शैलेंद्र शांत की चार कविताएं

तुम्हारी याद

जब कभी चलती है चर्चा

प्रेम की

तुम्हारी याद आती है

और दुखी हो जाता हूं

अभी भी तनी हैं दीवारें

ऊंची-ऊंची

भाषा-संप्रदाय की

जाति व धर्म की

शर्मनाक शर्म की

अभी भी

हार रहा है प्रेम

अखबार के पन्नों पर

दंडित हो रहा है प्रेम

अभी भी

नहीं टूटी कई-कई बेड़ियां।

तुम्हारे बहुत करीब पहुंच जाता हूं

दो कदम हम जो चले
तुम भी चले
साथ-साथ
थके-हारे
जब भी लौटा
तुम्हारे पास
तुमने ही न टूटने दिया विश्वास
सब की नजरों में गिर चुका था जब
तुमने न छोड़ा साथ
मैं नहीं तुमने ही
तुमने ही
संभाला मुझे
पाला मुझे
यह तुम्हारा कर्तव्य नहीं
डूबते को तिनके का
एक मात्र भरोसा थी तुम
पीछे लौटता हूं जब कभी
तुम्हारे बहुत करीब पहुंच जाता हूं।

गर तुम न आते

गर तुम न आते
मैं से हम बनने
यह मैं भी कहां
बन पाता हम
हमदम मेरे
गर तुम न आते
किससे मांगता साथ
किससे मांगता हाथ
हमदम मेरे
गिरते-पड़ते-भटकते कदमों का
किसी ठौर थमना न होता
संभलना न होता
अनिश्चितताओं का बीच
यह सिलसिला न होता
जिंदगी का।
मेरे हमराही
इस किताब के पन्नों का
उलटना-पलटना न होता
गर तुम न आते।

मैं गलत होना चाहूंगा !

कभी प्रेम
बेहोशी में किया जाता था
नशे में सराबोर
सहराओ में भागते
जंगलों में भटकते
समुद्र में समाते
चैन और नींद से
दुश्मनी निभाते
तारों को गिनते
और बिस्तर पर छटपटाते
कभी पागलपन की हद तक जाते
इन दिनों होशो हवास में
बही खाते के साथ
इसकी उसकी तरह

कहीं मैं गलत तो नहीं
प्रेम के हक में
मैं गलत होना चाहूंगा..

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