कमलेश भारतीय की चार लघुकथाएं

सहानुभूति

वे विकलांगों की सेवा में जुटे थे । इस कारण नगर में उनका नाम था ।मुझे उन्होंने आमंत्रण दिया कि आकर उनका काम देखूं । काम देखकर कुछ शब्द चित्र खींच सकूं । वे मुझे अपनी चमचमाती गाड़ी में ले जा रहे थे । उस दिन विकलांगों के लिए संस्था का एक समारोह जो था। राह में बैसाखियों के सहारे धीमे-धीमे चल रहा था एक वृद्ध । उनकी आंखों में चमक आ गई, मेरी आंखों में भी । उन्होंने कहा कि यह विकलांग हमारे समारोह में ही जा रहा है । मैंने सोचा कि वे गाड़ी रोकेंगे और उस वृद्ध को गाडी में बिठा लेंगे , पर वे अपनी गाड़ी भगा लें गये ताकि मुख्य अतिथि का स्वागत समय पर कर सकें । मेरी आंखों में उदासी तैरने लगी , उनकी सहानुभूति देखकर ।

पुष्प की पीड़ा

मन में आया कि दादा चतुर्वेदी के जमाने और आज के जमाने के फूल में शायद कोई भारी तब्दीली आ गई हो ।वह स्वतंत्रता के पहले का फूल था और स्वतंत्रता के बाद के फूल की इच्छा उसी से क्यों न जानी जाये । उसी के मुख से ।

क्यों भाई, क्या हाल हैं ?

देख नहीं रहे , माला बनाने के लिये मुझे सुइयों की चुभन सहनी पड़ रही हैं ? पर तुम्हारे विचार में तो देवाशीष पर चढ़ना या प्रेमी माला में गुंथना कोई खुशी की बात नहीं । मेरी इच्छा तो आज भी नहीं पर मुझे वह पथ भी तो दिखाई नहीं देता जिस पर बिछ कर मैं सौभाग्यशाली महसूस कर सकूं ?

क्यों ? आज भी तो नगर में एक बड़े नेता आ रहे हैं ?

फिर क्या करूं ?

क्यों ? नेता जी का स्वागत् नहीं करोगे ?

आपके सवाल की चुभन सुई की चुभन से भी ज्यादा है । आज माला में बिंध कर मुझे वहीं जाना है , पर मैं जाना नहीं चाहता । लेकिन, मेरी सुनता कौन है ?

 

मैं तुम्हें प्यार नहीं करती
मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं ।
पर मैं तुम्हें प्यार नहीं करती ।
यह क्या कह रही हो ? मुझे तुम्हारी बात पर विश्वास नहीं आ रहा ।
विश्वास करो , मैं किसी का घर नहीं तोड़ना चाहती ।
क्या मतलब ?
मतलब साफ है कि मेरे पति को एक औरत ने अपने मोह जाल मैं ऐसा फांसा है कि वह घर छोड़ कर उसके पीछे हो लिया ।
फिर ?
जब मैं एक औरत द्वारा अपना पति छीन लिए जाने का दुख भोग रही हूं, तब तुम मुझसे यह उम्मीद कैसे करते हो कि मैं अपना घर बसाने के लिए किसी का बसा बसाया घर उजाड़ दूंगी ? मैं तुम्हें बिल्कुल मोहब्बत नहीं करती ।
वह अपने हाथों में अपना चेहरा छिपाये सुबकने लगी ।
…और मैं नाम लिख देता हूं
 दीवाली से एक सप्ताह पहले अहोई का त्योहार आता है । तब-तब मुझे दादी मां जरूर याद आती है । परिवार में मेरी लिखावट कुछ दूसरे भाई-बहनों से ठीक मानी जाती थी । इसलिए अहोई माता के चित्र बनाने व इसके साथ परिवारजनों के नाम लिखने का जिम्मा मेरा लगाया जाता । दादी मां किसी निर्देशक की तरह मेरे पास बैठ जातीं और मैं अलग अलग रंगों में अहोई माता का चित्र रंग डालता । फिर एक कलम लेकर दादी मां आतीं और नाम लिखवाने लगतीं । वे बुआ का नाम लिखने को कहतीं । मैं सवाल करता, दादी बुआ तो जालंधर रहती है ? ,,,,,,तो क्या, है तो इस घर की बेटी । फिर वे चाचा का नाम बोलती । मैं फिर बाल सुलभ स्वभाव से कह देता-दादी, चाचा तो,,,,, ,,,,,,,हां , हां , चाचा तेरे मद्रास में हैं । बुद् धू ,आयेंगे तो इसी घर में । छुट्टियों में जब आएंगे तब अहोई माता के पास अपना नाम देखेंगे । अहोई माता बनाते ही इसीलिए हैं कि सबका भला, सबका मंगल मांगते हैं । इसी बहाने दूर दराज बैठे बच्चों को मांएं याद कर लेती हैंं । अब दादी मां नहीं रही । हर वर्ष अहोई बनाता हूं तब सिर्फ अपने ही नहीं सभी भाइयों के नाम लिखता हूं । हालांकि वे अलग अलग शहरों में बसे हुए हैं । कभी आते-जाते भी नहीं । पर नाम लिखे रहते है तो यादें आती रहती हैं और ,,,,,दीवाली पर एक उम्मीद बनी रहती है कि वे आएंगे । ,,,,,और मैं नाम लिख देता हूं
संक्षिप्त परिचय
  लगभग तीन वर्ष तक हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष पद पर रहने के दौरान कथा समय पत्रिका का संपादन । इससे पहले दैनिक ट्रिब्यून के कथा कहानी पृष्ठ का संपादन । हिसार में दैनिक ट्रिब्यून के प्रिंसिपल संवाददाता के पद से त्यागपत्र देकर ग्रंथ अकादमी का उपाध्यक्ष पद का कार्यभार संभाला था । अब स्वतंत्र लेखन ।

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