नरेंद्र सैनी की कहानी ‘मासूम माशूक’

 

“ऋषि तुमसे कितनी बार कहा है, ऐसा मजाक नहीं करते. तुम मुझ से कितने छोटे हो और फिर भी ऐसी बातें, गंदी बात है.”

“तुम मुझे गलत समझती हो पूनम दीदी…”

“क्या बकवास है? तुम समझते क्यों नहीं हो? एक तरफ मुझे दीदी कहते हो और दूसरी तरफ ऐसी बकवास?”

“मैं क्या राजू, दिनेश, मुकेश और सभी तो तुम्हें दीदी कहते हैं?”

“शायद तुम्हारी बहन नहीं है तो तुम क्या जाने रिश्तों के मायने…चलो भागो यहां से बदतमीज…”

“मैं नहीं जाऊंगा.”

“जाते हो या कहूं तुम्हारी मम्मी से.”

मम्मी का नाम सुनते ही ऋषि डर गया और एकदम चुप हो गया. पूनम उसे झिड़कते हुए हुए जैसे ही उठने लगी तो ऋषि बोला, “मैं तुमसे कान में कुछ कहना चाहता हूं. प्लीज मेरी बात सुन लो.”

ऋषि के इस तरह मान-मनौवल करने पर पूनम पसीज गई और परेशान होकर बोली, “कहो.”

ऋषि धीमे से पूनम के कान की ओर गया और उसके गाल को चूमकर भाग गया. पूनम का दिमाग घूम गया. लेकिन फिर से 10 साल के ऋषि की इस बचकानी हरकत पर हंसी आ गई. वह इसे उसकी नादानी समझ घर की और चल दी.

*****

यह एक दिन की बात नहीं थी. रोज का किस्सा था. ऋषि अकसर पूनम को अपनी दुल्हन बनाने की बात कहता और उसकी बात सुन कभी पूनम खीज जाती तो कभी हंसकर टाल देती.वह इस सब से तंग आ चुकी थी. अकसर ऋषि इसी तरह की उलटी सीधी बातें करता.

यह किस्सा उस दिन से शुरू हुआ जब ऋषि की चहेती मिट्टी की गुड़िया टूट गई थी. उस समय ऋषि की उम्र यही 7 साल रही होगी. वह खाते-पीते, सोते-जागते हर पहर उस गुड़िया को अपने पास रखता था. मम्मी-पापा उसे कहते की यह तुम्हारी दुलहनिया है जो हरदम इसे अपने साथ रखते हो. यही नहीं, मोहल्ले के कई बड़े लोग भी इसे लेकर ठिठोली करते. लेकिन एक दिन वह गुड़िया उसके हाथ से छूटी और चकनाचूर हो गई. उसने आसमान सिर पर उठा लिया.

अक्सर जैसा मध्यवर्गीय मोहल्लों में होता है, वैसा ही हुआ. पूरा मोहल्ला वहीं इकट्ठा हो गया. सभी पूछने लगे कि क्या हुआ है? तो माजरा सामने गुडिया का आया. कुछ लोग मुस्करा के चले गए तो कुछ ने कई तरह के प्रलोभन ऋषि कोदेने की कोशिश की. लेकिन उसने तो हंगामा काट दिया था और वह किसी की बात सुनने को तैयार ही नहीं था. उसका गला बैठ गया था, और वह लगातार रोये जा रहा था. जमीन पर लेटा हाथ-पैर मार रहा था, और जिद यही कि मुझे ऐसी ही गुड़िया चाहिए.

ऋषि के इस तमाशे को देखने के लिए बच्चों की भीड़ भी वहां जुट चुकी थी. तभी ऋषि की मम्मी की नजर सामने खड़ी पूनम पर गई तो उन्होंने प्यार से उसे बुलाया. 15 साल की पूनम चुपचाप से उनकी और चली आई. उसने मिडी पहन रखी थी और बाल खुले थेऔर घुंघराले थे. आंखों में चमक थी और चेहरा चाँद जैसा था. मां ने बड़े ही प्यार से कहा, “देखो, पूनम भी तो गुड़िया जैसी है. सुनो लल्ला, तुम इसे ही अपनी गुड़िया मान लो…जब बड़े होगे तो इसे तुम्हारी दुलहनिया बना देंगे.”

