जीवन के क्रूर अनुभवों की जीवन्त कथा यात्रा है ‘कल्लन चतुर्वेदी’

पुस्तक समीक्षा

शहंशाह आलम

एक कहानीकार का आदमी की ज़िंदगी के साथ गहरा रिश्ता होता है। इसलिए कि एक कहानीकार ख़ुद आदमी होता है और जिसमें ज़िंदगी भी होती है। और एक कहानीकार ख़ुद ज़िंदगी से गुत्थमगुत्था करता रहा होता है, संघर्ष करता रहा होता है, नक़ली चमत्कारों की पोल खोलता रहा होता है। किसी कहानीकार की यही ज़िंदगी है, जो किसी कहानीकार को ऐसी-ऐसी ज़िंदगियों से मिलवाती है, मुलाक़ात करवाती है, बातचीत करवाती है, जिन ज़िंदगियों से जुड़ कर, जिनकी पेचीदगियाँ देख कर, जिनकी कठिनाइयाँ महसूस कर, जिनकी नाकामियाँ जान कर आहत होता है। ऐसे ही अनुभवों से गहरे जुड़ कर हर कहानीकार आदमी की ज़िंदगी की सच्चाइयों को, ज़िंदगी के दरियाओं को, ज़िंदगी के उलझाव को अपनी क़लम से आदमी की असल ज़िंदगी के बदरंगपन को पूरी ढिठाई, पूरी सावधानी, पूरी आवाजाही के साथ लिखता है। ऐसे ही ढीठ, सावधान और आवाजाही वाले कहानीकार हैं शायान शफ़ी क़ुरैशी, जिनकी कहानियों का संग्रह ‘कल्लन चतुर्वेदी’ की कहानियाँ पढ़ कर हम यह कह सकते हैं कि ये सारी कहानियाँ हमारी अपनी ज़िंदगी की कहानियाँ हैं।

संग्रह की सारी कहानियाँ ज़िंदगी की सच्चाइयों से भीड़ंत, द्वंद्व, युद्ध की कहानियाँ हैं : मिर्ज़ा साहब ग़ुस्से से लाल-पीले हो रहे थे। लगभग चीख़ कर बोले- ‘शाहिदा, शाहिदा! इस लड़के पर तो जैसे शाहिदा का भूत सवार हो गया है। दुनिया में सैकड़ों लड़कियाँ हैं, ख़ूबसूरत, बा-इल्म, सलीक़ेमंद। और… और फिर ख़ानदान भी कोई चीज़ होती है कि नहीं? या ख़ुदा! आज के इन लड़कों ने तो ख़ानदानों का बेड़ा ग़र्क़ कर रखा है। लानत है ऐसी मुहब्बत पर, जो ख़ानदानों से मेल न खाती हो। जो कभी नवाब उस्मान मिर्ज़ा की चौखट पर सुबह-शाम आदाब बजा लाते थे, नज़रें मिलाने की हिम्मत न हुई कभी, आज इस ख़ानदान पर आँखें लगाए बैठे हैं। ये सब इस लड़के की करतूत है वरना किसी की क्या मजाल!’ मिर्ज़ा साहब ने थोड़ा रुक कर एक ठंडी साँस ली, फिर कहने लगे- ‘देखो बेगम, मैं पहले भी कह चुका हूँ इस घर में यह सब नहीं चलेगा, वो भी मेरे जीते जी ( ‘रज़ामन्दी’, पृ. 21 )।’ शायान शफ़ी क़ुरैशी का कमाल यही है कि किसी रचनात्मक छल का ताना-बाना ना बुन कर जो कहना चाहते हैं, पूरी साफ़गोई से कह डालते हैं। ‘रज़ामंदी’ कहानी बज़ाहिर कोई प्रेमकथा लगती है। यह कहानी एक प्रेमकथा है भी। नवाब उस्मान मिर्ज़ा साहब कोई अकेले पिता नहीं हैं, जो अपने बेटे के प्रेम-प्रसंग का विरोध करते हैं, ना उनका बेटा नईम है, जो अकेला किसी लड़की से मुहब्बत करता है, ना सलीक़ा बेगम अकेली ऐसी माँ है, जो बेटे की पसंद की लड़की का समर्थन करती है। इस कहानी का कथा-तत्व इन बातों में है कि मिर्ज़ा साहब अपने आस्तीन पर कहीं से उचक कर आ बैठे झींगुर को झटके से गिराते हैं और पैर लटका कर बिलकुल ढीली हो चुकी निवार के पलंग पर बैठ जाते हैं। आज हर आदमी की ज़िंदगी में यही झींगुर है, जो ‘झीं-झीं’ कर रहा है, चाहे वह नवाब उस्मान मिर्ज़ा जैसा आदमी ही क्यों ना हो, जो कभी अपने बदन पर मक्खी तक को बैठने नहीं देता था, आज झींगुर जैसा बरसाती कीड़ा आकर उन पर बैठ जा रहा है। मेरे ख़्याल से यही झींगुर है, जो महलों के खण्डहर होने का सबूत देता आया है और इन खण्डहरों में रहने वालों की अकड़ का सबूत भी। मेरे ख़्याल से यही ऐंठन है, जो आदमी को मारती आई है।

