शहंशाह आलम की चार कविताएं

तुम्हारे नाम लिखता हूँ

 तुम्हारे नाम

लिखता हूँ आकाश

जो मेरा ठिकाना है

सदियों से

जीवन से

फ़सल से

पानी से भरा

 

लेकिन तुम हो

कि अपना तलघर

छोड़ना नहीं चाहते

जो है

आदमियों की

उदासी से

आदमियों के

झूठ से डरा।

    बाँसुरी

मैं जानता हूँ चिलचिलाती धूप के इन कठोर दिनों

यह बाँसुरी जब-जब बजती है तुम्हारे होंठों से लगकर

तुम्हारी भाषा किसी मीठी नदी की तरह बहती हुई

मेरी पीड़ा को दूर बहा ले जाती है बिना धुकड़-पुकड़

 

मैं जानता हूँ अब बाँसुरी सिर्फ़ तुम्हीं बजाती हो

बिना हारे बिना थके इस मरुथल की घासों के बीच

 

सूक्ष्म मेरी आत्मा जो खिल-खिल रही है मौन को टूटते देख

पीपल के पत्तों के बीच इठला रहे हरे सुग्गों के झुंड में

तुम्हीं को संबोधित तुम्हीं को सपनाते पानी का सोता फोड़ते

 

ऐसा होने के पीछे भी तो तुम्हारी ही बाँसुरी के सुर हैं हठीले

 

मैं जानता हूँ धूप में तपा-धिपा यह पहाड़ पूरा जो लयबद्ध है

तुम्हारी बाँसुरी के गान की पतली धार से बंदी शिविर ढहाते देख
यह पहाड़ मुझे भी देखना चाहता है तुम में ही पूरी तरह संचित।

    सजाता हूं

बाँसुरी की भाषा से

सजाते हो तुम बाँस की दुनिया

जल की बोली से

सज्जित करते हो यह मरुप्रदेश

 

दिशाओं के वस्र से

सजाता हूँ तुम्हारी दिगंबर देह

इस हरी-भरी पृथ्वी को

संभावनाओं से भर-भरकर

 

चलो अच्छा है जब तक

तुम सजा रहे हो पत्तियों से

अपने घर के समय को

 

मैं सजाता हूँ अनथक

बरामदे के बाहर खड़ीं देवकन्या को

चाँद से आकाशगंगा से

और अपनी जादुई धुन से।

आवेग

नदी के पास लौटा

बहुत दिनों के बाद

तो आवेगयुक्त लगी मुझे

थिरकती भी लगी वह

 

देखा सो रहे पेड़ों को जगते

अपने हरियल पत्तों में

तोतों को जोश से भरते हुए

 

बहुत दिनों के बाद

प्रेम की पतली धार

बहती दिखी आँखों में उसकी

सूखी पत्तियों के बीच जो सोई थी

आदिवासी पूरी तरह

 

एक राग गूँज उठा है

मेरी पुरुष-देह में

उसको हरी इस घाटी में

कुलाँच मारते हुए देखकर।

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1 Response

  1. शहंशाह आलम says:

    लिटरेचर प्वायंट का प्रेम को प्रकट करने का तरीक़ा बेहद पसंद आया।

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