शिवदयाल की दस कविताएं

मौन

‘‘माँगना चाहूँ भी तो क्या माँग लूँगा
और तुम इतनी सरल कि दे सकोगी ?
मान लूँ इस मौन में कुछ भी नहीं है
या कि मानूँ प्रेम का परिताप है यह ?’’
सच और सपना

जिसकी परछाई से
मैं खिल उठता था
पूरा हो जाता था
उसकी उज्ज्वलता
मेरी परछाईं से मद्धिम
पड़ती जाती थी ….
(कोई पूरा चाँद कटता जाता था) …

जिसके प्यार से जीता रहा
वह मेरे प्यार पर मरता रहा –

जब यह जाना
तब दूर आ गया हूँ !
अब मेरा जीना सच है
साँस ही सच बन कर रह गई है
और जो सच था
अब सपना हो गया है,
इस तरह से
सच को सपना होते देखता हूँ ।
एक बात रह गई अधूरी

इस ताजा हवा की शोखी
रात की मदहोशी
चन्द्रिमा की
पेड़ों की फुनगियों से
लुकाछिपी
सितारों की झिलमिलाहट की किस्सागोई
-एक बात रह गई अधूरी फिर
करनी थी पूरी जो
उसकी उदास याद आई

तुम्हारे प्यार में होना
हाँ, मैं तुम्हें प्यार करता हूँ
जैसे फूल खिलते हैं
जैसे निर्झर बहता है
पेड़ झूमते हैं,
आकाश लहराता है

लेकिन मेरा होना
इनके होने-सा नहीं है
तीन कालों के त्रिकोण में
मैं छितराया करता हूँ
इधर से उधर !

हाँ मैं तुम्हें प्यार करता हूँ
जैसे लहर सिर पीटती है
तट प्रतीक्षा करता है
चाँदनी रोती है
तारे थकते हैं

पर मेरा होना
इनके होने-सा नहीं है
क्योंकि तब भी
मैं सपने बुनता हूँ
और किलकता हूँ
अपेक्षा

किस सूरजमुखी का
इन्तजार है तुम्हें ?
यह नागफनी रूप लिए
कैसे मिलूँ ।
सूरजमुखी रहते ही
मुझे खत्म होना चाहिए था,
लेकिन
शायद सूरजमुखी
मैं कभी नहीं रहा
इसीलिए अब मरना चाहता हूँ
तुम्हारे चकित होने
और इनकार करने से पहले ।

लकीरें

ये कसकते हुए दिन
सिसकती हुई रातें
मुझे दे दो न !

ओ मेरे मीत,
यूँ लकीरें खींचकर मिलना
प्यार ही तो सह सकता है ।
लकीरें मिटेंगी –
प्यार को अभी
जरा और घना होने दो !
श्श्श…
चुप रहना
चुप ही रहना !

यह जो व्याप रहा मौन है
इसमें बड़ी अंतरंग
बातचीत होती है हमारी,

अन्यथा
क्यों बरबस ही
बरस पड़ती आँखें
बिना कुछ कहे-सुने ही
क्यों?
श्श्श् ….
चुप रहना !

छुअन
वफा के नाम पर
इस बेवफा जिन्दगी को
तमाम तल्खियों समेत
आत्मसात कर लिया
जो तुम्हें छुआ
और छुआ गया ।
विवाह के दस बरस
तुम्हारे केशों में
जो खिंचे हैं चार
चाँदी के तार
बीत गए साथ यों
बरस दस
जैसे बीते हों क्षण चार !
हे स्वप्न सखि !
यों ही चढ़े मुझ पर
तुम्हारे नेह का उधार
जैसे तुम्हारे केशों में
शनैः शनैः चढ़ते जाते
ये चाँदी के तार !
प्रेम

हम अरसे से
ढूँढ़ रहे थे उसे
कभी भाव में
कभी चितवन में
कभी मुद्रा में
कभी स्मित में
कभी …

परेशान थे और उदास !
वह दरअसल
जा छुपा था
हमारी झुर्रियों में ।

कई बार वह
ढीली पड़ती पेशियों के बीच
अपने को कसता
हमें मुँह चिढ़ाता दिखा ।

हमें झुर्रियों से इनकार था
तब प्रेम वहाँ कैसे हो सकता था ?

हम-तुम
मैंने कहा –
मैं निस्व होता गया
मेरा कुछ न रहा

तुमने कहा –
मैं रीतती चली गई
मुझमें कुछ न बचा

हमने खुद को
एक-दूसरे में खाली किया
… और भर गए …!

मेरे होने से

होगी यह दुनिया
बहुत लम्बी-चौड़ी
होंगे बड़े महान सुजान
मैं तो हूँ
अपनी लघुता में ही अर्थवान
जो मेरे होने से
तुम्हारे होठों पर
थिरक रही मुस्कान !

 

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