समकालीन हिंदी कहानी में हमेशा से नई सम्भावनाओं की तलाश की जाती रही है। ऐसा कार्य दुष्कर भी होता है। लेकिन युवा कहानीकार शायान शफ़ी क़ुरैशी की कहानियों को पढ़ कर यह बात पूरी बेबाकी से कही जा सकती है कि शायान शफ़ी क़ुरैशी का रचनात्मक कौशल ऐसा है कि समकालीन हिंदी कहानी में एक सम्भावनाशील कहानीकार की कमी पूरी होती हुई दिखाई देती है। शायान शफ़ी क़ुरैशी के भीतर जिस कथा-संरचना का हुनर है, वह समकालीन कहानी की समकालीन प्रवृत्तियों को एक नया रास्ता भी दिखाता है। वह नया रास्ता ऐसा है, जिसमें कोई कहानीकार अपने पाठकों को बिना उलझाए एक अच्छी कहानी कह-लिख सकता है। शायान शफ़ी क़ुरैशी की एक विशेषता यह भी है कि यह कहानीकार अपने स्वभाव से जितना साफ़गो है, उतनी ही साफ़गोई से कहानियाँ भी कहता-लिखता है। इनकी कहानियों को पढ़ कर आप किसी संशय का सामना नहीं करते बल्कि एक नई कथा-संवेदन से रू-बी-रू होते हैं : ‘… रशीदा आपा के  तेवर बदल-से गए। कुछ कम कोण से आँखें तरेर कर बोली- ‘ऐ ए ए बाजी, के रई हो, जूठे-जाठे बर्तन न धोएँ हम किसी के घर के, इनके अब्बा को पता चल गिया के हम जूठन धोते फिर रिए हैं दूसरों के घरों में तो मार-मूर केइ फेंक देंगे। पैसे-कपड़े देने हों तो देओ, नइ देने हों तो नइ दियो मगर हम ये झाड़ू-बर्तन-मर्तन नइ कर पाएँगे। मैं तो समझ रही थी कि कुछ लेने-देने के लिए बुलबाया होगा। काम पड़ा है अभी तो हमाए ही घर का। सालन चूले पे चढ़ा छोड़ के आ गई थी मैं तो। अभी तो मैं जा रही हूँ, ज़कात-ख़ैरात निकालो तो बुलबा लेना। अच्छा सलामालेकुम ( ‘ज़कात’, पृ. 32-33 )।’