ऋषि की मम्मी ने पूनम की और देखते हुए कहा, “क्यों बिटिया बनोगी न लल्ला की दुलहनिया.” और इशारा कर दिया कि हां में जवाब दे.

पूनम ने हां में सिर हिलाया और बड़े प्यार से ऋषि के गाल को चूमा और बोली, “चुप हो जाओ ऋषि रोते नहीं…”

ऋषि को न जाने क्या हुआ और वह एकदम से चुप हो गया. और वह कुछ समय तक यूं ही पूनम का हाथ पकड़कर बैठा रहा. न जाने वह क्या बात थी,जिसने ऋषि को एकदम खामोश कर दिया था. वह बस पूनम का चेहरा देखता रहा.

बस इस दिन के बाद से वह चौबीसों घंटे पूनम के चक्कर काटता और उसे अपनी दुलहन बनाने की बात कहता.गाहे-बगाहे पूनम के पास पहुंच जाता और घंटों उसे देखता रहता. उसे अपने साथ खेलने के लिए कहता, वह मना करती तो जिद करता.

कभी बातें करने की कोशिश करता तो कभी हाथ पकड़कर बैठ जाता. पूनम के एग्जाम चल रहे होते तो वह उसे टरकाने की कोशिश करती. लेकिन हर दिन के साथ ऋषि का पूनम को लेकर जुनून बढ़ता ही जा रहा था. पूरा मोहल्ला अब उसकी फिरकी लेने लगा था.

*****

दिन बीतते गए. ऋषि के पूनम मोह में रत्ती भर भी कमी नहीं आई, बल्कि दिन दोगुनी और रात चौगुनी रफ्तार से बढ़ने लगा था. काफी समय गुजर गया था और ऋषि अपने जीवन के सत्रह साल देख चुका था. लगभग छह फुट, गेहुंआ रंग. कसरती बदन वाला ऋषि हैंडसम युवक बन चुका था. ऐसा युवक जिस पर कई लड़कियां जान छिड़कती थीं. लेकिन उसकी रग-रग में सिर्फ पूनम ही बसती थी.

उधर, 26 साल की पूनम भी गजब की थी, और उसकी सुंदरता में हर दिन के साथ इजाफा ही हुआ था. अक्सर लंबे कुर्तों और चूड़ीदार या जीन्स में दिखती. अपना एमबीबीएस खत्म कर चुकी थी, और अब वह एक प्राइवेट अस्पताल में काम कर रही थी.

हालांकि ऋषि पहले से समझदार हो गया था. अब बात करने का उसका अंदाज भी काफी बदल गया था. उसकी बात में संजीदगी आ गई थी. अक्सर जब पूनम छत पर बैठी पढ़ रही होती तो ऋषि तब तक अपनी छत पर बैठा रहता, और उसी को निहारता रहता. पूनम आज भी उसे वही छोटा ऋषि मानती थी. वह शरीर से जितना बलिष्ट लगता हृदय से उतन ही सुकुमार था. हर बात दिल से सोचना, और मोहल्ले में उसे किसी ने ऊंची आवाज तो छोड़े दो नजरें उठाकर चलते हुए भी नहीं देखा था. मोहल्ले के गेट पर खड़े लड़कों के साथ वह कभी नजर नहीं आता. अक्सर अपनी किताबों या पूनम के साथ अपनी दुनिया में घूमता रहता.

