स्मिता सिन्हा की सात कविताएं

मेरा प्रेम और आगे बढ़ने की इजाज़त नहीं देता

चलो अब लौटते हैं हम
अपने अपने सन्दर्भों में
तथाकथित दायरे से बाहर
ना तुम “तुम “रह सकते हो
ना मैं “मैं ”
कि तंग संकरी गलियों सा
प्यार हमारा
घोंटता है हमारा वजूद
ढीला करो ये आलिंगन
कि निकल सकूं मैं
मुक्त हो सकूं
तुम्हारे नेह से

उलाहना मत देना
कि जितना भी पाया मुझे
तुमने भरपूर पाया है
सुनो वो अनुगूंज
मुझे पुकार रही है शायद
कि अब लौटना होगा मुझे
मेरा प्रेम और आगे बढ़ने की
इजाज़त नहीं देता

मैं लिखूंगी प्रेम

मैं लिखूंगी प्रेम
उस दिन
जिस दिन
सूखने लगेंगे
पेड़ों के हरे पत्ते
ख़त्म होने लगेंगे जंगल
और
दरकने लगेंगे पहाड़
मैं लिखूंगी प्रेम
उस दिन
जिस दिन
नदी करेगी इंकार
समुन्दर में मिलने से
सारस भूलने लगेंगे
पंखों का फड़फड़ाना
और
बंजर होने लगेगी धरती
मैं लिखूंगी प्रेम
उस दिन
जिस दिन
असहमतियों की ज़मीन पर
उगेंगे नागफ़नी के पौधे
मरने लगेंगी सम्भावनाएं
जीवन की
और
घुटने लगेगी हमारी हंसी
किसी कोहरे की धुंध में
हाँ, मैं लिखूंगी प्रेम
उस दिन भी
जिस दिन
तुम नकारोगे मुझे
मेरे प्रेम को
और उस दिन
छोड़ जाऊँगी तुम्हें
अपने प्रेम के साथ
ताकि तुम समझ सको
प्रेम में होने का अर्थ

आदत

आकाश के आमंत्रण पर
अब भी घिर आते हैं
काले काले बादल
और बरसती हैं बूंदे
उन नन्ही बूंदों को
अपनी पलकों पर सहेजे
मैं अक्सर आ बैठता हूँ
उसी सूनी मुंडेर पर
जहां जाने कितने आकाश
उतर आते थे उन दिनों
हमारी आँखों में
तुम्हें याद है
उस दिन
एक उड़ते कबूतर के
पंख टूटने पर
कितनी आहत हुई थी तुम
रोती रही बेहिसाब
और मैं सोखता रहा
तुम्हारे उन आँसूओं को
अपनी हथेलियों में
ये हथेलियां अब भी नम हैं
सोंधी सी महक है इसमें तुम्हारी
मैं अब अक्सर अपने चेहरे को
इन हथेलियों में छुपा लेता हूँ
इन हथेलियों को आदत थी
तुम्हारी उँगलियों की
कितने सलीके से उलझती थीं
ये तुम्हारी उँगलियों से
कभी नहीं छूटने के लिये
ये आदतें भी कमाल होती हैं न
हमें थी एक दूसरे की आदत
एक दूसरे के साथ हँसने की आदत
हँसते हँसते रो देने की आदत
हम कभी नहीं पूछते थे
एक दूसरे से यूँ रोने की वज़ह
शायद हमें शुरु से ही अंत का पता था
पता था कहाँ और किस मोड़ पर
रुकना है हमें
होना है अलग
फ़िर कभी नहीं मिलने के लिये
उन रास्तों पर अब कोई नहीं जाता
पर मैं अब भी निकल आता हूँ अक्सर
वहीं उन्हीं रास्तों पर
उसी मोड़ तक
अब अक्सर ही लिखता हूँ मैं
प्रेम कवितायें
लिखता हूँ एक अनजान शहर
कुछ अनजाने रास्ते
और बेतकल्लुफी में गुज़रते
दो अजनबी
कुछ अनजानी तारीखें
और इन तारीखों में सिमटी
तमाम जानी पहचानी यादें
मैं कभी नहीं लिखता
उदास वक़्त के उदास शब्द
उदास सा मुंडेर
उदास सी हंसी
उदास आँखें
मैं चाहता हूँ
कि मुझे आदत हो
खुश रहने की
मुझे आदत हो
खुद जीने की
मैं अब मुक्त होना चाहता हूँ
इस प्रारब्ध से
जहां सब कुछ होते हुए भी
अक्सर प्रेम ही चूक जाता है
मेरे जीवन में

विदा

सिगरेट के लम्बे गहरे कश के साथ
मैं हर रोज़ उतरता हूँ
अँधेरे की गंध में डूबे उस तहखाने में
जिसके प्रस्तरों पर
अब भी बिखरे से पड़े हैं
जाने कितने मखमली ख्वाब
जो कभी साझे थे हमारे
बंद आँखों को मैं
और कसकर बंद करता हूँ
ताकि बचा सकूं कुछ स्मृतियों को
बिखरने से पहले
सहेज सकूं उनके कुछ अवशेष !

