कैलाश मनहर की 5 कविताएं


1. कविता का सूना कोना

नींद और उनींद के बीच
किसी उबासी में से निकल कर
नाम और ईनाम की
गुत्थियों के जाल में फँसती रही
और बिगड़े हुए रूप पर अपने ही
अवसाद और उन्माद के
अँधेरों और चकाचौंध में
कभी रोती रही कभी हँसती रही

विभ्रमित अपनी कंटकाकीर्ण राहों में
पराजितों की उम्मीद बनना चाहती थी वह
कि विजेताओं ने अपने
अहंकार के मुकुट में जड़ लिया हीरे की तरह
लूट कर जन-संवेदनाएं और प्रतिरोध
शासक और शोषक वर्ग अभिजात्य
करने लगा साकार अमानवीय सपने

देखते हुए कविता का सूना कोना
रात भर रोता रहा एक कवि

2. आग की जरूरत

लोक में शोक है
और तंत्र सिर्फ़ मंत्र बोलता है

आंदोलन कोई बीती हुई उम्र है
जैसे यथास्थिति में
जकड़ गया है सारा संघर्ष
और समझौतों से ही मिल रही हैं
तमाम उपलब्धियाँ

बिच्छुओं में नहीं बचा ज़हर अब
तलवारों की धार
और शत्रुओं पर वार की बातें
तिजोरियों में क़ैद पड़ी हैं तन्द्रायित

क्रान्ति पर
जंग लग रहा है साथी!
जैसे हम किसी भ्रान्ति में जी रहे हैं
मरे-मरे-से

अभी हमें आग की
बहुत बहुत जरूरत है

3. स्वतंत्र देश में

छतों पर कालिख जमी थी और
तहखानों में कीचड़ भरा था दुर्गंधित

जिस सड़क पर मैं चल रहा था
हत्यारे के भय-पाश में बंधा हुआ
उसके दोनों तरफ बिखरे थे
मांस के लोथड़े और हड्डियाँ
हत्यारे के हाथों से लहू टपक रहा था
सड़ांध और जुगुप्सापूर्ण
दृश्यों के बीच मुझे
सिर्फ़ चलते जाना था भयाक्रान्त

और नाक बंद करना
या कि मना करना साँस लेने से
अथवा भाग जाना इन सब से दूर
राजद्रोह की श्रेणी में था

हमारे स्वतंत्र देश में उन दिनों
लोकतंत्र अपने शिखर पर था गर्वोन्मत्त

4. जागते रहो

रोशनी मत बुझाओ,
अंधेरे यहीं छिपे हैं

जागते रहो
चोर ताक रहे हैं तुम्हारे
घर की ओर

हथियार संभालो,
हत्यारे आ रहे हैं मारने

निडर बनो
तभी वे तुम से डरेंगे

5. सच कहना

हत्यारे को कहता था हत्यारा
पिटना तो था ही

अक्सर घर आता था लड़-झगड़ गुण्डों से
रोता था हाड़ तुड़ा बीच चौक

बोलता था भक्तों को पाखण्डी
पूछता था लोगों से
आये क्या अच्छे दिन?

दुखता था तन-बदन चोटों से रात-दिन
दर्द तो होना ही था
रोम रोम सच भी तो कहता था

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