वह अकसर पूनम से मिलने के मौके तलाशता. वही बात उसकी जुबान रहती लेकिन उसकी बात कहने का अंदाज बदल गया था. वह अकसर उसके घर जाता और अकेले में मिलता तो कुछ नहीं कहता. लेकिन उसकी आंखों में इश्क की आग साफ नजर आती थी. वह पूनम से खूब बातें करता. पूनम भी उससे बात करती लेकिन वह जल्द से जल्द बात को खत्म करना चाहती क्योंकि वह जानती थी कि उसकी बात आखिर में उसी किस्से पर खत्म होगी. आखिर में वह यही कहता, “पूनम, आइ लव यू…प्लीज मेरा इंतजार करना…मेरी ही दुलहन बनना.”

सब कुछ ढर्रे पर चल रहा था, और ऋषि की बारहवीं हो चुकी थी और अब वे इंजीनियरिंग में दाखिला लेने जा रहा था. एक दिन उसे अपनी मां से पता चला कि पूनम की शादी की बात चल रही है. हालांकि पूनम अभी शादी नहीं करना चाहती है लेकिन कोई अच्छा लड़का मिल रहा है, जो दिल्ली में ही डॉक्टर था और उसका अपना क्लिनिक था.

ऋषि का पूरा वजूद ही हिल गया था. इसके बाद से उसे पूनम से बिढ़ जाने का डर सताने लगा.वह पूनम से अकेले मिलने के मौके तलाशने लगा. एक दिन अचानक घर की बेल बजी तो ऋषि ने दरवाजा खोलने गया तो उसके सामने पूनम थी. उसे समझ नहीं आया कि वह करे. वह उसे ही देखने लगा लेकिन पूनम ने उसको ख्यालों की दुनिया से बाहर लाने काम किया. वह बोली, “आंटी है क्या…उन्होंने मॉम से यह मेडिसिन मंगाई थी, वह उन्हें दे देना.”

ऋषि ने कहा, “मम्मी घर पर नहीं है.”

यह सुनकरपूनम वापस जाने लगी, लेकिन ऋषि बोला, “प्लीज रुक जाओ न. मैं तो हूं.”

“नहीं चलती हूं मैं. मुझे आंटी से काम था.”

“प्लीज रुक जाओ…”

ऋषि पूनम के इश्क में इस तरह डूबा हुआ था कि कभी वह किसी से तेज आवाज में बोला नहीं. हर किसी से बहुत तमीज से पेशा आता, और उसके नेचर में बहुत ही सॉफ्टेनेस आ चुकी थी.

पूनम ने जवाब दिया, “मैं रुकूंगी तो तुम्हारी पुरानी रट चालू हो जाएगा?”

बाहर धीमे-धीमे हो रही बूंदाबांदी अब तेज बारिश में तब्दील हो चुकी थी. ऋषि ने इस बारिश की दुहाई दी. न जाने क्या सोचकर पूनम रुक गई. वह जानती थी अगर इस तरह वह चली गई तो ऋषि को वाकई काफी बुरा लगेगा. बेशक, वह ऋषि से प्यार नहीं करती थी लेकिन वह उससे नफरत भी नहीं करती थी.

वह वहीं सोफे पर बैठ गई और बाहर खिड़की के कांच पर पड़ रही बारिश की बूंदों को देखने लगी. ऋषि ने उसी ओर देखा जहां उसकी आंखें देख रही थीं. ऋषि बोला, “देखो यह बूंदें किस तरह खिड़की के कांच पर गिर रही हैं. उस कांच के साथ सटकर नीचे तक जा रही हैं, और फिर उसके बाद हर बूंद अपना अस्तित्व खोकर एक धार में तब्दील हो जाती हैं. उसी तरह मैं तुम्हारे प्यार में डूबकर तुममें जज्ब हो जाना चाहता हूं. मैं चाहता हूं मेरी पहचान तुम्हारे साथ हो…” वह आकाश से बरसती तेज बूंदों की तरह बरसा जा रहा था, और उसके शब्द पूनम को सूखी धरती की तरह भिगोए जा रहे थे. शब्दों की तेज धारा में बहे जा रही थी. यह पहली बार था, जब पूनम खुद को कमजोर महसूस कर रही थी. कुछ तो ऐसा था तो जो उसे वहां से उठने नहीं दे रहा था.