वह झरोखा तो अब भी वहीं है
तो शायद अब भी होगा
वह एक टुकड़ा चाँद वहीं कहीं
उसी दरख्त के पीछे
पर नहीं
कुछ झरोखे गर्द सीलन से भरी हवा लाते हैं
जो घोंटतीं हैं सांसे
मैं चुपचाप चलता जाता हूँ
सन्नाटे में डूबे गलियारों में
तुम्हारे निशानियों को टटोलते हुए
कि दे सकूं तुम्हें
तुम्हारे पसंद के गुलमोहर के कुछ फूल
कि सुन्दर मौसम तो बस यादों में ही रह जाते हैं !

सिगरेट के हर कश के साथ
मैं भटकता हूँ
खूब भटकता हूँ
खुद को खो देने की हद तक
और फ़िर सोचता हूँ
क्या ये मुनासिब नहीं होता कि
एक झूठी सी गफलत ही सही
बाकी रहती हम में कहीं
कि ये जो कुछ कच्चा पक्का सा है
हमारे रिश्ते में
अब भी कायम है और यूँ ही रहेगी सदा
तुम्हें पता है
सिगरेट के हर कश के साथ
मैं उलझता हूँ
अटकता हूँ हर बार
वहीं उसी लम्हे में
कि आखिर क्यों कहा तुमने मुझसे
हमारे बीच का वो आखिरी शब्द ‘विदा ‘॥

प्रेम कहना ज़रूरी तो नहीं
मैने सोचना चाहती हूँ तुम्हें
अपनी नींद में
ख्वाबों की तरह
बादलों में बँधी
बूँदों की तरह
दूर क्षितिज में उगते
उस सूरज की तरह
चाहती हूँ एक शाम
संगम के किनारे
किसी शिला पर बैठे
महसूस कर सकूं
तुम्हारे हाथों का ताप
और पाँव को स्पर्श करती रहें
लहरों की ठंडक
तुम बुनते रहो मुझे
अपने शब्दों में
और
बंद आँखों से गुनगुनाती रहूँ
मैं तुम्हें
इतना ही तो पर्याप्त होगा ना प्रिय
प्रेम कहना ज़रूरी तो नहीं………

तुम्हारा होना ज़रूरी है
तुमने कहा
लिखो प्रेम कविताएँ
और चले गये
सुदूर उन पहाड़ की तराईयों में
थमा कर कुछ
अस्फुटित से शब्द
स्पंदित सी धड़कन
और मैं खड़ी हूँ अब भी वहीँ
ताकती हूँ तुम्हें
निष्प्राण निस्पंद सी
जैसे बादलों में बँधी
पानी की एक बूँद
जम चुकी है
बरसने से पहले
सोचा था सहेजुंगी
उन सारे एहसासों को
करूंगी स्पर्श का अनुवाद
अनुभूतियां रचेंगी शब्दों में
और बनेंगी कुछ
प्रेम कविताएँ
तुम्हारे स्मृतिचिन्ह भी तो
अब प्रमाणिक नहीं रहे
अरूप अनाम अज्ञात प्रिय
रुक रुक कर हो रही ये
ओलावृष्टि भी तुम्हारी
अर्द्धचाप दे जाती है
किंतु मुझमें होकर भी
तुम कहाँ हो
तुम जानते थे ना
कि तुम्हारा होना ज़रूरी है
कि मैं अकेले नहीं रच सकती
प्रेम कविताएँ
बचा रहे प्रेम
हाँ मैंने ही छोड़ा था
वो एक सिरा प्रेम का
तुम तो तब भी तटस्थ थे
पकड़े दूसरे सिरे को मज़बूती से
उन दिनों
शायद मैं ही उलझ उलझ कर रह जाती थी
विवर्तों के जाल में
या फ़िर
हमारे बीच की चुप्पी ने ही
साध लिया था कुछ लम्बा मौन
उन दिनों
जब मैं कर रही होती थी आंकलन
हमारे बीच कहे गये कुछ शब्दों का
जब मैं चाहती थी
तुमसे अपने कुछ सवालों के
सीधे सटीक जवाब
ठीक उसी वक़्त
तुम सहेज रहे होते थे
चाय की प्याली के साथ
ढलती हमारी हर एक शाम
बादलों सी बेफिक्र
कतरा कतरा
हमारी हर एक हँसी
उन्हीं पुराने रास्तों पर
रोज़ साथ चले
हमारे हर एक क़दम

उन दिनों
हमारा प्रेम साझा होकर भी
अलग अलग अर्थों में संदर्भित था
पता नहीं क्यों ?
किंतु इन बीते वर्षों में भी
कुछ तो शेष रह गया था
कि आज मैं लौटी हूँ
वापस तुम्हारे पास
लो एक बार फ़िर
मैं पकड़ती हूँ
वही छूटा हुआ सिरा
इस विश्वास के साथ
कि बस यूँ ही बचा रहे प्रेम
हमारे बीच………….

You may also like...

Leave a Reply