वत्सला पांडेय की दो कविताएं

मन की यात्रा

प्यार जिस्म से जिस्म
तक की यात्रा भर नहीं है
ये मेरे मन से शुरू
तुम्हारे मन को स्पर्श करने की कहानी है
असंख्य बार तुम्हे महसूस
कर लेते है हम
तुम्हारी लिखी बातो से
कहे शब्दों से
तुम्हारी बोलती तस्वीरों से
मन मीलों तुम्हारे साथ
चलता है दौड़ता है
पर थकता नहीं
वो ही सिहरन
वो ही रोमांच
वो ही भाव …….
महसूस होते है
तुम पास नहीं होते
पर तुम्हारे काँधे पास होते है
जिन पर हर सिन्दूरी शाम
मैं सर टिका कर
पार्क के कोने बैठ जाती हूँ
तुम्हारी बाहें मुझे कैद कर लेती है
प्रेम के पाश में
सच मानो तुम पास नहीं होते
मगर हर वो अहसास
पास होता है जो तुम दे सकते हो
चुम्बनों की नम अविरल नदी
जिसमे भिगो देते हो मुझे
मेरे पास होती है
अब भी नहीं समझे
ये मन से मन की यात्रा है
जिस्म से जिस्म तक नहीं
मत दुखाना कभी इस यात्रा में
मेरे मन को
मत चुभोना कभी भी विरह के शूल
मेरी यात्रा के सहयात्री हो
जीवन भर साथ देना
इतना ही वचन निभा देना
मेरी खातिर…….
अहसासों की बदरी
से भीगते डूबते
तय करेंगे हम ये यात्रा
मन से मन की

तुम्हारी तस्वीर

हाथ में थाम लेती हूँ
तुम्हारी तस्वीर ……..
गेहुआं रंग
माथे पर लहराते बाल
शान्त सी आँखें
चुप से होंठ …
घंटों निहारती हूँ तुम्हे
देखती हूँ और सोचती हूँ
तुम्हारे साथ बिताये पल
खिलखिलाना हमारा
इधर उधर की बातें
बिना ओर छोर की….
आज भी घंटो बिताये हमने
एक साथ
फर्क बस इतना है
तब काँधे पर माथा भी टिका लेती थी
तुम्हारे स्पर्श को महसूस करती थी
माथे पर झूलती तुम्हारी लट भी सवांर देती थी
कितना रंगीन होते थे वो पल
आज ये सब न था
था तो हाथ में तुम्हारा काला सफेद फोटो…….
मन में कसक
आँखों में तुम्हारी याद का खारापन
ठंडी साँसे ……
बिस्तर पर बेचैन करवटें……..
बहुत फर्क है
तुम में और तुम्हारी तस्वीर में…….
बहुत खामोश है ये
सुनो इसे बोलना सिखा दो
फिर मुझसे दूर
जाकर निभाना अपनी
अनकही जिम्मेदारियां

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