आदमी ने कई दुनियाएँ बना रखी हैं। सबकी अपनी भावना है, अपनी अनुभूति है, अपना हर्ष है, अपना विषाद है, अपना जीने का तरीक़ा है। आदमी की एक दुनिया ऐसी है, जो आपके दरवाज़े पर ग़रीब-बेबस औरतों की शक्ल में आती है। आपसे अपने बीमार बच्चे के नाम पर, अपने बीमार पति के नाम पर या अपनी बेटी की शादी के नाम पर हमेशा कुछ-न-कुछ चाहती है। इनके बच्चे हमेशा बीमार होते हैं, इनके पति हमेशा मृत्यु की कामना कर रहे होते हैं, इनकी बच्चियाँ शादी के इंतज़ार में बूढ़ी हो रही होती हैं। हालाँकि सच में उन औरतों के जीवन में ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा होता, बस हमसे-आपसे कुछ रुपये ऐंठने के लिए वे ऐसा कहती आ रही होती हैं। हम-आप उन औरतों की मदद करते भी रहते हैं। लेकिन कभी हम-आप उन औरतों से यह कह दें कि आप हमारा कुछ काम कर दीजिए, बदले में हम आपको पैसे दे देंगे। हमारी-आपकी इन बातों को सुन उन औरतों की भवें तन जाती हैं। जैसा ‘ज़कात’ कहानी की रशीदा लेखक की पत्नी के साथ करती है। रशीदा को लेखक के घर से आर्थिक सहयोग तो चाहिए परंतु बिना कोई सहयोग किए हुए। हमारा समाज ऐसा है कि हम अपने नक़ली दुखों को दिखा कर किसी की भी जेबी मार लेने का हक़ रखते हैं। ‘ज़कात’ कहानी की रशीदा लेखक की पत्नी के साथ कुछ नया नहीं करती। ऐसी रशीदाएँ हमारे-आपके दरवाज़े पर रोज़ आती हैं और आगे भी आती रहेंगी। और उन्हें मदद करने वाले लोग मदद करते रहेंगे।

 

‘कल्लन चतुर्वेदी’ कहानी-संग्रह में शायान शफ़ी क़ुरैशी की छोटी-बड़ी दर्जन भर कहानियाँ शामिल की गई हैं, जिनके शीर्षक इस तरह हैं- ‘ज़मीर की आवाज़’, ‘तस्वीर’, ‘रज़ामन्दी’, ‘ज़कात’, ‘पलायन’, ‘कर्फ़्यू’, ‘मक़सद’, ‘कल्लन चतुर्वेदी’, ‘अन्दर के इंसान’, ‘शब्दों का तिलिस्म’, ‘फ़ैमिली वीज़ा’ और ‘तोड़’। ये सारी कहानियाँ कहानीकार ने अपने आस-पास के किरदारों की जीवनानुभूतियों को अपनी जीवनानुभूतियाँ बनाते हुए लिखा है। कहना चाहिए कि इन सारी कहानियों के यथार्थ हमारे-आपके रोज़मर्रा के दिनों के यथार्थ हैं, जिन से आप-हम दोचार होते रहते हैं। इन कहानियों में आपके-हमारे सुख-दुःख हैं, उजाले-अँधेरे हैं, यातनाएँ-बेचैनियाँ हैं, संघर्ष-लड़ाइयाँ हैं। यूँ कहा जा सकता है कि शायान शफ़ी क़ुरैशी ने अपनी इन कहानियों में आपकी-हमारी मिट्टी, आपका-हमारा पानी, आपका-हमारा अतीत-वर्तमान समय सबकुछ व्यापक सामाजिकता का संदर्भ देते हुए लिपिबद्ध किया है। यह समय ऐसा है कि हमारे ना जाने कितने सुखद सपने को मारता रहा है। हमारे मरते हुए सुखद सपनों की भी ये कहानियाँ हैं : ‘सुनो, क्या तुम बता सकते हो कि इस वक़्त दिन है या रात?’ क़ैदी ने कालकोठरी के पास से गुज़रते हुए सिपाही से सपाट आवाज़ में पूछा।

सिपाही पिछली बार की तरह ही इस बार भी क़ैदी की आवाज़ को इस तरह नज़रअन्दाज़ करके गुज़र गया जैसे यह सवाल उससे नहीं बल्कि सन्नाटों में गुम हो जाने के लिए ही किया गया हो या फिर उसमें समाअत ही नहीं कि वह सुन सके।

‘क्या तुम मुझे सिर्फ़ इतना नहीं बता सकते कि इस क़ैदख़ाने की हदों के बाहर सूरज की रोशनी है या रात का अँधेरा।’ क़ैदी ने दीवार के सिरे तक जाकर वापिस गुज़रते हुए सिपाही से फिर सवाल किया।