ऋषि कुछ देर के लिए रुका और फिर बहुत धीमे से बोला, “क्या तुम्हारी शादी पक्की हो गई है…???”

पूनम खामोशी से अब भी खिड़की से बाहर देख रही थी. वह ऋषि की आंखों में नहीं देखना चाहती थी.

ऋषि के लिए उसकी खामोशी बर्दाश्त से बाहर हो रही थी. वह बोला, “पूनम भगवान के लिए बताओ क्या यह सच है?”

“हां, ऋषि शादी की बात चल रही है. बस, अब मुझे जाने दो.” पूनम उठकर जाने लगी तो ऋषि ने उसका हाथ पकड़ लिया. पूनम के शरीर में हजारों वोल्ट का करंट दौड़ गया. वह फिर सोफे पर धंस गई.

“नहीं पूनम ऐसा नहीं हो सकता. ऐसा कैसे हो सकता है. तुम ऐसा कैसे कर सकती हो. मैं तुमसे प्यार करता हूं. मैंने आजतक तुम्हारे अलावा कुछ नहीं चाहा. कुछ नहीं सोचा. बेशक मानता हूं वह बचपन का एक दिलासा था लेकिन मैं क्या करूं वह दिलासा मेरा सहारा बन गया. मैंने तुम्हारे अलावा किसी लड़की का ख्याल नहीं किया और न ही किसी के बारे में सोच सकता हूं. तुम ही मेरी शुरुआत और तुम ही मेरा अंत हो. प्लीज मेरी फीलिंग्स को समझो यार!!!”

“ऋषि मैं दस साल से यह बातें सुनती आ रही हूं. यह ठीक नहीं है…मैच्योर बनो यार. अब इस सब को खत्म करो…तुमने सही कहा वह एक दिलासा था.”

“पूनम यह तुम्हारे लिए दिलासा हो सकता है. मेरी जिंदगी है. मैं उम्र के इस अंतर को नहीं मानता. मैं सिर्फ एक बात जानता हूं वह है तुमसे इश्क…”

“तुम कुछ भी कह सकते हो लेकिन मैंने तुम्हे कभी इस नजर से नहीं देखा. मेरी भी कुछ जिंदगी है. तुम जबरदस्ती मेरी जिंदगी में दखल क्यों देना चाहते हो…मैं खामोश रहती हूं ताकि तुम्हारी भावनाओं को चोट न पहुंचे…लेकिन तुम नहीं समझते…मेरी पर्सनल लाइफ के बारे में तुम क्या जानते हो? कुछ नहीं…सिर्फ यही जानते हो कि मैं तुम्हारी गुड़ियां हूं…व्हाट इज दिस…”

“क्या तुम किसी और से इश्क करती हो?”

“दैट इज नन ऑफ योर बिजनेस…”

“बताओ न, प्लीज…”

“अगर हां हो तो????”

ऋषि को लगा जैसे उसका दम ही निकल जाएगा. दर्द उसके चेहरे पर नजर आ रहा था. ऋषि बोला, “मैं जानता हूं तुम मुझसे पीछा छुटाना चाहती हो. देखो,थोड़ा इंतजार कर लो…मेरी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी हो जाएगी. अच्छा करियर होगा…और आजकल एज गैप मायने नहीं रखता.”

बातों का सिलसिला खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था. लेकिन ऋषि भी हारने का नाम नहीं ले रहा था. जब पूनम नहीं मानी तो उसने आखिर में बात खत्म करते हुए कहा, “पूनम देखो मुझे सिर्फ पांच साल का समय दे दो. मैं तुम्हारे लायक बनकर दिखाऊंगा. लेकिन एक बात याद रखना…अगर तुम मेरी नहीं हो सकी तो मैं ऐसा करूंगा तुम तो क्या दुनिया का कोई शख्स उस बारे में नहीं सोच सकता.”

