विभूति कुमार मिश्र की दो कविताएं

एक

मैं पुरुष हूं
मुझे स्त्रियों का मनोविज्ञान नहीं पता
मुझे पता है प्रेम और वासना का अंतर

देह मिलन में प्रेम की पराकाष्ठा झलकी है
विलीन हो जाने की आग धधकी है
देह ने अपना काम किया है
ह्रदय साम्राज्ञी को भी क्षणिक दूर किया है
पुनः प्रेम ही पास बुलाता है
चाहे देह बारबार सुलगाता है

गिला है कि प्रेमेतर भी यह सिलसिला है
ह्रदय नहीं सिर्फ़ देह ही मिला है

प्रेम का यह उपकार है,वासना भी मिली है
सुंदर-असुंदर संसार खड़ा है
वासना अनुदार है,एकांगी भी हो ली है
इंकार है,स्वार्थी फिर भी अड़ा है

दो

प्रेम का संबंध अन्तःस्थल से है
वासना का भी
अंतर समझें तो जानें

लिंगरहित प्रेम कर सकता है
वासना इसके बस का नहीं

चाहो तो कह लो
वासना अंग है,प्रेम विकलांग-दिव्यांग है
मानो तो
वासना देह है,प्रेम विदेह है

इसमें वास ना
त्याग आस ना

प्रेम पाप ना
ईश श्राप ना

 

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