कैलाश मनहर की 5 कविताएं

कैलाश मनहर
एक
यदि कोई 
भटकता आदमी दिखाई दे तुम्हें 
उसे मेरे नाम से पुकारना
वह जरूर तुम्हारी तरफ़ देेखेगा 
जैसे मैं
 
दो
अच्छा चलता हूँ 
कह कर आया था उसे 
और अभी तक नहीं हुआ
ठहरना या लौटना
पहुँचना तो 
शायद कल्पनातीत है
 
तीन
मस्तक पर घाव की 
असह्य पीड़ा को झेलते
अमरत्व का भोग
श्राप है या वरदान
कवि ही जाने 
कविता बखाने
 
चार
झेल रहा हूँ शीतलहर इस
दुर्बल तन पर
मन के भीतर
सीली-सीली सुलग रही है 
आग 
जाग में दु:ख-सुख दोनों
भोग रहा हूँ मध्य रात्रि में
दूर कहीं पर 
गाते झिंगुर
के स्वर में मेरा भी स्वर है
 
पांच
बहुत अकेली है रात
शीतलहर में काँपते हुये
मैं उसके साथ आग ताप रहा हूँ 
इसी आग और जाग में छिपी है 
तड़कती हुई सुबह

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