‘कड़वी हवा’ के बहाने कुछ कड़वी बातें

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव

बंजारे लगते हैं मौसम

मौसम बेघर होने लगे हैं 

जिस देश में हर साल औसतन 12,000 किसान खुदकुशी कर लेते हों, उस देश में मौसम के बेघर हो जाने पर सवाल उठना लाजिमी है। ‘कड़वी हवा’ (रिलीज डेट 24 नवंबर) फिल्म के क्लाइमेक्स पर गुलजार की धीर-गंभीर आवाज़ में जब ये कविता गूंजती है तो ऐसा लगता है मानो ये सवाल बनकर हर दर्शक के सामने खड़ी हो गई हो। पूछती हो कि मौसम को उसका घर कब लौटाओगा?

विकास के नाम पर हमने प्रकृति को इतना छील दिया है कि अब कुछ भी प्राकृतिक नहीं रह गया है। मौसम का चक्र बदल गया है। कुछ इलाके बारिश के इंतज़ार में सूख कर पपड़ी हुए जा रहे हैं तो कुछ इलाके अतिवृष्टि से डूबे जा रहे हैं। मौसम प्रतिशोध लेने पर उतर आया है।

जलवायु परिवर्तन के इसी गंभीर विषय को नील माधव पांडा ने अपनी फिल्म ‘कड़वी हवा’ में उठाया है। सच्ची घटनाओं पर आधारित इस फिल्म में बुंदेलखंड के सूखाग्रस्त क्षेत्र एक ऐसे किसान की कहानी उठाई गई है, जो कर्ज में डूबा हुआ है। उसका नेत्रहीन बाप हेदू (संजय मिश्र) हमेशा इस तनाव में जीता है कि उसका बेटा कहीं खुदकुशी ना कर ले,  ‘अब डर लगत है कि ई रोग कहीं हमरे मोढ़ा को भी ना खा जाय।’  

यह दर्द सूखे से जूझ रहे हर किसान परिवार का है। बच्चा से लेकर बूढ़ा तक परिवार का हर सदस्य इस तनाव को जीता है। हेदू अंधा है लेकिन वह शुष्क हवा में ज़िन्दगी के प्रति बढ़ती कड़वाहट को बखूबी पहचानता है। इसलिए हर वक्त बेटे का पीछा करता है। मन की आंखों से महसूस करने की कोशिश करता है कि बेटे के मन में क्या चल रहा है। एक ओर बेटे की चिन्ता तो दूसरी ओर बैंक के क्रूर वसूली कर्मचारी गुन्नू (रणवीर शौरी) का खौफ़। बेटे को गुन्नू के खौफ़ से बचाने के लिए वह खुद ही किसानों का दुश्मन बन बैठता है। हेदू गुन्नू का मुखबिर बन जाता है। वह उसे बताता रहता है कि किस किसान के पास कब मोटी रकम आ रही है। मुखबिरी की शर्त ये कि गुन्नू उसके बेटे के पास ना फटके। गुन्नू बैंक का क्रूर चेहरा है।

फिल्म में गुन्नू के जरिए समंदर तट पर बसे गांवों के दर्द को भी दिखाया गया है, जिन्हें समंदर लगातार निगलता जा रहा है। गुन्नू ओडिशा का रहने वाला है और अपने परिवार को जल्द से जल्द अपने यहां बुला लेना चाहता है। विडंबना देखिए गुन्नू समंदर से भाग रहा है और हेदू इस बात पर गुन्नू से ईर्ष्या करता है कि वहां तो पानी ही पानी है। दोनों ही मौसम के मारे हुए।

जलवायु परिवर्तन पर संभवत: यह पहली हिन्दी फिल्म है, जो सूखे की मार झेलते किसान परिवार के दर्द को बड़े ही प्रभावी ढंग से उकेरती है। इन इलाकों का वर्तमान और भविष्य हेदू के इस संवाद से ही साफ है, “हमारे यहां जब बच्चा जनमत है न, तो हाथ में तकदीर की जगह कर्जे की रकम लिखा कर लावत है।”  जहां बारिश नहीं, फ़सल नहीं, वहां कर्ज की वजह से किसान की ज़िन्दगी उसी पर बोझ बन जाती है। वह कर्ज से भागता रहता है और फिर थक कर या तो फन्दे से लटक जाता है या ज़हर खा लेता है।

हालात कितने गंभीर है, इसका अंदाजा आप आंकड़ों से ही लगा सकते हैं। मई 2017 में केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में दायर एक हलफनामे में कहा था कि 2013 से हर साल कृषि क्षेत्र से जुड़े औसतन 12,000 लोग खुदकुशी कर रहे हैं। 2014 में कृषि क्षेत्र से जुड़े 12360 लोगों ने आत्महत्या की थी—इनमें 5650 किसान और 6710 खेतिहर मज़दूर थे। 2015 में यह संख्या 12602 थी, जिनमं 8007 किसान और 4595 खेतिहर मज़दूर थे। किसानों की खुदकुशी के मामले में महाराष्ट्र पहले नंबर पर है।

ये आंकड़े ही बताते हैं कि सूखाग्रस्त इलाकों की हवा से गायब नमी अब किसानों की आंखों में है। उनके लिए हवा कड़वी है। इसलिए फिल्म में जब एक बच्चा क्लास में बताता है कि मौसम दो ही होते हैं—गर्मी और ठंड तो वह गलत नहीं होता बल्कि अपने सही सामान्य ज्ञान का ही परिचय दे रहा होता है। वह कहता, “बारिश तो दो चार दिन के लिए आवत है।” किताबों में जिन चार मौसमों की बात लिखी है, वह उसके लिए बेमानी है।

संजय मिश्र ने अपने लाजवाब अभिनय से हर पल घुट-घुट कर जीते किसान के दर्द को बखूबी उभारा है तो रणवीर शौरी भी अपने किरदार में अमिट छाप छोड़ते हैं। परफेक्ट लोकेशन और बेहतरीन स्क्रीनप्ले की वजह से फिल्म दर्शकों तक अपनी बात पहुंचाने में कामयाब रहती है।  ‘मैं बंजर...’ गाना प्रभावी है।

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