कमलेश भारतीय की दो लघुकथाएं

शुरुआत

‘मैं मर क्यों नहीं जाती ?’ जमाने भर की सताई हुई औरत ने खुद से ही बुदबुदाते कहा ।

‘तुम जिंदा ही कब थी ?’ औरत के अंदर की औरत ने सवाल किया ।

‘तुम ठीक कहती हो । जिसके जन्म पर घर में मातम छा जाए, उसे जिंदा कौन कहे ? जिसे कभी लाज ने मारा , कभी दर्द ने, उसे जिंदा कैसे कहें ? अब तो मर मर कर जीने की आदत हो गई है , मुझे ।’

‘इस पर भी मरने की इच्छा बाकी है ?’

‘एक बार मर जाऊं तो रोज रोज के मरने से मुक्ति मिले ।’

‘मुक्ति कहीं मरने से मिलती है , पगली ?’

‘फिर कैसे मिलती है ?’

‘मुक्ति जीने से मिलती है । मर मर कर नहीं , लड़ लड़ कर जीना सीखो ।’

इतना सुनते ही वह औरत उठ खड़ी हुई, चारदीवारी के खिलाफ लड़ने के लिए

इश्तिहार

वह एक साबुन का प्रयोग लंबे समय से कर रहा था । आज साबुन की टिकिया पूरी तरह घिस गई थी । टीवी प्रोग्राम देखते-देखते वह साबुन खरीदने चल दिया । साबुन खरीद कर चला तो देखा कि नया ब्रांड है । अरे , यह तो इश्तहार का कमाल है । यही इश्तिहार तो चला रहा था। उसका ब्रांड कैसे बदल गया । उसे पता भी नही चला ।

 

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