पूनम गहरी सोच में डूब गई थी. उसे ऋषि नॉर्मल होता नहीं नजर आ रहा था. उसने कुछ सोचा और बोली, “चलो अपनी पढ़ाई में मन लगाओ और करियर बनाओ. इस बीच मैं तुम्हारी बात पर सोचूंगी.”

ऋषि के चहरे पर मुस्कान दौड़ गई. वह बोला, “मुझे बहलाना मत…वर्ना जो मैंने कहा है वह धमकी नहीं है…सच है.”

“हां, बाबा याद है.” यह कहकर पूनम घर से निकल गई.

*****

इस बात को तीन साल गुजर गए. ऋषि की इंजीनियरिंग की पढ़ाई भी बढ़िया चल रही थी. पूनम की शादी अभी तक नहीं हुई थी, ऋषि खुश था. अब ऋषि पूनम से मिलने पर सिर्फ हाल-चाल पूछता और चलता बनता. अब वह अपनी रिपीट नहीं किया करता था. लेकिन कहते हैं न अच्छे दिन चुटकियां बजाते हवा हो जाते हैं, ऐसा ही कुछ ऋषि के साथ भी हुआ. एक दिन उस पर जैसे किसी ने वज्रपात किया हो. वह कॉलेज से घर लौटा तो पूनम की मां उनके घर कार्ड लेकर बैठी थी और मिठाई का डिब्बा भी था. ऋषि का सिर झन्ना गया. उसने आंटी को नमस्ते कही औऱ वहीं खड़ा हो गया. पूनम की मम्मी उससे मुखातिब होकर बोलीं, “सुनो भई, तुम्हारी गुड़िया की शादी पक्की हो गई है. पंद्रह दिन बाद शादी है. उसके छह महीने बाद तक मुहूर्त नहीं था, इसलिए सब झटपट हो गया.”

वह कुछ नहीं बोला और हल्की-सी दर्द भरी मुस्कान देकर छत की ओर सीढ़ियां चढ़ गया. उसकी आंखों से आंसू बहे जा रहे थे. वह तेज चिल्लाना चाहता था. वहीं वह छत की मुंडेर के साथ सटकर बैठ गया, और पागलों की तरह फूट-फूटकर रोने लगा. उसने मुंह पर हाथ रख रखा था ताकि उसी आवाज किसी को सुनाई दे. आंखों से आंसू बहे जा रहे थे. उधर, सामने सूरज अस्त हो रहा था, और पूरा आकाश संतरी रंग से नहाया हुआ था. पक्षियों के झुंड आकाश में उड़े जा रहे थे. अपने ठिकानों को लौटने के लिए. आंखों को अच्छे रखने वाली यह बातें ऋषि के दर्द को और गहरा रही थीं. अस्त होता सूरज उसे उसके कत्ल हुए इश्क के खून के कतरों की वजह से लाल नजर आ रहा था. उसे पक्षियों का शोर अपना मजाक उड़ाते हुए लग रहे थे. जबकि पास ही बिजली के तारों में फंसी बिजली का रुदन उसके दिल को चीरे जा रहा था. उसके आसपास सब कुछ हो रहा था, लेकिन वह बेखबर था…सिर्फ पूनम का चेहरा उसके दिमाग में कौंध रहा था. उसे लग रहा था, जैसे उसका दम निकल जाएगा. लगभग घंटे भर तक वह वहां बैठा रहा, लेकिन नीचे से मां की आवाज आई तो उसने खुद को संभाला और आंखें पोंछी और नीचे जाने लगा. अब सूरज की लालिमा उसकी दर्द भरी आंखों में समा चुकी थी. वह नीचे आया और सीधे अपने कमरे में चला गया.

