कमलेश भारतीय की दो लघुकथाएं

ईश्वर का जन्म
वे टूटे घरों का मलबा या कबाड़ उठाने का काम करते थे । कभी काम मिलता , कभी नहीं । रेहड़ी खडी रहती । खच्चर का चारे का खर्च अलग । ऐसे खाली समय में बैठे सोच रहे थे कि क्या किया जाए । ईश्वर तुम कहां हो ? हमारा भी कुछ सोचो । अचानक सामने नजर गई और उनके मन में कुछ कौंध गया । छोटे से पार्क के कोने में दो चार ईंट रख कर लाल कपडा टांग कर एक मूर्ति रख दी । अपनी ओर से कुछ सिक्के भी रख दिए । बस , शाम तक लोगों ने भी पैसे चढा दिए । अंधेरा होते ही वे आए और पैसे अपनी जेब के हवाले किए । मुस्कुराते हुए चल दिए । एक नये ईश्वर का जन्म होते चुका था ।

उपहार
सुबह का समय । अभी धूप आंगन में पसरी नहीं थी ।सूरज बादलों की ओट में से ऊपर उठने की कोशिश में था । पत्नी ने झाड़ू उठाई और आंगन में बिखरे फूलों की तरफ देख कर उलाहना देते कहा कि पड़ोसियों के पेड़ से फूल हमारे आंगन में गिर जाने से सुबह-सुबह झाड़ू न लगाओ तो बहुत बुरा लगता है । इन्हें कहिये न कि इस पेड़ को कटवा डालें । मैंने हंसते इतना ही कहा कि ये कितने अच्छे पड़ोसी हैं कि सुबह-सुबह हमारे आंगन में उपहार के रूप में फूल बिखेर देते हैं , नहीं तो पड़ोसी कब ,कितने कांटे बिखेर दें , कौन रोक सकता है ? पत्नी ने भी झाड़ू लगाते सारा दुख भूल गयी ।

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1 Response

  1. kamlesh bhartiya says:

    literature point ka bahut abhar. isse laghukatha ko aap bahut se pathkon tak pahuncha rahe hain.

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