर
उँगलियाँ फेरती
पलकें झुकाये
फिर चली जाती हो०

मेरे सपनों की
महफिल में
हर शाम तुम आती हो०

दो

हरियाली के बीच
तुम्हारी थोड़ी सी
मुस्कुराहट
थोड़ा सा प्रेम
नीला आसमान
और लौटते पंछी

आज फिर लिखी गयी
एक कविता!

-परितोष कुमार ‘पीयूष’
(जमालपुर)

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