इस बात को दिन हो चुके थे, और वह कॉलेज से लौट रहा था तो उसे रास्ते में पूनम मिली. उसने उसे मुस्कराते हुए हैलो कहा और बोला, “वादा तोड़ दिया न…मेरी बात भूल गईं…चलों कोई बात नहीं मुबारक हो…”

इससे पहले पूनम कुछ कह पाती, ऋषि आगे बढ़ चुका था. आज ऋषि ने पीछे मुड़कर नहीं देखा था.पूनम खुद से दूर जाते ऋषि को देखे ही जा रही थी. उसके दिल में एक डर बैठ गया था. न जाने यह क्या करेगा?

*****

उस दिन के बाद दोनों की मुलाकात नहीं हुई. शादी का दिन आया तो एक अच्छे पड़ोसी की तरह ऋषि ने पूनम के मम्मी-पापा की पूरी मदद की. सुबह जब पूनम की विदाई का समय आया तो बाकी लोगों के साथ ऋषि भी वहीं खड़ा था. ऋषि की आंखों में दर्द साफ झलक रहा था, लेकिन उसके चेहरे पर मुस्कान भी थी ताकि किसी को उसका दर्द समझ नहीं आ सके. पूनम ने उसकी ओर देखा तो वह मुस्करा दिया. विदा लेते समय पूनम का दिल जोरों से धड़क रहा था. उसे किसी तरह के अनिष्ट की आशंका खाए जा रही थी.

शादी के दूसरे दिन पूनम अपने घर फेरा डालने आई तो उसने घर आकर सबसे पहले ऋषि के बारे मे पूछा. उसकी मम्मी ने बताया कि वह तो कॉलेज गया है. उसकी जान में जान आई. फिर वह ससुराल लौट गई.

कुछ दिनों बात पता चला कि ऋषि के पिता ने वह मकान बेच दिया है, और वे पंजाब के अपने गांव वापस लौट गए हैं. ऋषि होटल में रहने चला गया है. लेकिन कुछ लोग यह भी कहते हैं कि हमेशा खामोश रहने वाले ऋषि ने अपने माता-पिता से कुछ कहा तो घर में हंगामा हो गया और उसकी बात से दुखी होकर उन्होंने शहर को छोड़कर अपने गांव जाने का फैसला कर लिया.

*****

यूं ही ढाई साल गुजर गए. इस दौरान पूनम ने ऋषि के बारे में कई बार जानने की कोशिश की लेकिन कोई संपर्क नहीं हो सका. उसका मोबाइल नंबर भी बंद था. लेकिन एक दिन पूनम को वह खुशी मिली जो हर औरत का सपना होती है. उसके बेटा हुआ. घर में खुशी का माहौल था. पूरे घर में हलचल थी. उसका पति अमेरिका में रहता था. यह वही शख्स था जिससे पूनम इश्क करती थी लेकिन ऋषि खुद को कुछ न कर ले इस डर से उसने कभी उसे इस बारे में बताया नहीं था. विदेश में सैटल होने के इंतजार की वजह से शादी को तीन साल लगे थे.

पूनम बहुत खुश थी कि तभी उसे पता चला कि घर में हिजड़े आए हैं. खूब नाच-गाना हुआ और हिजड़ों को उनकी मनमर्जी के मुताबिक शगुन भी दिया गया. तभी पूनम को बाहर बुलाया गया और पूनम अपने बेटे को लेकर बाहर आई तो हिजड़ों में से एक खूबसूरत-सा हिजड़ा पूनम की ओर आया, और उसने बच्चे को गोद में उठा लिया. वह उसे प्यार करने लगा तो पूनम की नजर उसके चेहरे की ओर गई…उसने पूनम से पूछा, “बेटे का नाम क्या है…” पूनम स्तब्ध थी और उसक हैरत से खुले मुंह से सिर्फ यही निकला, “ऋषि!!!”

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वाणी प्रकाशन से नरेंद्र सैनी की अभी अभी प्रकाशित कहानी संग्रह ‘इश्क की दुकान बंद है’ में भी यह कहानी सम्मिलित है।

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