क़ैदी को इस बार भी ख़ामोशी के सिवा कुछ हाथ न लगा ( ‘मक़सद’, पृ. 49 )।

 

शायान शफ़ी क़ुरैशी की कहानियाँ हमारे बर्बर वर्तमान पर गहरा कटाक्ष करती हैं। वर्तमान शासन-व्यवस्था ने आम आदमी का जिस क़दर जीना मुहाल कर दिया है, बेहाल कर दिया है, बदहाल कर दिया है, उसका कच्चा-चिट्ठा भी ये कहानियाँ खोलती हैं। हालाँकि वर्तमान शासन-व्यवस्था की कट्टरता के पक्ष में जो ‘सामाजिक चुप्पी’ इन दिनों दिखाई दे रही है, यह चुप्पी आने वाले दिनों में अधिक ख़तरनाक सिद्ध हो सकती है। यही वजह है कि इन कहानियों में हमारे सुखद सपने ज़रा देर के लिए आते हैं और इन सपनों को जहाँ वापिस लौटना होता है, लौट भी जाते हैं। हमारे असली जीवन की असली ट्रेजिडी यही है कि हमारा सपना देखना सदियों से मना है : ‘काहे पढ़ने आ गए सोनी जी, सुनारी करो तुम तो सुनारी, बड़ा अच्छा धंधा है, फुक्की मारो, लोंगें जोड़ो, अँगूठी बनाओ। अंग्रेज़ी पढ़-लिख के क्या बन जाओगे, बाबा जी का घंटा!’

कक्षा के मुस्लिम विद्यार्थियों की दशा तो और भी दयनीय थी। माससाब किसी को यासिर अराफ़ात सम्बोधित करते तो किसी को बहादुर शाह ज़फ़र। किसी से कहते- ‘क्यों मियाँ फ़ख़रुद्दीन अली मंसूरी कुछ समझ में आए ग्रामर के टाँके? या रज़ाई-गद्दों में टाँके लगाओगे ज़िंदगी भर ( ‘कल्लन चतुर्वेदी’, पृ. 55-56 )।’

 

जाति और धर्म का यह अँधेरी सुरंगों वाला चक्कर अकेले कल्लन चतुर्वेदी जैसे लोगों के साथ नहीं लगा हुआ है।  दरअसल कल्लन का मूल नाम कालका प्रसाद जाटव था। समय का फेरा कल्लन के इस पुकारू नाम के साथ ‘चतुर्वेदी’ भी लगवा देता है। यह नाम एक तरह से हमारे जातिवादी वर्तमान पर करारा व्यंग्य है। सत्ता और व्यवस्था के साथ-साथ जिस तरह ज़ात-पात वाली मानसिकता पूरी इंसानियत को नुक़सान पहुँचाने पर आमादा है, यह स्थिति हमें शर्मसार किए देती रही है। इसी लज्जा की कहानी ‘कल्लन चतुर्वेदी’ है। लेकिन सच्चाई यही है कि अब लज्जा किसे आती है, ज़ालिम को अथवा ज़ुल्म सहने वाले को? मेरा स्पष्ट मानना है कि किसी ज़ालिम को लज्जा कब आई है, कभी नहीं, लज्जित बेचारा ज़ुल्म सहने वाला ही दिखाई देता है। इस असाधारण लज्जापूर्ण समय से मुक्ति का रास्ता शायान शफ़ी क़ुरैशी अपनी कहानियों के माध्यम से ढूँढ़ते मुझे दिखाई दे रहे हैं। इन कहानियों को पढ़ कर आपको भी ऐसा ही सुखद अनुभव होगा निःसंदेह।

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‘कल्लन चतुर्वेदी’ ( कथा-संग्रह ) / लेखक : शायान शफ़ी क़ुरैशी / प्रकाशक : पहले पहल प्रकाशन, 25 ए, प्रेस कॉम्पलेक्स, भोपाल-462001 / मोबाइल संपर्क : 09926511446 / मूल्य : ₹200

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