सीमा संगसार की पांच कविताएं

उफनता प्रेम 
जब भी देखती हूँ
अपने उफनते हुए प्रेम को
चढ़ी आंच पर
दूध के भगोने में
मार देती हूँ
पानी के कुछ छींटे !
अपने मोटे चश्मे से
तुम देख नहीं पाते
उन महीन सी आहटों को
जिसके बिना अधूरे हैं
जीवन के कुछ पन्ने—
जब तुम जिन्दगी के तेज शोरगुल में
तलाश नहीं पाते हो
अपने लिए
मनपसंद गाने की धुन
अनियंत्रित हो जाता है / तुम्हारा रक्तचाप
और तब सारी दवाएँ
होने लगती हैं बेअसर —
तुम्हारे जीवन की मिठास
तभी से कम हो गई थी
जब से तुमने
छोड़ दिया था लेना
आई लव यू की तीन खुराक —
मुट्ठी भर प्रेम
तुम्हारे चौड़े सीने पर
उग आए हैं
कई पेड़ पौधे
उनमें ठिकाना ढूँढती हूँ मैं
किसी गिलहरी की तरह—
बादलों की ओट में
जब छिप जाता है
तुम्हारा चौड़ा माथा
मैं चूम लेना चाहती हूँ
उस लिलाट को
जहाँ बसेरा है सूर्य का !
तुम मुझे नेह दो न दो
मैं बहती रहूंगी सदा
तुम्हारे ही किसी किनारों से —
मुट्ठी भर प्रेम
बचा कर रखा है मैंने
जमाने से
कि बची रहे
थोड़ी सभ्यता
बचे रहो तुम
और / बचा रहे यह प्रेम !
बुखार 
बुखार से तपते बदन पर
माथे पर अंकित
तुम्हारा स्नेहासिक्त चुंबन
सारी ताप हर लेता है !
पानी की गीली पट्टी की तरह
जब तुम फेरते हो
मेरे सिर पर अपना हाथ
थर्मामीटर का पारा भी
मजबूर हो जाता है
लुढ़कने के लिए —
तुम्हारी सारी हिदायतें
डांट फटकार
कड़वी गोली की तरह
निगल जाती हूँ
हांफते हुए
और / सो जाती हूँ
चादर ओढ कर चुपचाप !
बुखार एक जिद्दी बच्चा है
जिसकी नब्ज टटोलो तो
हठ कर बैठता है
उसे मनाने के लिए चाहिए
बस थोड़ा सा प्यार
थोड़ी सी मनुहार —-
कज्जाक 
काश कि तुम होते
बांका जवान छोरा सा कज्जाक
और मैं होती
मर्यान्का सी सुंदरी !
तुम चिखीर के नशे में डूबते हुए
भूल जाते दुनियादारी
नियम कायदे बंधनों हजार
और मैं देखती तुम्हारी
वहशियाना हरकतें
तुम्हारा जोर जोर से गाना
लड़कियों को छेड़ना और चूमना
इस तरह से मानो यह नशा
क्षणिक नहीं चिरस्थाई हो —
ओ मेरे ओलेनिन
काश कि तुम होते एक कज्जाक
धुंआरे से जलती हुई अंगीठी पर
घने काले धुओं में
मैं देख पाती तुम्हारे शफ्फाक चेहरों को
जिस पर लिखा होता
एक जिन्दगी जी लेने का सच
लोग तो मरते होंगे हर रोज
लेकिन जो हँसते – गाते मर जाएं
वो कज्जाक ही होंगे —
कह दो कि जन्म जन्मान्तर की बातें झूठी हैं
कि मत करना प्रतीक्षा अगले जन्म में
कि मैने जी ली है , एक पूरी जिन्दगी
एक कज्जाक के संग —–
प्रेम पुरापाषाण काल में
पुरापाषाण काल में
जब इंसान
हो रहे थे परिचित
पत्थरों से
कब होने लगा इश्क
पता ही न चला
पत्थरों को रगड़ कर
जब उन्होंने किया होगा
आविष्कार आग का
कुछ तो जला होगा
उनके भीतर भी —
देह को ढंकने की कवायद
शुरू होने के पहले से ही
आदम ने प्रेम करना सीख लिया था
प्रेम तो तब भी था
जब नैतिकता व मर्यादा का
जन्म नहीं हुआ था !
हम यह क्यों न मान लें कि
प्रेम अनैतिक नहीं है
यह उन सभी वर्जनाओं के परे है
जिसे पहली बार आदम व हव्वा ने तोड़ा था
प्रेम परे है
देह से
नैतिकताओं से
वर्जनाओं से —-
—–
सीमा संगसार
फुलवड़िया 1 , बरौनी बेगूसराय ( बिहार )

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3 Responses

  1. Kalpana says:

    Main bhi aap se judna chahungi…
    Kalpana pandey

  2. Vibhuti says:

    बहुत आनंद आया पढ़ कर।

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